<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-3486815723019470360</id><updated>2012-02-17T06:44:17.497+05:30</updated><category term='सूचना का अधिकार पर बारम्बार पूछे जाने वाले प्रश्न'/><title type='text'>अनुराग शांडिल्य (हिन्दी) Anurag Shandilya</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://anuragshandilyahindi.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3486815723019470360/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anuragshandilyahindi.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>ANURAG SHANDILYA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09780770213161059080</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>18</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3486815723019470360.post-2508770063731136875</id><published>2009-05-18T22:08:00.003+05:30</published><updated>2009-05-18T22:46:01.920+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सूचना का अधिकार पर बारम्बार पूछे जाने वाले प्रश्न'/><title type='text'>सूचना के अधिकार पर बारम्बार पूछे जाने वाले प्रश्न</title><content type='html'>&lt;div align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;सूचना के अधिकार पर बारम्बार पूछे जाने वाले प्रश्न&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;सूचना का अधिकार क्या है&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*सूचना का अधिकार क्या है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;संविधान के अनुच्छेद 19(1) के तहत सूचना का अधिकार मौलिक अधिकारों का एक भाग है. अनुच्छेद 19(1) के अनुसार प्रत्येक नागरिक को बोलने व अभिव्यक्ति का अधिकार है. 1976 में सर्वोच्च न्यायालय ने "राज नारायण विरुद्ध उत्तर प्रदेश सरकार" मामले में कहा है कि लोग कह और अभिव्यक्त नहीं कर सकते जब तक कि वो न जानें. इसी कारण सूचना का अधिकार अनुच्छेद 19 में छुपा है. इसी मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने आगे कहा कि भारत एक लोकतंत्र है. लोग मालिक हैं. इसलिए लोगों को यह जानने का अधिकार है कि सरकारें जो उनकी सेवा के लिए हैं, क्या कर रहीं हैं? व प्रत्येक नागरिक कर/ टैक्स देता है. यहाँ तक कि एक गली में भीख मांगने वाला भिखारी भी टैक्स देता है जब वो बाज़ार से साबुन खरीदता है.(बिक्री कर, उत्पाद शुल्क आदि के रूप में). नागरिकों के पास इस प्रकार यह जानने का अधिकार है कि उनका धन किस प्रकार खर्च हो रहा है. इन तीन सिद्धांतों को सर्वोच्च न्यायालय ने रखा कि सूचना का अधिकार हमारे मौलिक अधिकारों का एक हिस्सा हैं.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*यदि आरटीआई एक मौलिक अधिकार है, तो हमें यह अधिकार देने के लिए एक कानून की आवश्यकता क्यों है?&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;strong&gt;ऐसा इसलिए है क्योंकि यदि आप किसी सरकारी विभाग में जाकर किसी अधिकारी से कहते हैं, "आरटीआई मेरा मौलिक अधिकार है, और मैं इस देश का मालिक हूँ. इसलिए मुझे आप कृपया अपनी फाइलें दिखायिए", वह ऐसा नहीं करेगा. व संभवतः वह आपको अपने कमरे से निकाल देगा. इसलिए हमें एक ऐसे तंत्र या प्रक्रिया की आवश्यकता है जिसके तहत हम अपने इस अधिकार का प्रयोग कर सकें. सूचना का अधिकार 2005, जो 13 अक्टूबर 2005 को लागू हुआ हमें वह तंत्र प्रदान करता है. इस प्रकार सूचना का अधिकार हमें कोई नया अधिकार नहीं देता. यह केवल उस प्रक्रिया का उल्लेख करता है कि हम कैसे सूचना मांगें, कहाँ से मांगे, कितना शुल्क दें आदि.&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*सूचना का अधिकार कब लागू हुआ?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;केंद्रीय सूचना का अधिकार 12 अक्टूबर 2005 को लागू हुआ. हालांकि 9 राज्य सरकारें पहले ही राज्य कानून पारित कर चुकीं थीं. ये थीं: जम्मू कश्मीर, दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, असम और गोवा.&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*सूचना के अधिकार के अर्न्तगत कौन से अधिकार आते हैं?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;सूचना का अधिकार 2005 प्रत्येक नागरिक को शक्ति प्रदान करता है कि वो:&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;strong&gt;** सरकार से कुछ भी पूछे या कोई भी सूचना मांगे.&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;strong&gt;** किसी भी सरकारी निर्णय की प्रति ले.&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;strong&gt;** किसी भी सरकारी दस्तावेज का निरीक्षण करे.&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;strong&gt;** किसी भी सरकारी कार्य का निरीक्षण करे.&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;strong&gt;** किसी भी सरकारी कार्य के पदार्थों के नमूने ले.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*सूचना के अधिकार के अर्न्तगत कौन से अधिकार आते हैं?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;केन्द्रीय कानून जम्मू कश्मीर राज्य के अतिरिक्त पूरे देश पर लागू होता है. सभी इकाइयां जो संविधान, या अन्य कानून या किसी सरकारी अधिसूचना के अधीन बनी हैं या सभी इकाइयां जिनमें गैर सरकारी संगठन शामिल हैं जो सरकार के हों, सरकार द्वारा नियंत्रित या वित्त- पोषित किये जाते हों.&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*"वित्त पोषित" क्या है?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;इसकी परिभाषा न ही सूचना का अधिकार कानून और न ही किसी अन्य कानून में दी गयी है. इसलिए यह मुद्दा समय के साथ शायद किसी न्यायालय के आदेश द्वारा ही सुलझ जायेगा.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*क्या निजी इकाइयां सूचना के अधिकार के अर्न्तगत आती हैं?&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;सभी निजी इकाइयां, जोकि सरकार की हैं, सरकार द्वारा नियंत्रित या वित्त- पोषित की जाती हैं सीधे ही इसके अर्न्तगत आती हैं. अन्य अप्रत्यक्ष रूप से इसके अर्न्तगत आती हैं. अर्थात, यदि कोई सरकारी विभाग किसी निजी इकाई से किसी अन्य कानून के तहत सूचना ले सकता हो तो वह सूचना कोई नागरिक सूचना के अधिकार के अर्न्तगत उस सरकारी विभाग से ले सकता है.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*क्या सरकारी दस्तावेज गोपनीयता कानून 1923 सूचना के अधिकार में बाधा नहीं है?&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;नहीं, सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के अनुच्छेद 22 के अनुसार सूचना का अधिकार कानून सभी मौजूदा कानूनों का स्थान ले लेगा.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*क्या पीआईओ सूचना देने से मना कर सकता है?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;एक पीआईओ सूचना देने से मना उन 11 विषयों के लिए कर सकता है जो सूचना का अधिकार अधिनियम के अनुच्छेद 8 में दिए गए हैं. इनमें विदेशी सरकारों से प्राप्त गोपनीय सूचना, देश की सुरक्षा, रणनीतिक, वैज्ञानिक या आर्थिक हितों की दृष्टि से हानिकारक सूचना, विधायिका के विशेषाधिकारों का उल्लंघन करने वाली सूचनाएं आदि.सूचना का अधिकार अधिनियम की दूसरी अनुसूची में उन 18 अभिकरणों की सूची दी गयी है जिन पर ये लागू नहीं होता. हालांकि उन्हें भी वो सूचनाएं देनी होंगी जो भ्रष्टाचार के आरोपों व मानवाधिकारों के उल्लंघन से सम्बंधित हों.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*क्या अधिनियम विभक्त सूचना के लिए कहता है?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;हाँ, सूचना का अधिकार अधिनियम के दसवें अनुभाग के अंतर्गत दस्तावेज के उस भाग तक पहुँच बनायीं जा सकती है जिनमें वे सूचनाएं नहीं होतीं जो इस अधिनियम के तहत भेद प्रकाशन से अलग रखी गयीं हैं.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*क्या फाइलों की टिप्पणियों तक पहुँच से मना किया जा सकता है?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;नहीं, फाइलों की टिप्पणियां सरकारी फाइल का अभिन्न अंग हैं व इस अधिनियम के तहत भेद प्रकाशन की विषय वस्तु हैं. ऐसा केंद्रीय सूचना आयोग ने 31 जनवरी 2006 के अपने एक आदेश में स्पष्ट कर दिया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;सूचना के अधिकार का कैसे प्रयोग करें&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*मुझे सूचना कौन देगा?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;एक या अधिक अधिकारियों को प्रत्येक सरकारी विभाग में जन सूचना अधिकारी (पीआईओ) का पद दिया गया है. ये जन सूचना अधिकारी प्रधान अधिकारियों के रूप में कार्य करते हैं. आपको अपनी अर्जी इनके पास दाखिल करनी होती है. यह उनका उत्तरदायित्व होता है कि वे उस विभाग के विभिन्न भागों से आपके द्वारा मांगी गयी जानकारी इकठ्ठा करें व आपको प्रदान करें. इसके अलावा, कई अधिकारियों को सहायक जन सूचना अधिकारी के पद पर सेवायोजित किया गया है. उनका कार्य केवल जनता से अर्जियां स्वीकारना व उचित पीआईओ के पास भेजना है.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*अपनी अर्जी मैं कहाँ जमा करुँ?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;आप ऐसा पीआईओ या एपीआईओ के पास कर सकते हैं. केंद्र सरकार के विभागों के मामलों में, 629 डाकघरों को एपीआईओ बनाया गया है. अर्थात् आप इन डाकघरों में से किसी एक में जाकर आरटीआई पटल पर अपनी अर्जी व फीस जमा करा सकते हैं. वे आपको एक रसीद व आभार जारी करेंगे और यह उस डाकघर का उत्तरदायित्व है कि वो उसे उचित पीआईओ के पास भेजे.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*क्या इसके लिए कोई फीस है? मैं इसे कैसे जमा करुँ?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;हाँ, एक अर्ज़ी फीस होती है. केंद्र सरकार के विभागों के लिए यह 10रु. है. हालांकि विभिन्न राज्यों ने भिन्न फीसें रखीं हैं. सूचना पाने के लिए, आपको 2रु. प्रति सूचना पृष्ठ केंद्र सरकार के विभागों के लिए देना होता है. यह विभिन्न राज्यों के लिए अलग- अलग है. इसी प्रकार दस्तावेजों के निरीक्षण के लिए भी फीस का प्रावधान है. निरीक्षण के पहले घंटे की कोई फीस नहीं है लेकिन उसके पश्चात् प्रत्येक घंटे या उसके भाग की 5रु. प्रतिघंटा फीस होगी. यह केन्द्रीय कानून के अनुसार है. प्रत्येक राज्य के लिए, सम्बंधित राज्य के नियम देखें. आप फीस नकद में, डीडी या बैंकर चैक या पोस्टल आर्डर जो उस जन प्राधिकरण के पक्ष में देय हो द्वारा जमा कर सकते हैं. कुछ राज्यों में, आप कोर्ट फीस टिकटें खरीद सकते हैं व अपनी अर्ज़ी पर चिपका सकते हैं. ऐसा करने पर आपकी फीस जमा मानी जायेगी. आप तब अपनी अर्ज़ी स्वयं या डाक से जमा करा सकते हैं.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*मुझे क्या करना चाहिए यदि पीआईओ या सम्बंधित विभाग मेरी अर्ज़ी स्वीकार न करे?&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;आप इसे डाक द्वारा भेज सकते हैं. आपको इसकी औपचारिक शिकायत सम्बंधित सूचना आयोग को भी अनुच्छेद 18 के तहत करें. सूचना आयुक्त को उस अधिकारी पर 25000रु. का दंड लगाने का अधिकार है जिसने आपकी अर्ज़ी स्वीकार करने से मना किया था.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*क्या सूचना पाने के लिए अर्ज़ी का कोई प्रारूप है?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;केंद्र सरकार के विभागों के लिए, कोई प्रारूप नहीं है. आपको एक सादा कागज़ पर एक सामान्य अर्ज़ी की तरह ही अर्ज़ी देनी चाहिए. हालांकि कुछ राज्यों और कुछ मंत्रालयों व विभागों ने प्रारूप निर्धारित किये हैं. आपको इन प्रारूपों पर ही अर्ज़ी देनी चाहिए. कृपया जानने के लिए सम्बंधित राज्य के नियम पढें.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*मैं सूचना के लिए कैसे अर्ज़ी दूं?&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;एक साधारण कागज़ पर अपनी अर्ज़ी बनाएं और इसे पीआईओ के पास स्वयं या डाक द्वारा जमा करें. [अपनी अर्ज़ी की एक प्रति अपने पास निजी सन्दर्भ के लिए अवश्य रखें]&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*मैं अपनी अर्ज़ी की फीस कैसे दे सकता हूँ?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;प्रत्येक राज्य का अर्ज़ी फीस जमा करने का अलग तरीका है. साधारणतया, आप अपनी अर्ज़ी की फीस ऐसे दे सकते हैं:&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;** स्वयं नकद भुगतान द्वारा [अपनी रसीद लेना न भूलें]&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;** डाक द्वारा: &lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;*डिमांड ड्राफ्ट से *भारतीय पोस्टल आर्डर से &lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;*मनी आर्डर से [केवल कुछ राज्यों में] &lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;*कोर्ट फीस टिकट से [केवल कुछ राज्यों में] &lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;* बैंकर चैक से&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;** कुछ राज्य सरकारों ने कुछ खाते निर्धारित किये हैं. आपको अपनी फीस इन खातों में जमा करानी होती है. इसके लिए, आप एसबीआई की किसी शाखा में जा सकते हैं और राशि उस खाते में जमा करा सकते हैं और जमा रसीद अपनी आरटीआई अर्ज़ी के साथ लगा सकते हैं. या आप अपनी आरटीआई अर्ज़ी के साथ उस विभाग के पक्ष में देय डीडी या एक पोस्टल आर्डर भी लगा सकते हैं.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*क्या मैं अपनी अर्जी केवल पीआईओ के पास ही जमा कर सकता हूँ?&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;नहीं, पीआईओ के उपलब्ध न होने की स्थिति में आप अपनी अर्जी एपीआईओ या अन्य किसी अर्जी लेने के लिए नियुक्त अधिकारी के पास अर्जी जमा कर सकते हैं.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*क्या करूँ यदि मैं अपने पीआईओ या एपीआईओ का पता न लगा पाऊँ?&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;यदि आपको पीआईओ या एपीआईओ का पता लगाने में कठिनाई होती है तो आप अपनी अर्जी पीआईओ c/o विभागाध्यक्ष को प्रेषित कर उस सम्बंधित जन प्राधिकरण को भेज सकते हैं. विभागाध्यक्ष को वह अर्जी सम्बंधित पीआईओ के पास भेजनी होगी.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*क्या मुझे अर्जी देने स्वयं जाना होगा?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;आपके राज्य के फीस जमा करने के नियमानुसार आप अपनी अर्जी सम्बंधित राज्य के विभाग में अर्जी के साथ डीडी, मनी आर्डर, पोस्टल आर्डर या कोर्ट फीस टिकट संलग्न करके डाक द्वारा भेज सकते हैं.केंद्र सरकार के विभागों के मामलों में, 629 डाकघरों को एपीआईओ बनाया गया है. अर्थात् आप इन डाकघरों में से किसी एक में जाकर आरटीआई पटल पर अपनी अर्जी व फीस जमा करा सकते हैं. वे आपको एक रसीद व आभार जारी करेंगे और यह उस डाकघर का उत्तरदायित्व है कि वो उसे उचित पीआईओ के पास भेजे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*क्या सूचना प्राप्ति की कोई समय सीमा है?&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;हाँ, यदि आपने अपनी अर्जी पीआईओ को दी है, आपको 30 दिनों के भीतर सूचना मिल जानी चाहिए. यदि आपने अपनी अर्जी सहायक पीआईओ को दी है तो सूचना 35 दिनों के भीतर दी जानी चाहिए.उन मामलों में जहाँ सूचना किसी एकल के जीवन और स्वतंत्रता को प्रभावित करती हो, सूचना 48 घंटों के भीतर उपलब्ध हो जानी चाहिए.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*क्या मुझे कारण बताना होगा कि मुझे फलां सूचना क्यों चाहिए?&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;बिलकुल नहीं, आपको कोई कारण या अन्य सूचना केवल अपने संपर्क विवरण (जो हैं नाम, पता, फोन न.) के अतिरिक्त देने की आवश्यकता नहीं है. अनुच्छेद 6(2) स्पष्टतः कहता है कि प्रार्थी से संपर्क विवरण के अतिरिक्त कुछ नहीं पूछा जायेगा.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*क्या पीआईओ मेरी आरटीआई अर्जी लेने से मना कर सकता है?&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;नहीं, पीआईओ आपकी आरटीआई अर्जी लेने से किसी भी परिस्थिति में मना नहीं कर सकता. चाहें वह सूचना उसके विभाग/ कार्यक्षेत्र में न आती हो, उसे वह स्वीकार करनी होगी. यदि अर्जी उस पीआईओ से सम्बंधित न हो, उसे वह उपयुक्त पीआईओ के पास 5 दिनों के भीतर अनुच्छेद 6(2) के तहत भेजनी होगी.&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;strong&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;आरटीआई वह कैसे करता है जब अन्य कानून नहीं कर पाते हैं &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*इस देश में कई अच्छे कानून हैं लेकिन उनमें से कोई कानून कुछ नहीं कर सका. आप कैसे सोचते हैं कि ये कानून करेगा?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;यह कानून पहले ही कर रहा है. ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार कोई कानून किसी अधिकारी की अकर्मण्यता के प्रति जवाबदेही निर्धारित करता है. यदि सम्बंधित अधिकारी समय पर सूचना उपलब्ध नहीं कराता है, उस पर 250रु. प्रतिदिन के हिसाब से सूचना आयुक्त द्वारा जुर्माना लगाया जा सकता है. यदि दी गयी सूचना गलत है तो अधिकतम 25000रु. तक का जुर्माना लगाया जा सकता है. जुर्माना आपकी अर्जी गलत कारणों से नकारने या गलत सूचना देने पर भी लगाया जा सकता है. यह जुर्माना उस अधिकारी के निजी वेतन से काटा जाता है.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*क्या अब तक कोई जुमाना लगाया गया है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;हाँ, कुछ अधिकारियों पर केन्द्रीय व राज्यीय सूचना आयुक्तों द्वारा जुर्माना लगाया गया है.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*क्या पीआईओ पर लगे जुर्माने की राशि प्रार्थी को दी जाती है?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;नहीं, जुर्माने की राशि सरकारी खजाने में जमा हो जाती है. हांलांकि अनुच्छेद 19 के तहत, प्रार्थी मुआवजा मांग सकता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;मैं क्या करुँ यदि मुझे संतोषजनक सूचना न मिले&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*मैं क्या कर सकता हूँ यदि मुझे सूचना न मिले?&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;यदि आपको सूचना न मिले या आप प्राप्त सूचना से संतुष्ट न हों, आप अपीलीय अधिकारी के पास सूचना का अधिकार अधिनियम के अनुच्छेद 19(1) के तहत एक अपील दायर कर सकते हैं.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*पहला अपीलीय अधिकारी कौन होता है?&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;प्रत्येक जन प्राधिकरण को एक पहला अपीलीय अधिकारी बनाना होता है. यह बनाया गया अधिकारी पीआईओ से वरिष्ठ रैंक का होता है.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*क्या प्रथम अपील का कोई प्रारूप होता है?&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;नहीं, प्रथम अपील का कोई प्रारूप नहीं होता (लेकिन कुछ राज्य सरकारों ने प्रारूप जारी किये हैं). एक सादा पन्ने पर प्रथम अपीली अधिकारी को संबोधित करते हुए अपनी अपीली अर्जी बनाएं. इस अर्जी के साथ अपनी मूल अर्जी व पीआईओ से प्राप्त जैसे भी उत्तर (यदि प्राप्त हुआ हो) की प्रतियाँ लगाना न भूलें.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*क्या मुझे प्रथम अपील की कोई फीस देनी होगी?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;नहीं, आपको प्रथम अपील की कोई फीस नहीं देनी होगी, कुछ राज्य सरकारों ने फीस का प्रावधान किया है.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*कितने दिनों में मैं अपनी प्रथम अपील दायर कर सकता हूँ?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;आप अपनी प्रथम अपील सूचना प्राप्ति के 30 दिनों व आरटीआई अर्जी दाखिल करने के 60 दिनों के भीतर दायर कर सकते हैं.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*क्या करें यदि प्रथम अपीली प्रक्रिया के बाद मुझे सूचना न मिले?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;यदि आपको प्रथम अपील के बाद भी सूचना न मिले तो आप द्वितीय अपीली चरण तक अपना मामला ले जा सकते हैं. आप प्रथम अपील सूचना मिलने के 30 दिनों के भीतर व आरटीआई अर्जी के 60 दिनों के भीतर (यदि कोई सूचना न मिली हो) दायर कर सकते हैं.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*द्वितीय अपील क्या है?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;द्वितीय अपील आरटीआई अधिनियम के तहत सूचना प्राप्त करने का अंतिम विकल्प है. आप द्वितीय अपील सूचना आयोग के पास दायर कर सकते हैं. केंद्र सरकार के विभागों के विरुद्ध आपके पास केद्रीय सूचना आयोग है. प्रत्येक राज्य सरकार के लिए, राज्य सूचना आयोग हैं.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*क्या द्वितीय अपील के लिए कोई प्रारूप है?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;नहीं, द्वितीय अपील के लिए कोई प्रारूप नहीं है (लेकिन राज्य सरकारों ने द्वितीय अपील के लिए भी प्रारूप निर्धारित किए हैं). एक सादा पन्ने पर केद्रीय या राज्य सूचना आयोग को संबोधित करते हुए अपनी अपीली अर्जी बनाएं. द्वितीय अपील दायर करने से पूर्व अपीली नियम ध्यानपूर्वक पढ लें. आपकी द्वितीय अपील निरस्त की जा सकती है यदि वह अपीली नियमों को पूरा नहीं करती है.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*क्या मुझे द्वितीय अपील के लिए फीस देनी होगी?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;नहीं, आपको द्वितीय अपील के लिए कोई फीस नहीं देनी होगी. हांलांकि कुछ राज्यों ने इसके लिए फीस निर्धारित की है.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*मैं कितने दिनों में द्वितीय अपील दायर कर सकता हूँ?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;आप प्रथम अपील के निष्पादन के 90 दिनों के भीतर या उस तारीख के 90 दिनों के भीतर कि जब तक आपकी प्रथम अपील निष्पादित होनी थी, द्वितीय अपील दायर कर सकते हैं.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*यह कानून कैसे मेरे कार्य पूरे होने में मेरी सहायता करता है?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;यह कानून कैसे रुके हुए कार्य पूरे होने में सहायता करता है अर्थात् वह अधिकारी क्यों अब वह आपका रुका कार्य करता है जो वह पहले नहीं कर रहा था?आइए नन्नू का मामला लेते हैं. उसे राशन कार्ड नहीं दिया जा रहा था. लेकिन जब उसने आरटीआई के तहत अर्जी दी, उसे एक सप्ताह के भीतर राशन कार्ड दे दिया गया. नन्नू ने क्या पूछा? उसने निम्न प्रश्न पूछे:&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;1. मैंने एक डुप्लीकेट राशन कार्ड के लिए 27 फरवरी 2004 को अर्जी दी. कृपया मुझे मेरी अर्जी पर हुई दैनिक उन्नति बताएं अर्थात् मेरी अर्जी किस अधिकारी पर कब पहुंची, उस अधिकारी पर यह कितने समय रही और उसने उतने समय क्या किया?&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;2. नियमों के अनुसार, मेरा कार्ड 10 दिनों के भीतर बन जाना चाहिए था. हांलांकि अब तीन माह से अधिक का समय हो गया है. कृपया उन अधिकारियों के नाम व पद बताएं जिनसे आशा की जाती है कि वे मेरी अर्जी पर कार्रवाई करते व जिन्होंने ऐसा नहीं किया?&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;3. इन अधिकारियों के विरुद्ध अपना कार्य न करने व जनता के शोषण के लिए क्या कार्रवाई की जायेगी? वह कार्रवाई कब तक की जायेगी?&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;4. अब मुझे कब तक अपना कार्ड मिल जायेगा?&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;साधारण परिस्थितियों में, ऐसी एक अर्जी कूड़ेदान में फेंक दी जाती. लेकिन यह कानून कहता है कि सरकार को 30 दिनों में जवाब देना होगा. यदि वे ऐसा नहीं करते हैं, उनके वेतन में कटौती की जा सकती है. अब ऐसे प्रश्नों का उत्तर देना आसान नहीं होगा. &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;पहला प्रश्न है- कृपया मुझे मेरी अर्जी पर हुई दैनिक उन्नति बताएं.कोई उन्नति हुई ही नहीं है. लेकिन सरकारी अधिकारी यह इन शब्दों में लिख ही नहीं सकते कि उन्होंने कई महीनों से कोई कार्रवाई नहीं की है. वरन यह कागज़ पर गलती स्वीकारने जैसा होगा.&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;अगला प्रश्न है- कृपया उन अधिकारियों के नाम व पद बताएं जिनसे आशा की जाती है कि वे मेरी अर्जी पर कार्रवाई करते व जिन्होंने ऐसा नहीं किया.&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;यदि सरकार उन अधिकारियों के नाम व पद बताती है, उनका उत्तरदायित्व निर्धारित हो जाता है. एक अधिकारी अपने विरुद्ध इस प्रकार कोई उत्तरदायित्व निर्धारित होने के प्रति काफी सतर्क होता है. इस प्रकार, जब कोई इस तरह अपनी अर्जी देता है, उसका रुका कार्य संपन्न हो जाता है.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*मुझे सूचना प्राप्ति के पश्चात् क्या करना चाहिए?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;इसके लिए कोई एक उत्तर नहीं है. यह आप पर निर्भर करता है कि आपने वह सूचना क्यों मांगी व यह किस प्रकार की सूचना है. प्राय: सूचना पूछने भर से ही कई वस्तुएं रास्ते में आने लगतीं हैं. उदाहरण के लिए, केवल अपनी अर्जी की स्थिति पूछने भर से आपको अपना पासपोर्ट या राशन कार्ड मिल जाता है. कई मामलों में, सड़कों की मरम्मत हो जाती है जैसे ही पिछली कुछ मरम्मतों पर खर्च हुई राशि के बारे में पूछा जाता है. इस तरह, सरकार से सूचना मांगना व प्रश्न पूछना एक महत्वपूर्ण चरण है, जो अपने आप में कई मामलों में पूर्ण है.लेकिन मानिये यदि आपने आरटीआई से किसी भ्रष्टाचार या गलत कार्य का पर्दाफ़ाश किया है, आप सतर्कता एजेंसियों, सीबीआई को शिकायत कर सकते हैं या एफ़आईआर भी करा सकते हैं. लेकिन देखा गया है कि सरकार दोषी के विरुद्ध बारम्बार शिकायतों के बावजूद भी कोई कार्रवाई नहीं करती. यद्यपि कोई भी सतर्कता एजेंसियों पर शिकायत की स्थिति आरटीआई के तहत पूछकर दवाब अवश्य बना सकता है. हांलांकि गलत कार्यों का पर्दाफाश मीडिया के जरिए भी किया जा सकता है. हांलांकि दोषियों को दंड देने का अनुभव अधिक उत्साहजनक है. लेकिन एक बात पक्की है कि इस प्रकार सूचनाएं मांगना और गलत कामों का पर्दाफाश करना भविष्य को संवारता है. अधिकारियों को स्पष्ट सन्देश मिलता है कि उस क्षेत्र के लोग अधिक सावधान हो गए हैं और भविष्य में इस प्रकार की कोई गलती पूर्व की भांति छुपी नहीं रहेगी. इसलिए उनके पकडे जाने का जोखिम बढ जाता है.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;क्या मैं निशाना नहीं बनाया जाऊँगा यदि मैंने आरटीआई का प्रयोग किया&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*क्या लोगों को निशाना बनाया गया है जिन्होंने आरटीआई का प्रयोग किया व भ्रष्टाचार का पर्दाफाश किया?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;हाँ, ऐसे कुछ उदाहरण हैं जिनमें लोगों को शारीरिक हानि पहुंचाई गयी जब उन्होंने भ्रष्टाचार का बड़े पैमाने पर पर्दाफाश किया. लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि प्रार्थी को हमेशा ऐसा भय झेलना होगा. अपनी शिकायत की स्थिति या अन्य समरूपी मामलों की जानकारी लेने के लिए अर्जी लगाने का अर्थ प्रतिकार निमंत्रित करना नहीं है. ऐसा तभी होता है जब सूचना नौकरशाह- ठेकेदार गठजोड़ या किसी प्रकार के माफ़िया का पर्दाफाश कर सकती हो कि प्रतिकार की सम्भावना हो.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*तब मैं आरटीआई का प्रयोग क्यों करुँ?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;पूरा तंत्र इतना सड- गल चुका है कि यदि हम सभी अकेले या मिलकर अपना प्रयत्न नहीं करेंगे, यह कभी नहीं सुधरेगा. यदि हम ऐसा नहीं करेंगे, तो कौन करेगा? हमें करना है. लेकिन हमें ऐसा रणनीति से व जोखिम को कम करके करना होगा. व अनुभव से, कुछ रणनीतियां व सुरक्षाएं उपलब्ध हैं.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*ये रणनीतियां क्या हैं?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;कृपया आगे बढें और किसी भी मुद्दे के लिए आरटीआई अर्जी दाखिल करें. साधारणतया, कोई आपके ऊपर एकदम हमला नहीं करेगा. पहले वे आपकी खुशामद करेंगे या आपको जीतेंगे. तो आप जैसे ही कोई असुविधाजनक अर्जी दाखिल करते हैं, कोई आपके पास बड़ी विनम्रता के साथ उस अर्जी को वापिस लेने की विनती करने आएगा. आपको उस व्यक्ति की गंभीरता और स्थिति का अंदाजा लगा लेना चाहिए. यदि आप इसे काफी गंभीर मानते हैं, अपने 15 मित्रों को भी तुंरत उसी जन प्राधिकरण में उसी सुचना के लिए अर्जी देने के लिए कहें. बेहतर होगा यदि ये 15 मित्र भारत के विभिन्न भागों से हों. अब, आपके देश भर के 15 मित्रों को डराना किसी के लिए भी मुश्किल होगा. यदि वे 15 में से किसी एक को भी डराते हैं, तो और लोगों से भी अर्जियां दाखिल कराएं. आपके मित्र भारत के अन्य हिस्सों से अर्जियां डाक से भेज सकते हैं. इसे मीडिया में व्यापक प्रचार दिलाने की कोशिश करें. इससे यह सुनिश्चित होगा कि आपको वांछित जानकारी मिलेगी व आप जोखिमों को कम कर सकेंगे.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;नौकरशाही के डर&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*क्या लोग जन सेवकों का भयादोहन नहीं करेंगे?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;आईए हम स्वयं से पूछें- आरटीआई क्या करता है? यह केवल जनता में सच लेकर आता है. यह कोई सूचना उत्पन्न नहीं करता. यह केवल परदे हटाता है व सच जनता के सामने लाता है. क्या वह गलत है? इसका दुरूपयोग कब किया जा सकता है? केवल यदि किसी अधिकारी ने कुछ गलत किया हो और यदि यह सूचना जनता में बाहर आ जाये. क्या यह गलत है यदि सरकार में की जाने वाली गलतियाँ जनता में आ जाएं व कागजों में छिपाने की बजाय इनका पर्दाफाश हो सके. हाँ, एक बार ऐसी सूचना किसी को मिल जाए तो वह जा सकता है व अधिकारी को ब्लैकमेल कर सकता है. लेकिन हम गलत अधिकारियों को क्यों बचाना चाहते है? यदि किसी अन्य को ब्लैकमेल किया जाता है, उसके पास भारतीय दंड संहिता के तहत ब्लैकमेलर के विरुद्ध एफ़आईआर दर्ज करने के विकल्प मौजूद हैं. उस अधिकारी को वह करने दीजिये. हांलांकि हम किसी अधिकारी को किसी ब्लैकमेलर द्वारा ब्लैकमेल किये जाने की संभावनाओं को सभी मांगी गयी सूचनाओं को वेबसाइट पर डालकर कम कर सकते हैं. एक ब्लैकमेलर किसी अधिकारी को तभी ब्लैकमेल कर पायेगा जब केवल वही उस सूचना को ले पायेगा व उसे सार्वजनिक करने की धमकी देगा. लेकिन यदि उसके द्वारा मांगी गयी सूचना वेबसाइट पर डाल दी जाये तो ब्लैकमेल करने की सम्भावना कम हो जाती है.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*क्या सरकार के पास आरटीआई अर्जियों की बाढ नहीं आ जायेगी और यह सरकारी तंत्र को जाम नहीं कर देगी?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;ये डर काल्पनिक हैं. 65 से अधिक देशों में आरटीआई कानून हैं. संसद में पारित किए जाने से पूर्व भारत में भी 9 राज्यों में आरटीआई कानून थे. इन में से किसी सरकार में आरटीआई अर्जियों की बाढ नहीं आई. ऐसे डर इस कल्पना से बनते हैं कि लोगों के पास करने को कुछ नहीं है व वे बिलकुल खाली हैं. आरटीआई अर्ज़ी डालने व ध्यान रखने में समय लगता है, मेहनत व संसाधन लगते हैं.आईये कुछ आंकडे लें. दिल्ली में, 60 से अधिक महीनों में 120 विभागों में 14000 अर्जियां दाखिल हुईं. इसका अर्थ हुआ कि 2 से कम अर्जियां प्रति विभाग प्रति माह. क्या हम कह सकते हैं कि दिल्ली सरकार में आरटीआई अर्जियों की बाढ नहीं आ गई? तेज रोशनी में, यूएस सरकार को 2003- 04 के दौरान आरटीआई अधिनियम के तहत 3.2 मिलियन अर्जियां प्राप्त हुईं. यह उस तथ्य के बावजूद है कि भारत से उलट, यूएस सरकार की अधिकतर सूचनाएं नेट पर उपलब्ध हैं और लोगों को अर्जियां दाखिल करने की कम आवश्यकता होनी चाहिए. लेकिन यूएस सरकार आरटीआई अधिनियम को समाप्त करने का विचार नहीं कर रही. इसके उलट वे अधिकाधिक संसाधनों को इसे लागू करने में जुटा रहे हैं. इसी वर्ष, उन्होंने 32 मिलियन यूएस डॉलर इसके क्रियान्वयन में खर्च किये.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*क्या आरटीआई अधिनियम के क्रियान्वयन में अत्यधिक संसाधन खर्च नहीं होंगे?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;आरटीआई अधिनियम के क्रियान्वयन में खर्च किये गए संसाधन सही खर्च होंगे. यूएस जैसे अधिकांश देशों ने यह पाया है व वे अपनी सरकारों को पारदर्शी बनाने पर अत्यधिक संसाधन खर्च कर रहे हैं. पहला, आरटीआई पर खर्च लागत उसी वर्ष पुनः उस धन से प्राप्त हो जाती है जो सरकार भ्रष्टाचार व गलत कार्यों में कमी से बचा लेती है. उदहारण के लिए, इस बात के ठोस प्रमाण हैं कि कैसे आरटीआई के वृहद् प्रयोग से राजस्थान के सूखा राहत कार्यक्रम और दिल्ली की जन वितरण प्रणाली की अनियमितताएं कम हो पायीं. दूसरा, आरटीआई लोकतंत्र के लिए बहुत जरुरी है. यह हमारे मौलिक अधिकारों का एक हिस्सा है. जनता की सरकार में भागीदारी से पहले जरुरी है कि वे पहले जानें कि क्या हो रहा है. इसलिए, जिस प्रकार हम संसद के चलने पर होने वाले खर्च को आवश्यक मानते हैं, आरटीआई पर होने वाले खर्च को भी जरुरी माना जाये.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*लेकिन प्राय: लोग निजी मामले सुलझाने के लिए अर्जियां देते हैं?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जैसा कि ऊपर दिया गया है, यह केवल जनता में सच लेकर आता है. यह कोई सूचना उत्पन्न नहीं करता. सच छुपाने या उस पर पर्दा डालने का कोई प्रयास समाज के उत्तम हित में नहीं हो सकता. किसी लाभदायक उद्देश्य की प्राप्ति से अधिक, गोपनीयता को बढावा देना भ्रष्टाचार और गलत कामों को बढावा देगा. इसलिए, हमारे सभी प्रयास सरकार को पूर्णतः पारदर्शी बनाने के होने चाहिए. हांलांकि, यदि कोई किसी को आगे ब्लैकमेल करता है, कानून में इससे निपटने के प्रचुर प्रावधान हैं. दूसरा, आरटीआई अधिनियम के अनुच्छेद 8 के तहत कई बचाव भी हैं. यह कहता है, कि कोई सूचना जो किसी के निजी मामलों से सम्बंधित है व इसका जनहित से कोई लेना- देना नहीं है को प्रकट नहीं किया जायेगा. इसलिए, मौजूदा कानूनों में लोगों के वास्तविक उद्देश्यों से निपटने के पर्याप्त प्रावधान हैं.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*लोगों को ओछी/ तुच्छ अर्जियां दाखिल करने से कैसे बचाया जाए?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;कोई अर्ज़ी ओछी/ तुच्छ नहीं होती. ओछा/ तुच्छ क्या है? मेरा पानी का रुका हुआ कनेक्शन मेरे लिए सबसे संकटपूर्ण हो सकता है, लेकिन एक नौकरशाह के लिए यह ओछा/ तुच्छ हो सकता है. नौकरशाही में निहित कुछ स्वार्थों ने इस ओछी/ तुच्छ अर्जियों के दलदल को बढाया है. वर्तमान में, आरटीआई अधिनियम किसी भी अर्ज़ी को इस आधार पर निरस्त करने की इजाज़त नहीं देता कि वो ओछी/ तुच्छ थी. यदि ऐसा हो, प्रत्येक पीआईओ हर दूसरी अर्ज़ी को ओछी/ तुच्छ बताकर निरस्त कर देगा. यह आरटीआई के लिए मृत समाधि के समान होगा.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*फाइल टिप्पणियां सार्वजनिक नहीं की जानी चाहिए क्योंकि यह ईमानदार अधिकारियों को ईमानदार सलाह देने से रोकेगा?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;यह गलत है. इसके उलट, हर अधिकारी को अब यह पता होगा कि जो कुछ भी वो लिखता है वह जन- समीक्षा का विषय हो सकता है. यह उस पर उत्तम जनहित में लिखने का दवाब बनाएगा. कुछ ईमानदार नौकरशाहों ने अलग से स्वीकारा है कि आरटीआई ने उनकी राजनीतिक व अन्य प्रभावों को दरकिनार करने में बहुत सहायता की है. अब अधिकारी सीधे तौर पर कहते हैं कि यदि उन्होंने कुछ गलत किया तो उनका पर्दाफाश हो जायेगा यदि किसी ने उसी सूचना के बारे में पूछ लिया. इसलिए, अधिकारियों ने इस बात पर जोर देना शुरू कर दिया है कि वरिष्ठ अधिकारी लिखित में निर्देश दें. सरकार ने भी इस पर मनन करना प्रारंभ कर दिया है कि फाइल टिप्पणियां आरटीआई अधिनियम की सीमा से हटा दी जाएँ. उपरोक्त कारणों से, यह नितांत आवश्यक है कि फाइल टिप्पणियां आरटीआई अधिनियम की सीमा में रहें.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*जन सेवक को निर्णय कई दवाबों में लेने होते हैं व जनता इसे नहीं समझेगी?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;जैसा ऊपर बताया गया है, इसके उलट, इससे कई अवैध दवाबों को कम किया जा सकता है.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*सरकारी रेकॉर्ड्स सही आकार में नहीं हैं. आरटीआई को कैसे लागू किया जाए?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;आरटीआई तंत्र को अब रेकॉर्ड्स सही आकार में रखने का दवाब डालेगा. वरन अधिकारी को अधिनियम के तहत दंड भुगतना होगा.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;*विशाल जानकारी मांगने वाली अर्जियां रद्द कर देनी चाहिए?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;यदि मैं कुछ जानकारी चाहता हूँ, जो एक लाख पृष्ठों में आती है, मैं ऐसा तभी करूँगा जब मुझे इसकी आवश्यकता होगी क्योंकि मुझे उसके लिए 2 लाख रुपयों का भुगतान करना होगा. यह एक स्वतः ही हतोत्साह करने वाला उपाय है. यदि अर्ज़ी इस आधार पर रद्द कर दी गयी, तो प्रार्थी इसे तोड़कर प्रत्येक अर्ज़ी में 100 पृष्ठ मांगते हुए 1000 अर्जियां बना लेगा, जिससे किसी का भी लाभ नहीं होगा. इसलिए, इस कारण अर्जियां रद्द नहीं होनी चाहिए कि:"लोगों को केवल अपने बारे में सूचना मांगने दी जानी चाहिए. उन्हें सरकार के अन्य मामलों के बारे में प्रश्न पूछने की छूट नहीं दी जानी चाहिए", पूर्णतः इससे असंबंधित है:आरटीआई अधिनियम का अनुच्छेद 6(2) स्पष्टतः कहता है कि प्रार्थी से यह नहीं पूछा जा सकता कि क्यों वह कोई जानकारी मांग रहा है. किसी भी मामले में, आरटीआई इस तथ्य से उद्धृत होता है कि लोग टैक्स/ कर देते हैं, यह उनका पैसा है और इसीलिए उन्हें यह जानने का अधिकार है कि उनका पैसा कैसे खर्च हो रहा है व कैसे उनकी सरकार चल रही है. इसलिए लोगों को सरकार के प्रत्येक कार्य की प्रत्येक बात जानने का अधिकार है. वे उस मामले से सीधे तौर पर जुड़े हों या न हों. इसलिए, दिल्ली में रहने वाला व्यक्ति कोई भी सूचना मांग सकता है चाहे वह तमिलनाडु की हो.&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:85%;color:#009900;"&gt;(अंग्रेजी मूलपाठ का स्रोत: रक्षा लेखा नियंत्रक, जबलपुर, रक्षा मंत्रालय, भारत सरकार की वेबसाइट; अंग्रेजी मूलपाठ का हिंदी रूपांतर वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं है- विवाद की स्थिति में अंग्रेजी रूपांतर सही माना जाये)&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3486815723019470360-2508770063731136875?l=anuragshandilyahindi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anuragshandilyahindi.blogspot.com/feeds/2508770063731136875/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3486815723019470360&amp;postID=2508770063731136875&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3486815723019470360/posts/default/2508770063731136875'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3486815723019470360/posts/default/2508770063731136875'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anuragshandilyahindi.blogspot.com/2009/05/blog-post.html' title='सूचना के अधिकार पर बारम्बार पूछे जाने वाले प्रश्न'/><author><name>ANURAG SHANDILYA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09780770213161059080</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3486815723019470360.post-3857233406868940951</id><published>2008-12-18T23:25:00.000+05:30</published><updated>2008-12-18T23:38:06.449+05:30</updated><title type='text'>हितोपदेश की कथाएँ- संधि</title><content type='html'>&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;कथा&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;१&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;:&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;b style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;"&gt;महातप नामक       सन्यासी और &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;"&gt;एक चूहा &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;गौतम महर्षि के तपोवन में महातपा नामक एक मुनि था। वहाँ उस मुनि ने कौऐ से लाये हुए एक चूहे के बच्चे को देखा। फिर स्वभाव से दयामय उस मुनि ने तृण के धान्य से उसको बड़ा किया। फिर बिलाव उस चूहे को खाने के लिए दौड़ा। उसे देख कर चूहा उस मुनि की गोद में चला गया। फिर मुनि ने कहा कि, हे चूहे, तू बिलाव हो जाए। फिर वह बिलाव कुत्ते को देखकर भागने लगा। फिर मुनि ने कहा -- तू कुत्ते से डरता है ? जा तू भी कुत्ता हो जा। बाद में वह कुत्ता बाघ से डरने लगा। फिर उस मुनि ने उस कुत्ते को बाघ बना दिया।&lt;br /&gt;       वह मुनि, उस बाघ को," यह तो चूहा है, यही समझता और देखता था। उस मुनि को और व्याघ्र को देखकर लोग कहा करते थे कि इस मुनि ने इस चूहे को बाघ बना दिया है। यह सुन कर बाघ सोचेन लगा -- जब तक यह मुनि जिंदा रहेगा, तब तक यह मेरा अपयश करने वाले स्वरुप की कहानी नहीं मिटेगी। यह विचार कर चूहा उस मुनि को मारने के लिए चला, फिर मुनि ने यह जान कर, फिर चूहा हो जा, यह कह कर उसे पुनः चूहा बना दिया।&lt;/span&gt;        &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px; font-weight: bold;" align="left"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);font-family:Gargi;font-size:130%;"  &gt;कथा २: &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-family:Gargi;font-size:130%;"  &gt;बूढ़े बगुले, केंकड़े और मछली&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px; font-weight: bold;" align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px; font-weight: bold;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;&lt;span style="font-weight: normal;"&gt;मालव देश में पद्मगर्भ नामक एक सरोवर है। वहाँ एक       बूढ़ा बगुला सामर्थ्यरहित सोच में       डूबे हुए के समान अपना स्वरुप बनाये       बैठा था। तब किसी कर्कट ने उसे देखा       और पूछा-- यह क्या बात है ? तुम भूखे       प्यासे यहाँ क्यों बैठे हो ? बगुला कहा --       मच्छ (मछली) मेरे जीवनमूल हैं। उन्हें धीवर आ कर       मारेंगे यह बात मैंने नगर के पास       सुनी है। इसलिए जीविका के न रहने       से मेरा मरण ही आ पहुँचा, यह जान कर       मैंने भोजन में भी अनादर कर रक्खा है। फिर       मच्छों ने सोसा -- इस समय तो यह       उपकार करने वाला ही दिखता है, इसलिए इसी       से       जो कुछ करना है सो पूछना चाहिये।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; जैसा कहा है कि -- उपकारी शत्रु के साथ मेल करना चाहिये और अपकारी मित्र के साथ नहीं करना चाहिये, क्योंकि निश्चय करके उपकार और अपकार ही मित्र और शत्रु के लक्षण हैं।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;मच्छ बोले-- हे बगुले, इसमें रक्षा का कौन सा उपाय है ? तब बगुला बोला-- दूसरे सरोवर का आश्रय लेना ही रक्षा का उपाय है। वहाँ मैं एक- एक करके तुम सबको पहुँचा देता हूँ। मच्छ बोले-- अच्छा, ले चला। बाद में यह बगुला उन मच्छों को एक एक करनके ले जाकर खाने लगा। इसके बाद कर्कट उससे बोला-- हे बगुले, मुझे भी वहाँ ले चल। फिर अपूर्व कर्कट के माँस का लोभी बगुले ने आदर से उसे भी वहाँ ले जा कर पटपड़ में धरा। कर्कट भी मच्छों की हड्डियों से बिछे हुए उस पड़ाव को देख कर चिंता करने लगा-- हाय मैं मन्दभागी मारा गया। जो कुछ हो, अब समय के अनुसार उचित काम कर्रूँगा। यह विचार कर कर्कट ने उसकी नाड़ काट डाली और बगुला मर गया।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px; font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;कथा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;३&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;:&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;      &lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सुंद उपसुंद नामक दो दैत्य&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px; font-weight: bold;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px; font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;&lt;span style="font-weight: normal;"&gt;बहुत पहले उदार सुन्द और उपसुंद नामक दो दैत्य       थे। दोनों ने तीनों लोक की इच्छा से बहुत       काल तक महादेव की तपस्या की। फिर       उन दोनों पर भगवान ने प्रसन्न होकर यह कहा       कि, ""वर माँगो।'' फिर हृदय में स्थित       सरस्वती की प्रेरणा से प्रेरित होकर       वे दोनों, माँगना तो कुछ और चाहते थे       और कुछ का कुछ कह दिया कि जो आप हम दोनों       पर प्रसन्न हैं, तो परमेश्वर अपनी प्रिया       पार्वती जी को दे दें।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;        &lt;span style="font-weight: normal;"&gt;बाद में भगवान ने क्रोध से वरदान देने की       आवश्यकता से उन विचारहीन मूखाç को       पार्वती जी दे दी। तब उसके रुप और       सुंदरता से लुभाये संसार के       नाश करने वाले, मन में उत्कंठित, काम       से अंधे तथा "यह मेरी है, मेरी है' ऐसा       सोच कर आपस में झगड़ा करने वाले इन दोनों       की, ""किसी निर्णय करने वाले पुरुष       से पूछना चाहिए। ऐसी बुद्धि करने पर       स्वयं ईश्वर बूढ़े ब्राह्मण के वेश में आ कर वहाँ       उपस्थित हुए। बाद में हम दोनों ने अपने बल       से       इनको पाया है, हम दोनों में से यह किसकी है? दोनों ने       ब्राह्मण से पूछा।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; ब्राह्मण       बोला-- वणाç में श्रेष्ठ होने से ब्राह्मण,       बली होने से क्षत्रिय, अधिक धन- धान्य होने       से वैश्य और इन तीनों वणाç की सेवा       से शूद्र पूज्य होता है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  इसलिए तुम दोनों क्षत्रिय धर्म पर चलने       वाले होने से तुम दोनों का युद्ध ही नियम है। ऐसा कहते       ही, ""यह इसने अच्छा कहा'' यह कह कर       समान बल वाले वे दोनों एक ही समय       आपस में लड़ कर मर गये।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;कथा&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;४&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;:&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;b style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;"&gt;एक       ब्राह्मण, बकरा और तीन ठग&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;गौतम के वन में किसी ब्राह्मण ने यज्ञ करना आरंभ किया था। और उसको यज्ञ के लिए दूसरे गाँव से बकरा मोल ले कर कंधे पर रख कर ले जाते हुए तीन ठगों ने देखा। फिर उन ठगों ने ""यह बकरा किसी उपाय से मिल जाए, तो बुद्धि की चालाकी बढ़ जाए'' यह सोच कर तीनों तीन वृक्षों के नीचे, एक एक कोस की दूरी पर बैठ गए। और उस ब्राह्मण के आने की बाट देखने लगे। वहाँ एक धूर्त ने जा कर उस ब्राह्मण से कहा-- हे ब्राह्मण, यह क्या बात है कि कुत्ता कंधे पर लिये जाते हो ? ब्राह्मण ने कहा -- यह कुत्ता नहीं है, यज्ञ का बकरा है। थोड़ी दूर जाने के बाद दूसरे धूर्त ने वैसा ही प्रश्न किया। यह सुन कर ब्राह्मण बकरे को धरती पर रखकर बार- बार देखने लगा फिर कंधे पर रख कर चला पड़ा&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  क्योंकि       सज्जनों की भी बुद्धि दुष्टों के वचनों       से सचमुच चलायमान हो जाती है, जैसे दुष्टों की       बातों से विश्वास में आ कर यह ब्राह्मण       ऊँट के समान मरता है।&lt;br /&gt;       थोड़ी दूर चलने के बाद पुनः तीसरे धूर्त ने       ब्राह्मण से वैसी ही बात कही। उसकी बात       सुन कर ब्राह्मण की बुद्धि का ही भ्रम समझ कर       बकरे को छोड़ कर ब्राह्मण नहा कर घर       चलागया। उन धूताç ने उस बकरे को ले जा कर खा       लिया।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px; font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);font-family:Gargi;font-size:130%;"  &gt;कथा ५: &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;      &lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;माधव ब्राह्मण, उसका बालक, &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-family:Gargi;font-size:130%;"  &gt;नेवला       और साँप&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px; font-weight: bold;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;उज्जयिनी नगरी में माधव नामक ब्राह्मण रहता था। उसकी ब्राह्मणी के एक बालक हुआ। वह उस बालक की रक्षा के लिये ब्राह्मण को बैठा कर नहाने के लिये गई। तब ब्राह्मण के लिए राजा का पावन श्राद्ध करने के लिए बुलावा आया। यह सुन कर ब्राह्मण ने जन्म के दरिद्री होने से सोचा कि "जो मैं शीघ्र न गया तो दूसरा कोई सुन कर श्राद्ध का आमंत्रण ग्रहण कर लेगा।&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; शीघ्र न किये गये लेन- देन और करने के काम का रस समय पी लेता है।&lt;br /&gt;       परंतु बालक का यहाँ रक्षक नहीं है, इसलिये क्या कर्रूँ ? जो भी हो बहुत दिनों से पुत्र से भी अधिक पाले हुए इस नेवले को पुत्र की रक्षा के लिए रख कर जाता हूँ। ब्राह्मण वैसा करके चला गया, फिर वह नेवला बालक के पास आते हुए काले साँप को देखकर, उसे मार कोप से टुकड़े- टुकड़े करके खा गया। फिर वह नेवला ब्राह्मण को आता देख लहु से भरे हुए मुख औरपैर किये शीघ्र पास आ कर उसके चरणों पर लोट गया। फिर उस ब्राह्मण ने उसे वैसा देख कर सोचा कि इसने मेरे बालक को खा लिया है। ऐसा समझ कर नेवले को मार डाला। बाद में ब्राह्मण ने जब बालक के पास आ कर देखा तो बालक आनंद में है और सपं मरा हुआ पड़ा है। फिर उस उपकारी नेवले को देख कर मन में घबड़ा कर बड़ा दुखी हुआ।&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  काम,       क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार तथा मद       इन छः बातों को छोड़ देना       चाहिये, और इसके त्याग से ही राजा       सुखी होता है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px; font-weight: bold;"&gt;        &lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="center"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:180%;"&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3486815723019470360-3857233406868940951?l=anuragshandilyahindi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anuragshandilyahindi.blogspot.com/feeds/3857233406868940951/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3486815723019470360&amp;postID=3857233406868940951&amp;isPopup=true' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3486815723019470360/posts/default/3857233406868940951'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3486815723019470360/posts/default/3857233406868940951'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anuragshandilyahindi.blogspot.com/2008/12/blog-post_6058.html' title='हितोपदेश की कथाएँ- संधि'/><author><name>ANURAG SHANDILYA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09780770213161059080</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3486815723019470360.post-5627828843669648521</id><published>2008-12-18T23:13:00.000+05:30</published><updated>2008-12-18T23:24:44.922+05:30</updated><title type='text'>हितोपदेश की कथाएँ- विग्रह</title><content type='html'>&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;कथा&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;१&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;:&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);font-family:Gargi;font-size:130%;"  &gt;पक्षी और       बन्दर&lt;/span&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:180%;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;नर्मदा के तीर पर एक बड़ा सेमर का वृक्ष है। उस पर पक्षी घोंसला बनाकर उसके भीतर, सुख से रहा करते थे। फिर एक दिन बरसात में नीले- नीले बादलों से आकाशमंडल के छा जाने पर बड़ी- बड़ी बूँदों से मूसलाधार बारिश बरसने लगा और फिर वृक्ष के नीचे बैठे हुए बंदरों को ठंडी के मारे थर थर काँपते हुए देख कर पक्षियों ने दया से विचार कहा-- अरे भाई बंदरों, सुनों :-&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; हमने केवल अपनी चोंचों की मदद से इकट्ठा किये हुए तिनकों से घोंसले बनाये हैं और तुम तो हाथ, पाँव आदि से युक्त हो कर भी ऐसा दुख क्यों भोग रहे हो ?&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;यह सुन कर बंदरों ने झुँझला कर विचारा -- अरे, पवनरहित घोंसलों के भीतर बैठे हुए सुखी पक्षी हमारी निंदा करते हैं, करने दो। जब तक वर्षा बंद हो बाद जब पानी का बरसना बंद हो गया, तब उन बंदरों ने पेड़ पर चढ़ कर सब घोंसले तोड़ डाले और उनके अंडे नीचे गिरा दिया।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px; font-weight: bold;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;कथा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;२&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;:&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-family:Gargi;font-size:130%;"  &gt;बाघंबर ओढ़ा हुआ धोबी का गधा &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-family:Gargi;font-size:130%;"  &gt;और       खेतवाले&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px; font-weight: bold;" align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px; font-weight: bold;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;हस्तिनापुर में एक विलास नामक धोबी रहता था। उसका गधा अधिक बोझ ढ़ोने से दुबला मरासू- सा हो गया था। फिर उस धोबी ने इसे बाघ की खाल ओढ़ा कर वन के पास नाज के खेत में रख दिया। &lt;/span&gt;        &lt;/p&gt;        &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;फिर दूर       से उसे देख कर और बाघ समझ, खेत       वाले शीघ्र भाग जाते थे। इसके अनन्तर एक दिन कोई खेत का       रखवाला धूसर रंग का कंबल ओढ़े हुए धनुष       बाण चढ़ा कर शरीर को ओढ़ कर एकांत       में बैठ गया।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;उधर मन माना अन्न चरने से बलवान हुआ गधा, उसे देखकर गधा जान कर ढ़ेंचू- ढ़ेंचू स्वर में रेंकता हुआ उसके सामने दौड़ा। तब खेतवाले ने, रेंकने के शब्द से इसको गधा निश्चय करके सहज में ही मार डाला।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px; font-weight: bold;" align="left"&gt;        &lt;/p&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;font-size:130%;" &gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;कथा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;३&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;:&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);font-family:Gargi;font-size:130%;"  &gt;हाथियों का       झुंड और &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);font-family:Gargi;font-size:130%;"  &gt;बूढ़े       &lt;span&gt;शशक&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;किसी समय वर्षा के मौसम में वर्षा न होने से प्यास के मारे हाथियों का झुंड अपने स्वामी से कहने लगा -- हे स्वामी, हमारे जीने के लिए अब कौन- सा उपाय है ? छोटे- छोटे जंतुओं को नहाने के लिए भी स्थान नहीं है और हम तो स्नान के लिए स्थान न होने से मरने के समान है। क्या करें ? कहाँ जाएँ ? हाथियों के राजा ने समीप ही जो एक निर्मल सरोवर था, वहाँ जा कर दिखा दिया। फिर कुछ दिन बाद उस सरोवर के तीर पर रहने वाले छोटे- छोटे शशक हाथियों के पैरों की रेलपेल में खुँद गये। बाद में शिलीमुख नामक शशक सोचने लगा -- प्यास के मारे यह हाथियों का झुंड, यहाँ नित्य आएगा। इसलिए हमारा कुल तो नष्ट हो जाएगा। फिर विजय नामक एक बूढ़े शशक ने कहा -- खेद मत करो। मैं इसका उपाय कर्रूँगा। फिर वह प्रतिज्ञा करके चला गया, और चलते- चलते इसने सोचा -- कैसे हाथियों के झुंड के पास खड़े हो कर बातचीत करनी चाहिए।&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;                  &lt;/blockquote&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span&gt;अर्थात&lt;/span&gt; हाथी स्पर्श से ही, साँप सूँघने से ही, राजा रक्षा करता हुआ भी और दुर्जन       हँसता हुआ भी मार डालता है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;        इसलिए मैं पहाड़ की चोटी पर बैठ कर झुंड के स्वामी से अच्छी प्रकार से बोलूँ। ऐसा करने पर झुंड का स्वामी बोला -- तू कौन है ? कहाँ से आया है ? वह बोला -- मैं शशक हूँ। भगवान चंद्रमा ने आपके पास भेजा है। झुंड के स्वामी ने कहा -- क्या काम है बोल ? विजय बोला :-&lt;br /&gt;       अर्थात, मारने के लिए शस्र उठाने पर भी दूत अनुचित नहीं करता है, क्योंकि सब काल में नहीं मारे जाने से (मृत्यु की भीति न होने से) वह निश्चय करके सच्ची ही बात बोलने वाला होता है।&lt;br /&gt;       इसलिए मैं उनकी आज्ञा से कहता हूँ, सुनिये -- जो ये चंद्रमा के सरोवर के रखवाले शशकों को निकाल दिया है, वह अनुचित किया। वे शशक हमारे बहुत दिन से रक्षित हैं, इसलिये मेरा नाम ""शशांक'' प्रसिद्ध है। दूत के ऐसा कहते ही हाथियों का स्वामी भय से यह बोला -- सोच लो, यह बात अनजानपन की है। फिर नहीं करुँगा। दूत ने कहा -- जो ऐसा है तो उसे सरोवर में क्रोध से काँपते हुए भगवान चंद्रमाजी को प्रणाम कर और प्रसन्न करके चला जा। फिर रात को झुंड के स्वामी को ले जा कर ओर जल में हिलते हुए चंद्रमा के गोले को दिखला कर झुंड के स्वामी से प्रणाम कराया और इसने कहा-- हे महाराज, भूल से इसने अपराध किया है, इसलिए क्षमा कीजिये, फिर दूसरी बार नहीं करेगा। यह कह कर विदा लिया।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;कथा&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;४&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;:&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;b style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;"&gt;हंस, कौआ       और &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;"&gt;एक       मुसाफिर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;उज्जयिनी के मार्ग में एक पाकड़ का पेड़ था। उस पर हंस और काग रहते थे। एक दिन गरमी के समय थका हुआ, कोई मुसाफिर उस पेड़ के नीचे धनुषबाण रखकर सो गया। वहाँ थोड़ी देर में उसके मुख पर से वृक्ष की छाया ढल गई। फिर सूर्य के तेज से उसके मुख को तपता हुआ देख कर उस पेड़ पर बैठे हुए हँस ने दया विचार कर पंखों को पसार फिर उसके मुख पर छाया कर दी। फिर गहरी नींद के आनंद से उसने मुख फाड़ दिया।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;बाद में पराये सुख को नहीं सहने वाला वह काब दुष्ट स्वभाव से उसके मुख में बीट करके उड़ गया। फिर जो उस बटोही ने उठ कर ऊपर जब देखा तब हंस दीख गया, उसे बाण मारा उसे बाण से मार दिया और हंस मर गया।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;कथा&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;५&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;:&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;b style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;"&gt;      &lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;नील में रंगे हुए एक गीदड़ &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;"&gt;की       मृत्यु&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;एक समय वन में कोई गीदड़ अपनी इच्छा से नगर के पास घूमते घूमते नील के हौद में गिर गया। बाद में उसमें से निकल नहीं सका, प्रातःकाल अपने को मरे के समान दिखलाकर बैठ गया। फिर नील के हौद के स्वामी ने उसे मरा हुआ जान कर और उसमें से निकाल कर दूर ले जाकर फेंक दिया और वहाँ से वह भाग गया। तब उसने वन में जा कर और अपनी देह को नीले रंग की देख कर विचार किया -- मैं अब उत्तम वर्ण हो गया हूँ, तो मैं अपनी प्रभुता क्यों न कर्रूँ ? यह सोच कर सियारों को बुलाकर उसने कहा -- श्रीभगवती वनकी देवीजी ने अपने हाथ से वन के राज्य पर सब ओषधियों के रस से मेरा राजतिलक किया है, इसलिये आज से ले कर मेरी आज्ञा से काम करना चाहिये। अन्य सियार भी उसको अच्छा वर्ण देख कर साष्टांग दंडवत प्रणाम करके बोले -- जो महाराज की आज्ञा।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;इसी प्रकार से क्रम क्रम से सब वनवासियों में उसका राज्य फैल गया। फिर उसने अपनी जात से चारों ओर बैठा कर अपना अधिकार फैलाया, बाद में उसने व्याघ्र सिंह आदि उत्तम मंत्रियों को पा कर सभा में सियारों को देख कर लाज के मारे अनादर से सब अपने जात भाइयों को दूर कर दिया। फिर सियारों को विकल देख कर किसी बूढ़े सियार ने यह प्रतिज्ञा की कि तुम खेद मत करो। जैसे इस मूर्ख ने नीति तथा भेद के जानने वाले हम सभी का अपने पास से अनादर किया है, वैसे ही जिस प्रकार यह नष्ट हो सो करना चाहिये। क्योंकि ये बाघ आदि, केवल रंग से धोखे में आ गये हैं और सियार न जान कर इसको राजा मान रहे हैं। जिससे इसका भेद खुल जाए सो करो। और ऐसा करना चाहिये कि संध्या के समय उसके पास सभी एक साथ चिल्लओ। फिर उस शब्द को सुन कर अपने जाति के स्वभाव से वह भी चिल्ला उठेगा। फिर वैसा करने पर वही हुआ अर्थात उसकी पोल खुल गई।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; अर्थात जिसका जैसा       स्वभाव है, वह सर्वदा छूटना कठिन है, जैसे       यदि कुत्ते को राजा       कर दिया जाए, तो क्या वह जूते को नहीं       चबाएगा ?&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px; font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;कथा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;६&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;:&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-family:Gargi;font-size:130%;"  &gt;राजकुमार और उसके पुत्र &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-family:Gargi;font-size:130%;"  &gt;के       बलिदान&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px; font-weight: bold;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; किसी समय शूद्रक नामक राजा राज्य किया करता था। उसके राज्य में वीरवर नामक महाराजकुमार किसी देश से आया और राजा की ड्योढ़ी पर आ कर द्वारपाल से बोला, मैं राजपुत्र हूँ, नौकरी चाहता हूँ। राजा का दर्शन कराओ। फिर उसने उसे राजा का दर्शन कराया और वह बोला-- महाराज, जो मुझ सेवक का प्रयोजन हो तो मुझे नौकर रखिये, शूद्रक बोला - तुम कितनी तनख्वाह चाहते हो ? वीरवर बोला -- नित्य पाँच सौ मोहरें दीजिये। राजा बोला -- तेरे पास क्या- क्या सामग्री है ? वीरवर बोला -- दो बाँहें ओर तीसरा खड्ग। राजा बोला यह बात नहीं हो सकती है। यह सुनकर वीरवर चल दिया।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;फिर मंत्रियों ने कहा-- हे महाराज, चार दिन का वेतन दे कर इसका स्वरुप जान लीजिये कि यह क्या उपयागी है, जो इतना धन लेता है या उपयोगी नहीं है। फिर मंत्री के वचन से बुलवाया और वीरवर को बीड़ा देकर पाँच सौ मोहरें दे दी। और उसका काम भी राजा ने छुप कर देखा। वीरवर ने उस धन का आधा देवताओं को और ब्राह्मणों को अपंण कर दिया। बचे हुए का आधा दुखियों को, उससे बचा हुआ भोजन के तथा विलासादि में खर्च किया। यह सब नित्य काम करके वह राजा के द्वार पर रातदिन हाथ में खड्ग लेकर सेवा करता था और जब राजा स्वयं आज्ञा देता, तब अपने घर जाता था।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;फिर एक समय कृष्णपक्ष की चौदस के दिन, रात को राजा को करुणासहित रोने का शब्द सुना। शूद्रक बोला -- यहाँ द्वार पर कौन- कौन है ? उसने कहा -- महाराज, मैं वीरवर हूँ। राजा ने कहा -- रोने की तो टोह लगाओं। जो महाराज की आज्ञा, यह कहकर वीरवर चल दिया और राजा ने सोचा-- यह बात उचित नहीं है कि इस राजकुमारों को मैंने घने अंधेरे में जाने की आज्ञा दी। इसलिये मैं उसके पीछे जा कर यह क्या है, इसका निश्चय कर्रूँ।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;फिर राजा भी खड्ग लेकर उसके पीछे नगर से बाहर गया और वीरवर ने जा कर उस रोती हुई, रुप तथा यौवन से सुंदर और सब आभूषण पहिने हुए किसी स्री को देखा और पूछा -- तू कौन है ? किसलिये रोती है ? स्री ने कहा -- मैं इस शूद्रक की राजलक्ष्मी हूँ। बहुत काल से इसकी भुजाओं की छाया में बड़े सुख से विश्राम करती थी। अब दूसरे स्थान में जाऊँगी। वीरवर बोला -- जिसमें नाश का संभव है, उसमें उपाय भी है। इसलिए कैसे फिर यहाँ&lt;br /&gt;आपका रहना होगा ? लक्ष्मी बोली -- जो तू बत्तीस लक्षणों से संपन्न अपने पुत्र शक्तिधर को सर्वमंगला देवी की भेंट करे, तो मैं फिर यहाँ बहुत काल तक रहूँ। यह कह कर वह अंतर्धान हो गई।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;फिर वीरवर ने अपने घर जा कर सोती हुई अपनी स्री को और बेटे को जगाया। वे दोनों नींद को छोड़, उठ कर खड़े हो गये। वीरवर ने वह सब लक्ष्मी का वचन उनको सुनाया। उसे सुन कर शक्तिधर आनंद से बोला -- मैं धन्य हूँ, जो ऐसे, स्वामी के राज्य की रक्षा के लिए मेरा उपयोग प्रशंसनीय है। इसलिए अब विलंब का क्या कारण है ? ऐसे काम में देह का त्याग प्रशंसनीय है।&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; अर्थात, पण्डित को परोपकार के लिए धन और प्राण छोड़ देने चाहिए, विनाश तो निश्चत होगा ही, इसलिये अच्छे कार्य के लिए प्राणों का त्याग श्रेष्ठ है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;शक्तिधर की माता बोली -- जो यह नहीं करोगे तो और किस काम से इस बड़े वेतन के ॠण से उनंतर होगे ? यह विचार कर सब सर्वमंगला देवी के स्थान पर गये। वहाँ सर्वमंगला देवी की पूजा कर वीरवर ने कहा -- हे देवी, प्रसन्न हो, शूद्रक महाराज की जय हो, जय हो। यह भेंट लो। यह कह कर पुत्र का सिर काट डाला। फिर वीरवर सोचने लगा कि -- लिये हुए राजा के ॠण को तो चुका दिया। अब बिना पुत्र के जीवित किस काम का ? यह विचार कर उसने अपना सिर काट दिया। फिर पति और पुत्र के शोक से पीड़ित स्री ने भी अपना सिर काट डाला, तब राजा आश्चर्य से सोचने लगा,&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; अर्थात, मेरे समान नीच प्राणी संसार में जीते हैं और मरते भी हैं, परंतु संसार में इसके समान न हुआ और न होगा।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;इसलिए ऐसे महापुरुष से शून्य इस राज्य से मुझे भी क्या प्रयोजन है बाद में शूद्रक ने भी अपना सिर काटने को खड्ग उठाया। तब सर्वमंगला देवी ने राजा का हाथ रोका और कहा-&lt;br /&gt;हे पुत्र, मैं तेरे ऊपर प्रसन्न हूँ, इतना साहस मत करो। मरने के बाद भी तेरा राज्य भंग नहीं होगा। तब राजा साष्टांग दंडवत और प्रणाम करके बोला -- हे देवी, मुझे राज्य से क्या है या जीन से भी क्या प्रयोजन है ? जो मैं कृपा के योग्य हूँ तो मेरी शेष आयु से स्री पुत्र सहित वीरवर जी उठे। नहीं तो मैं अपना सिर काट डालूँगा। देवी बोली"-- हे पुत्र, जाओ तुम्हारी जय हो। यह राजपुत्र भी परिवार सहित जी उठे। यह कह कर देवी अन्तध्र्यान हो गई। बाद में वीरवर अपने स्री- पुत्र सहित घर को गया। राजा भी उनसे छुप कर शीघ्र रनवास में चला गया।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;इसके उपरांत प्रातःकाल राजा ने ड्योढ़ी पर बैठे वीरवर से फिर पूछा और वह बोला- हे महाराज, वह रोती हुई स्री मुझे देखकर अंतध्र्यान हो गई, और कुछ दूसरी बात नहीं थी। उसका वचन सुन कर राजा सोचने लगा --""इस महात्मा की किस प्रकार बड़ाई कर्रूँ।''&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; क्योंकि, उदार पुरुष को मीठा बोलना चाहिये, शूर को अपनी प्रशंसा नहीं करनी चाहिये, दाता को कुपात्र में दान नहीं करना चाहिए और उचित कहने वाले को दयारहित नहीं होना चाहिये।&lt;br /&gt;       यह महापुरुष का लक्षण इसमें सब है। बाद में राजा ने प्रातःकाल शिष्ट लोगों की सभा करके और सब वृत्तांत की प्रशंसा करके प्रसन्नता से उसे कर्नाटक का राज्य दे दिया।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px; font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;कथा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;७&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;:&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-family:Gargi;font-size:130%;"  &gt;एक       क्षत्रिय, नाई और &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-family:Gargi;font-size:130%;"  &gt;भिखारी&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px; font-weight: bold;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; अयोध्या में चूड़ामणि नामक एक क्षत्रिय रहता था। उसे धन की बहुत तंगी थी। उसने भगवान महादेवजी की बहुत समय तक आराधना की। फिर जब वह क्षीणपाप हो गया, तब महादेवजी की आज्ञा से कुबेर ने स्वप्न में दर्शन दे कर आज्ञा दी कि जो तुम आज प्रातःकाल और क्षौर कराके लाठी हाथ में लेकर घर में एकांत में छुप कर बैठोगे, तो उसी आँगन में एक भिखारी को आया हुआ देखोगे। जब तुम उसे निर्दय हो कर लाठी की प्रहारों से मारोगे तब वह सुवर्ण का कलश हो जाएगा। उससे तुम जीवनपर्यन्त सुख से रहोगे। फिर वैसा करने पर वही बात हुई। वहाँ से गुजरते हुए नाई ने यह सब देख लिया। नाई सोचने लगा-- अरे, धन पाने का यही उपाय है, मैं भी ऐसा क्योंन कर्रूँ ? &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;        &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;"&gt;  &lt;/p&gt;        &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px; font-weight: bold;"&gt;        &lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; फिर उस दिन से नाई वैसे ही लाठी हाथ में लिए हमेशा छिप कर भिखारी के आने की राह देखता रहता था। एक दिन उसने भिखारी को पा लिया और लाठी से मार डाला। अपराध से उस नाई को भी राजा के पुरुषों ने मार डाला।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="center"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;"&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px; font-weight: bold;"&gt;        &lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="center"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;"&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;       &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:180%;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;        &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:180%;"&gt;&lt;br /&gt; &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;       &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="center"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:180%;"&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3486815723019470360-5627828843669648521?l=anuragshandilyahindi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anuragshandilyahindi.blogspot.com/feeds/5627828843669648521/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' 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src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3486815723019470360.post-8863284870174832573</id><published>2008-12-18T23:00:00.000+05:30</published><updated>2008-12-18T23:11:03.496+05:30</updated><title type='text'>हितोपदेश की कथाएँ- सुहृद्भेद</title><content type='html'>&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;कथा&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;१&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;:&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;b style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;"&gt;बनिया, बैल, सिंह और &lt;span&gt;गीदड़&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; दक्षिण दिशा में सुवर्णवती नामक नगरी है, उसमे वर्धमान नामक एक बनिया रहता था। उसके पास बहुत- सा धन भी था, परंतु अपने दूसरे भाई- बंधुओं को अधिक धनवान देखकर उसकी यह लालसा हुई, कि और अधिक धन इकट्ठा करना चाहिए।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;       अपने से नीचे नीचे (हीन) अर्थात दरिद्रियों को देख कर किसकी महिमा नहीं       बढ़ती है?&lt;br /&gt;       अर्थात सबको अभिमान बढ़ जाता है और अपने से ऊपर अर्थात अधिक धनवानों को देखकर सब लोग अपने को दरिद्री समझते हैं।&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; जिसके पास बहुत सा धन है, उस ब्रह्मघातक मनुष्य का भी सत्कार होता है और चंद्रमा के समान अतिनिर्मल वंश में उत्पन्न हुए भी निर्धन मनुष्य का अपमान किया जाता है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;जैसे नवजवान स्री बूढ़े पति को नहीं चाहती है, वैसे ही लक्ष्मी भी निरुद्योगी, आलसी, ""प्रारब्ध में जो लिखा है, सो होगा'' ऐसा भरोसा रख कर चुपचाप बैठने वाले, तथा पुरुषार्थ हीन मनुष्य को नहीं चाहती है।&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  और भी आलस्य, स्री की सेवा, रोगी रहना, जन्मभूति का स्नेह, संतोष और डरपोकपन ये छः बातें उन्नति के लिये बाधक है।&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  जो मनुष्य थोड़ी सी संपत्ति से अपने को सुखी मानता है, विधाता समाप्तकार्य मान कर उस मनुष्य की उस संपत्ति को नहीं बढ़ाता है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;निरुत्साही, आनंदरहित, पराक्रमहीन और शत्रु को प्रसन्न करने वाले ऐसे पुत्र को कोई स्री न जने अर्थात ऐसे पुत्र का जन्म न होना ही अच्छा है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;नहीं पाये धन के पाने की इच्छा करना, पाये हुए धन की चोरी आदि नाश से रक्षा करना, रक्षा किये हुए धन को व्यापार आदि से बढ़ाना और अच्छी तरह बढ़ाए धन को सत्पात्र में दान करना चाहिए।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;क्योंकि लाभ की इच्छा करने वाले को धन मिलता ही है एवं प्राप्त हुए परंतु रक्षा नहीं किये गये खजाने का भी अपने आप नाश हो जाता है और भी यह है कि बढ़ाया नहीं गया धन कुछ काल में थोड़ा व्यय हो कर काजल के समान नाश हो जाता है और नहीं भोगा गया भी खजाना वृथा है।&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; उस धन से क्या है ? जो न देता है और न खाता है, उस बल से क्या है ? जो वैरियों को नहीं सताता है, उस शास्र से क्या है ? जो धर्म का आचरण नहीं करता है और उस आत्मा से क्या है ? जो जितेंद्रिय नहीं है।&lt;br /&gt;  जैसे जल की एक बूँद के गिरने से धीरे- धीरे घड़ा भर जाता है, वही कारण सब कारण सब प्रकार की विद्याओं का, धन का और धर्म का भी है।&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  दान और भोग के बिना जिसके दिन जाते हैं, वह लुहार की धोंकनी के समान सांस लेता हुआ भी मरे के समान है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;यह सोच कर नंदक और संजीवक नामक दो बैलों को जुए में जोतकर और छकड़े को नाना प्रकार की वस्तुओं से लादकर व्यापार के लिए कश्मीर की ओर गया।&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  काजल के क्रम से घटने को और वाल्मीक नामक चीटी के संचय को देखकर, दान, पड़ना और कामधंधा में दिन को सफल करना चाहिए।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;        &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;  &lt;/p&gt;        &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; बलवानों को अधिक       बोझ क्या है ? और उद्योग करने वालों को क्या दूर है ? और विद्यावानों को विदेश क्या है ? और       मीठे बोलने वालों का शत्रु कौन है ?&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  फिर उस जाते हुए का , सुदुर्ग नामक घने       वन में , संजीवक घुटना टूटने से गिर पड़ा।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  यह देखकर वर्धमान चिंता करने लगा - नीति जानने       वाला इधर- उधर भले ही व्यापार करे, परंतु उसको       लाभ उतना ही होता है, कि जितना विधाता के जी       में है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  सब कार्यों को रोकने वाले संशय को छोड़ देना चाहिये, एवं संदेह को छोड़ कर, अपना कार्य सिद्ध करना चाहिये।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  यह विचार कर संजीवक को वहाँ छोड़ कर फिर       वर्धमान आप धर्मपुर नामक नगर में जा कर एक दूसरे       बड़े शरीर वाले बैल को ला कर जुए       में जोत कर चल दिया। फिर संजीवक       भी बड़े कष्ट से तीन खुरों के सहारे उठ कर खड़ा हुआ।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;       समुद्र में डूबे हुए की, पर्वत से गिरे हुए की और तक्षक नामक       सपं से डसे हुए की आयु की प्रबलता       मर्म (जीवनस्थान) की रक्षा करती है।&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  दैव       से रक्षा किया हुआ, बिना रक्षा के भी ठहरता है और       अच्छी तरह रक्षा किया हुआ भी, दैव का       मारा हुआ नहीं बचता है, जैसे वन       में छोड़ा हुआ सहायताहीन भी जीता रहता है, घर पर कई उपाय करने       से भी नहीं जीता है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  फिर बहुत दिनों के बाद संजीवक अपनी इच्छानुसार खाता पीता       वन में फिरता- फिरता हृष्ट- पुष्ट हो कर ऊँचे       स्वर से डकराने लगा। उसी वन में पिंगलक नामक एक सिंह अपनी       भुजाओं से पाये हुए राज्य के सुख का       भोग करता हुआ रहता था।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  जैसा कहा गया है, मृगों ने सिंह का न तो       राज्यतिलक किया और न संस्कार किया, परंतु सिंह अपने आप ही पराक्रम       से राज् को पा कर मृगों का राजा होना दिखलाता है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;        &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;  &lt;/p&gt;        &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; और वह एक दिन प्यास       से व्याकुल होकर पानी पीने के लिए       यमुना के किनारे गया और वहाँ उस सिंह ने नवीन ॠतुकाल के       मेघ की गर्जना के समान संजीवक का डकराना       सुना। यह सुन कर पानी के बिना पिये वह घबराया       सा लौट कर अपने स्थान पर आ कर यह क्या है ? यह       सोचता हुआ चुप- सा बैठ गया और उसके       मंत्री के बेटे दमनक और करटक दो गीदड़ों ने उसे       वैसा बैठा देखा। उसको इस दशा में देख कर दमनक ने करटक       से कहा- भाई करटक, यह क्या बात है कि प्यासा       स्वामी पानी को बिना पीये डर से धीरे- धीरे आ       बैठा है ?  करटक बोला-- भाई दमनक, हमारी       समझ से तो इसकी सेवा ही नहीं की जाती है। जो ऐसे       बैठा भी है, तो हमें स्वामी की चेष्ठा का निर्णय करने       से क्या प्रयोजन है ? क्योंकि इस राजा       से बिना अपराध बहुत काल तक तिरस्कार किये गये हम दोनों ने       बड़ा दुख सहा है।&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; सेवा       से धन को चाहने वाले सेवकों ने जो किया,       सो देख कि शरीर की स्वतंत्रता भी मूखाç ने हार दी है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  और दूसरे पराधीन हो कर जाड़ा, हवा और धूप       में दुखों को सहते हैं और उस दुख के छोटे-       से- छोटे भाग से तप करके बुद्धिमान       सुखी हो सकता है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;       स्वाधीनता का होना ही जन्म की सफलता है और जो पराधीन होने पर भी जीते है, तो       मरे कौन से हैं ? अर्थात वे ही मरे के       समान हैं, जो पराधीन हो कर रहते हैं।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  धनवान पुरुष, आशारुपी ग्रह से भरमाये गये हुए       याचकों के साथ, इधर आ, चला आ, बैठ जा, खड़ा हो,       बोल, चुप सा रह इस तरह खेल किया करते हैं।&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  जैसे       वेश्या दूसरों के लिए सिंगार करती है,       वैसे ही मूखाç ने भी धन के लाभ के       लिए&lt;br /&gt;       अपनी आत्मा को संस्कार करके हृष्ट पुष्ट       बनवा कर पराये उपकार के लिए कर       रखी हैं।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  जो दृष्टि स्वभाव से चपल है और मल,       मूत्र आदि नीची वस्तुओं पर भी गिरती है, ऐसी       स्वामी की दृष्टि का सेवकलोग बहुत गौरव करते हैं।&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  चुपचाप रहने       से मूर्ख, बहुत बातें करने में चतुर होने       से उन्मत्त अथवा बातूनी, क्षमाशील होने       से डरपोक, न सहन सकने से नीतिरहित,       सर्वदा पास रहने से ढ़ीठ और दूर रहने       से घमंडी कहलाता है। इसलिए सेवा का धर्म       बड़ा रहस्यमय है, योगियो से भी पहचाना नहीं जा       सका है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;       विशेष बात यह है कि जो उन्नति के       लिए झुकता है, जीने के लिए प्राण का भी त्याग करता है और       सुख के लिए दुखी होता है, ऐसा सेवक को छोड़कर और कौन       भला मूर्ख हो सकता है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  दमनक बोला-- मित्र, कभी यह बात मन       से भी नहीं करनी चाहिये, क्योंकि खामियों की       सेवा यत्न से क्यों नहीं करनी चाहिये, जो       सेवा से प्रसन्न हो कर शीघ्र मनोरथ पूरे कर देते हैं।       स्वामी की सेवा नहीं करने वालों को चमर के ढ़�लाव       से युक्त ऐश्वर्य और ऊँचे दंड वाले       श्वेत छत्र और घोड़े हाथियों की सेना कहाँ धरी है ?&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  करटक बोला -- तो भी हमको इस काम       से क्या प्रयोजन है ? क्योंकि अयोग्य कामों       में व्यापार करना सर्वथा त्यागने के       योग्य है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;        &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;  &lt;/p&gt;        &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; दमनक ने कहा -- तो भी सेवक को स्वामी के कामों का विचार अवश्य करना चाहिये। करटक बोला -- जो सब काम पर अधिकारी प्रधान मंत्री हो वही करे। क्योंकि सेवक को पराये काम की चर्चा कभी नहीं करनी चाहिये। पशुओं का ढ़ूढ़ना हमारा काम है। अपने काम की चर्चा करो। परंतु आज उस चर्चा से कुछ प्रयोजन नहीं। क्योंकि अपने दोनों के भोजन से बचा हुआ आहार बहुत धरा है। दमनक क्रोध से बोला -- क्या तुम केवल भोजन के ही अर्थी हो कर राजा की सेवा करते हो ? यह तुमने अयोग्य कहा।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  मित्रों के उपकार के लिये, और शत्रुओं के अपकार के       लिए चतुर मनुष्य राजा का आश्रय करते हैं और केवल पेट कौन नहीं       भर लेता है ? अर्थात सभी भरते हैं।&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  जिसके जीने       से ब्राह्मण, मित्र और भाई जीते हैं, उसी का जीवन       सफल है और केवल अपने स्वार्थ के       लिए कौन नहीं जीता है ?&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  जिसके जीने से बहुत से लोग जिये वह तो       सचमुच जिया और यों तो काग भी क्या चोंच       से अपना पेट नहीं भर लेता है ?&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  कोई मनुष्य पाँच पुराण में दासपने को करने       लगता है, कोई लाख में करता है ओर कोई एक       लाख में भी नहीं मिलता है।&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  मनुष्यों को       समान जाति के सेवकाई काम करना अति निन्दित है और       सेवकों में भी जो प्रथम अर्थात सबका       मुखिया नहीं है, क्या वह जीते हुओं       में गिना जा सकता है ? अर्थात उसका जीना और       मरना समान है।&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  हित और अहित के विचार करने       में जडमति वाला, और शास्र के ज्ञान       से रहित होकर जिसकी इच्छा केवल पेट       भरने की ही रहती है, ऐसा पुरुषरुपी पशु और       सचमुच पशु में कौन सा अंतर समझा जा       सकता है ? अर्थात ज्ञानहीन एवं केवल       भोजन की इच्छा रखने वाले से घास खाकर जीने       वाला पशु अच्छा है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  करकट बोला-- हम दोनों मंत्री नहीं है, फिर हमें इस विचार       से क्या ? दमनक बोला- कुछ काल में       मंत्री प्रधानता व अप्रधानता को पाते हैं।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  इस दुनिया में कोई किसी का स्वभाव       से अर्थात जन्म से सुशील अर्थवा दुष्ट नहीं होता है, परंतु मनुष्य को अपने कर्म ही       बड़पन को अथवा नीचपन को पहुँचाते हैं।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  मनुष्य अपने कर्मों से कुए के खोदने वाले के       समान नीचे और राजभवन के बनाने       वाले के समान ऊपर जाता है, अर्थात मनुष्य अपना       उच्च कर्मों से उन्नति को और हीन कर्मों       से अवनति को पाता है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  इसलिये यह ठीक है कि सबकी आत्मा अपने ही       यत्न के अधीन रहती है। करकट बोला-- तुम अब क्या कहते हो ? वह       बोला-- यह स्वामी पिंगलक किसी न किसी कारण       से घबराया- सा लौट करके आ बैठा है। करटक ने कहा-- क्या तुम इसका       भेद जानते हो ?   दमनक बोला-- इसमें नहीं जानने की       बात क्या है ?&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;        &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;  &lt;/p&gt;        &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; जताए हुए अभिप्राय को पशु       भी समझ लेता है और हांके हुए घोड़े और हाथी       भी बोझा ढ़ोते हैं। पण्डित कहे बिना ही       मन की बात तर्क से जान लेता है, क्योंकि पराये चित्त का       भेद जान लेना ही बुद्धियों का फल है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  आकार से , हृदय के भाव से, चाल से, काम       से, बोलने से और नेत्र और मुंह के विकार       से औरों के मन की बात जाल ली जाती है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  इस भय के सुझाव में बुद्धि के बल से मैं इस       स्वामी को अपना कर लूँगा। जो प्रसंग के       समान वचन को, स्नेह के सदृश मित्र को और अपनी       सामर्थ्य के सदृस क्रोध को समझता है, वह       बुद्धिमान है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  करटक बोला-- मित्र, तुम सेवा करना नहीं जानते हो। जो मनुष्य       बिना बुलाये घुसे और बिना पूछे बहुत       बोलता है और अपने को राजा का प्रिय मित्र       समझता है, वह मूर्ख है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  दमनक बोला-- भाई, मैं सेवा करना क्यों नहीं जानता हूँ ? कोई       वस्तु स्वभाव से अच्छी&lt;br /&gt;       और बुरी होती है, जो जिसको रुचती है, वही उसको       सुंदर लगती है।&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; बुद्धिमान को चाहिये कि जिस मनुष्य का जैसा       मनोरथ होय उसी अभिप्राय को ध्यान       में रख कर एवं उस पुरुष के पेट में घुस कर उसे अपने वश में कर       ले।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  थोड़ा चाहने वाला, धैर्यवान, पण्डित तथा       सदा छाया के समान पीछे चलने वाला और जो आज्ञा पाने पर       सोच- विचार न करे। अर्थात यथार्थरुप       से आज्ञा का पालन करे ऐसा मनुष्य राजा के घर       में रहना चाहिये।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  करटक बोला-- जो कभी कुसमय पर घुस जाने       से स्वामी तुम्हारा अनादर करे। वह       बोला -- ऐसा हो तो भी सेवक के पास अवश्य जाना चाहिये।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  दोष के डर से किसी काम का आरंभ न करना यह कायर पुरुष का चिंह है। हे       भाई, अजीर्ण के डर से कौन भोजन को छोड़ते हैं&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  पास रहने       वाला कैसा ही विद्याहीन, कुलहीन तथा विसंगत मनुष्य क्यों न हो       राजा उसी से हित करने लगता है, क्योंकि       राजा, स्री और बेल ये बहुधा जो अपने पास रहता है, उसी का आश्रय कर       लेते हैं।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  करटक बोला-- वहाँ जा कर क्या कहोगे ? वह       बोला-- सुनो पहिले यह जानूँगा कि       स्वामी मेरे ऊपर प्रसन्न है या उदास है ? करटक       बोला-- इस बात को जानने का क्या चिंह है?&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;        &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;  &lt;/p&gt;        &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; दमनक       बोला-- सुनो दूर से बड़ी अभिलाषा से देख       लेना, मुसकाना, समाचार आदि पूछने       में अधिक आदर करना, पीठ पीछे भी गुणों की       बड़ाई करना, प्रिय वस्तुओं में स्मरण&lt;br /&gt;       रखना।&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  जो       सेवक न हो उसमें भी स्नेह दिखाना,       सुंदर सुंदर वचनों के साथ धन आदि का देना और दोष       में भी गुणों का ग्रहण करना, ये स्नेहयुक्त       स्वामी के लक्षण हैं।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  आज कल कह करके, कृपा आदि करने में       समय टालना तथा आशाओं का बढ़ाना और जब फल का       समय आवे तब उसका खंडन करना ये       उदास स्वामी के लक्षण मनुष्य को जानना चाहिये।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  यह जान कर जैसे यह मेरे वश में हो जायेगा       वैसे कर्रूँगा, क्योंकि पण्डित लोग नीतिशास्र       में कही हुई बुराई के होने से       उत्पन्न हुई विपत्ति को और उपाय से हुई सिद्धि को नेत्रों के       सामने साक्षात झलकती हुई सी देखते हैं।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  करटक बोला-- तो भी बिना अवसर के नहीं कह       सकते हो, बिना अवसर की बात को कहते हुए वृहस्पति जी       भी बुद्धि की निंदा और अनादर को सर्वदा पा       सकते हैं।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  दमनक बोला-- मित्र, डरो मत, मैं बिना अवसर की       बात नहीं कहूँगा, आपत्ति में, कुमार्ग पर चलने       में और कार्य का समय टले जाने में, हित चाहने       वाले सेवक को बिना पूछे भी कहना चाहिये। और जो अवसर पा कर       भी मैं राय नहीं कहूँगा तो मुझे मंत्री       बनना भी अयोग्य है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  मनुष्य जिस गुणसे आजीविका पाता है और जिस गुण के कारण इस दुनिया       में सज्जन उसकी बड़ाई करते हैं, गुणी को ऐसे गुण की       रक्षा करना और बड़े यत्न से बढ़ाना चाहिये।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  इसलिए हे शुभचिंतक, मुझे आज्ञा दीजिये।       मैं जाता हूँ। करटक ने कहा-- कल्याण हो, और तुम्हारे       मार्ग विघ्नरहित अर्थात शुभ हो। अपना       मनोरथ पूरा करो। तब दमनक घबराया       सा पिंगलक के पास गया।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  तब दूर से ही बड़े आदर से राजा ने       भीतर आने दिया और वह साष्टांग दंडवत करके       बैठ गया। राजा बोला -- बहुत दिन       से दिखे। दमनक बोला-- यद्यपि मुझ सेवक       से श्रीमहाराज को कुछ प्रयोजन नहीं है, तो       भी समय आने पर सेवक को अवश्य पास आना चाहिये, इसलिए आया हूँ।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  हे राजा, दांत के कुरेदने के लिए तथा कान खुजाने के       लिए राजाओं को तुनके से भी काम पड़ता है फिर देह,       वाणी तथा हाथ वाले मनुष्य से क्यों नहीं ?       अर्थात अवश्य पड़ना ही है। यद्यपि बहुत काल       से मुझ अनादर किये गये की बुद्धि के नाश की श्रीमहाराज       शंका करते ही सो भी शंका न करनी चाहिये।&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; अनादर       भी किये गये धैर्यवान की बुद्धि के नाश की       शंका नहीं करनी चाहिये, जैसे नीच की ओर की गई       भी अग्नि की ज्वाला कभी भी नीचे नहीं जाती है,       अर्थात हमेशा ऊँची ही रहती है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  हे महाराज, इसलिए सदा स्वामी को विवेकी होना चाहिये।       मणि चरणों में ठुकराता है और कांच सिर पर धारण किया जाता है,       सो जैसा है वैसा भले ही रहे, काँच- काँच ही है और       मणि- मणि ही है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;        &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;  &lt;/p&gt;        &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; इसके       बाद एक दिन उस सिंह का भाई स्तब्धकर्ण नामक सिंह आया। उसका आदर-       सत्कार करके और अच्छी तरह बैठा कर पिंगलक उसके       भोजन के लिये पशु मारने चला। इतने       में संजीवक बोला कि-- महाराज, आज       मरे हुए मृगों का माँस कहाँ है ?       राजा बोला-- दमनक करटक जाने, संजीवक ने कहा-- तो जान       लीजिये कि है या नहीं सिंह सोच कर कहा-- अब वह नहीं है,       संजीवक बोला-- इतना सारा मांस       उन दोनों ने कैसे खा लिया ? राजा बोजा-- खाया,       बाँटा, और फेंक फांक दिया। नित्य यही डाल रहता है। तब       संजीवक ने कहा -- महाराज के पीठ पीछे इस प्रकार क्यों करते हैं ?राजा       बोला-- मेरे पीठ पीछे ऐसा ही किया करते हैं। फिर       संजीवक ने कहा-- यह बात उचित नहीं है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  निश्चय करके वही मंत्री श्रेष्ठ है जो दमड़ी दमड़ी करके कोष को       बढ़ावे, क्योंकि कोषयुक्त राजा का कोष ही प्राण है, केवल जीवन ही प्राण नहीं है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  स्तब्धकर्ण बोला-- सुनों भाई, ये दमनक करटक बहुत दिनों       से अपने आश्रय मं पड़े हैं और लड़ाई और मेल कराने के अधिकारी है। धन के अधिकार पर       उनका कभी नहीं लगाने चाहिये। जब जैसा अवसर हो वैसा जान कर काम करना चाहिये। सिंह       बोला-- यह तो है ही, पर ये सर्वथा       मेरी बात को नहीं माननेवाले हैं। स्तब्धकर्ण       बोला-- यह सब प्रकार से अनुचित है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;       भाई, सब प्रकार से मेरा कहना करो और व्यवहार तो हमने कर ही       लिया है। इस घास चरने वाले संजीवका को धन के अधिकार पर       रख दो। इस बात के ऐसा करने पर उसी दिन       से पिंगलक और संजीवक का सब बांधवों को छोड़कर       बड़े स्नेह से समय बीतने लगा। फिर       सेवकों के आहार देने में शिथिलता देख दमनक और करटक आपस       में चिंता करने लगे। तब दमनक करटक       से बोला-- मित्र, अब क्या करना चाहिये। यह अपना ही किया हुआ दोष है,       स्वयं ही दोष करने पर पछताना भी उचित नहीं है। जैसे       मैंने इन दोनों की मित्रता कराई थी,       वैसे ही मित्रों में फूट भी कराऊँगा। करटक       बोला-- ऐसा ही होय, परंतु इन दोनों का आपस       में स्वभाव से बढ़ा हुआ बड़ा स्नेह कैसे छुड़ाया जा       सकता है। दमनक बोला-- उपाय करो, जैसा कहा है कि -- जो उपाय से हो       सकता है, वह पराक्रम नहीं हो सकता है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;       बाद में दमनक पिंगलक के पास जा कर प्रणाम करके       बोला-- महाराज, नाशकारी और बड़े       भय के करने वाले किसी काम को जान कर आया हूँ।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  पिंगलक ने आदर से कहा-- तू क्या कहना चाहता है ? दमनक ने कहा-- यह       संजीवक तुम्हारे ऊपर अयोग्य काम करने       वाला सा दिखता है और मेरे सामने महाराज की तीनों       शक्तियों की निंदा करके राज्य को ही छीनना चाहता है। यह       सुनकर पिंगलक भय और आश्चर्य से       मान कर चुप हो गया। दमनक फिर बोला-- महाराज, सब       मंत्रियों को छोड़ कर एक इसी को जो तुमने       सर्वाधिकारी बना रखा है। वही दोष है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  सिंह ने विचार कर कहा-- हे शुभचिंतक, जो ऐसा       भी है, तो भी संजीवक के साथ मेरा       अत्यंत स्नेह है। बुराईयाँ करता हुआ       भी जो प्यारा है, सो तो प्यारा ही है, जैसे बहुत       से दोषों से दूषित भी शरीर किसको प्यारा नहीं है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  दमनक फिर भी कहने लगा-- हे महाराज, वही अधिक दोष है। पुत्र,       मंत्री और साधारण मनुष्य इनमें से जिसके ऊपर       राजा अधिक दृष्टि करता है, लक्ष्मी उसी पुरुष की       सेवा करती है।&lt;br /&gt;  हे महाराज सुनिये, अप्रिय भी, हितकारी       वस्तु का परिणाम अच्छा होता है और जहाँ       अच्छा उपदेशक और अच्छे उपदेश सुनने वाला हो, वहाँ सब       संपत्तियाँ रमण करती है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  सिंह बोला-- बड़ा आश्चर्य है, मैं जिसे अभय       वाचा दे कर लाया और उसको बढ़ाया,       सो मुझसे क्यों वैर करता है  ?&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  दमनक बोला-- महाराज, जैसे मली हुई और तैल आदि       लगाने से सीधी करी हुई कुत्ते की पूँछ       सीधी नहीं होती है, वैसे ही दुर्जन नित्य आदर करने       से भी सीधा नहीं होता है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  और जो संजीवक के स्नेह में फँसे हुए       स्वामी जताने पर भी न मानें तो मुझ       सेवक पर दोष नहीं है। पिंगलक (अपने       मन में सोचने लगा) कि किसी के बहकाने       से दूसरों को दंड न देना चाहिये, परंतु अपने आप जान कर उसे       मारे या सम्मान करें। फिर बोला-- तो       संजीवक को क्या उपदेश करना चाहिये ? दमनक ने घबरा कर कहा-- महाराज, ऐसा नहीं, इससे गुप्त       बात खुल जाती है। पहले यह तो सोच       लो कि वह हमारा क्या कर सकता है ?&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  सिंह ने कहा- यह कैसे जाना जाए कि वह द्रोह करने       लगा है ? दमनक ने कहा-- जब वह घमंड       से सींगों की नोंक को मारने के लिए       सामने करता हुआ निडर सा आवे तब       स्वामी आप ही जान जायेंगे। इस प्रकार कह कर       संजीवक के पास गया और वहाँ जा कर धीरे- धीरे पास खिसकता हुआ अपने को       मन मलीन सा दिखाया। संजीवक ने आदत       से कहा मित्र कुशल तो है ? दमनक ने कहा-       सेवकों को कुशल कहाँ ?&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;        &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;  &lt;/p&gt;        &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; संजीवक ने कहा-- मित्र, कहो तो यह क्या       बात है  दमनक ने कहा-- मैं मंदभागी क्या कहूँ ? एक तरफ       राजा का विश्वास और दूसरी तरफ       बांधव का विनाश होना क्या कर्रूँ ? इस दुखसागर       में पड़ा हँ।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  यह कह कर लंबी साँस भर कर बैठ गया। तब       संजीवक ने कहा-- मित्र, तो भी सब विस्तारपूर्वक       मनकी बात कहो। दमनक ने बहुत छिपाते- छिपाते कहा--       यद्यपि राजा का गुप्त विचार नहीं कहना चाहिये, तो       भी तुम मेरे भरोसे से आये हो।       अतः मुझे परलोक की अभिलाषा के डर       से अवश्य तुम्हारे हित की बात करनी चाहिये।       सुनो तुम्हारे ऊपर क्रोधित इस स्वामी ने एकांत       में कहा है कि संजीवक को मार कर अपने परिवार को दूँगा। यह       सुनते ही संजीवक को बड़ा विषाद हुआ। फिर दमनक       बोला-- विषाद मत करो, अवसर के       अनुसार काम करो। संजीवक छिन भर चित्त       मेंविचार कर कहने लगा-- निश्चय यह ठीक कहता है,       संजीवक छिन भर चित्त में विचार कर कहने       लगा -- निश्चय यह ठीक कहता है, अथवा दुर्जन का यह काम है या नहीं है, यह व्यवहार       से निर्णय नहीं हो सकता है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;       संजीवक फिर सांस भरकर बोला-- अरे,       बड़े कष्ट की बात है, कैसे सिंह मुझ घास के चरने       वाले को मारेगा ?&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  विजय होने से स्वामित्व और मरने पर       स्वर्ग मिलता है, यह काया क्षणभंगुर है, फिर       संग्राम में मरने की क्या चिंता है ?&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  यह सोच कर संजीवक बोला-- हे मित्र, वह       मुझे मारने वाला कैसे समझ पड़ेगा ? तब दमनक       बोला-- जब यह पिंगलक पूँछ फटकार कर उँचे पंजे करके और       मुख फाड़ कर देखे तब तुम भी अपना पराक्रम दिखलाना। परंतु यंह सब       बात गुप्त रखने योग्य है। नहीं तो न तुम और न       मैं। यह कहकर दमनक करटक के पास गया। तब करटक ने पूछा-- क्या हुआ ? दमनक ने कहा-- दोनों के आपस       में फूट फैल गई। करटक बोला-- इसमें क्या संदेह है ?&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  तब दमनक ने पिंगलक के पास जा कर कहा-- महाराज, वह पापी आ पहुँचा है, इसलिये सम्हाल कर       बैठ जाइये, यह कह कर पहले जताए हुए आकार को करा दिया,       संजीवक ने भी आ कर वैसे ही बदली हुई चेष्ठा       वाले सिंह को देखकर अपने योग्य पराक्रम किया। फिर       उन दोनों की लड़ाई में संजीवक को सिंह ने       मार डाला।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;       बाद में सिंह, संजीवक सेवक को मार कर थका हुआ और       शोक सा मारा बैठ गया।&lt;br /&gt;       और बोला"-- कैसा मैंने दुष्ट कर्म किया है ?&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  दमनक बोला-- स्वामी, यह कौन- सा न्याय है कि       शत्रु को मार कर पछतावा करते हो?&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  इस प्रकार जब दमनक ने संतोष दिलाया तब पिंगलक का जी       में जी आया और सिंहासन पर बैठा। दमनक प्रसन्न चित्त होकर       ""जय हो महाराज की'', ""सब संसार का कल्याण हो,'' यह कहकर आनंद       से रहने लगा।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);font-family:Gargi;font-size:130%;"  &gt;कथा २: &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:180%;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-size:130%;" &gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;धोबी, धोबन, गधा और &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;कुत्ता&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;बनारस में कर्पूरपटक नामक धोबी रहता था। वह नवजवान अपने स्री के साथ बहुत काल तक विलास करके, सो गया। इसके बाद उसके घर के द्रव्य को चुराने के लिए चोर अंदर घुसा। उसके आँगन में एक गधा बँधा था और एक कुत्ता भी बैठा था। इतने में गधे ने कुत्ते से कहा-- मित्र, यह तेरा काम है, इसलिए क्यों नहीं ऊँचे शब्द से भौंक कर स्वामी को जगाता है ? कुत्ता बोला-- भाई, मेरे काम की चर्चा तुझे नहीं करनी चाहिये और क्या तू सचमुच नहीं जानता कि जिस प्रकार मैं उनके घर की रखवाली दिन रात करता हूँ, पर वैसा वह बहुत काल से निर्जिंश्चत होकर मेरे उपयोग को नहीं मानता है, इसलिए आजकल वह मेरे आहार देने में भी आदन कम करता है। क्योंकि बिना आपत्ति के देखे स्वामी सेवकों पर थोड़ा आदर करते हैं।&lt;br /&gt;  गधा बोला -- सुन रे मूर्ख, जो काम के समय पर माँगे वह निन्दित सेवक और निन्दित मित्र है।&lt;br /&gt;       कुत्ता बोला-- जो काम अटकने पर सेवको से मीठी मीठी बातें करे वह तो निन्दित स्वामी है।&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  क्योंकि आश्रितों के पालन- पोषण में, स्वामी की सेवा में, धर्म की सेवा करने में और&lt;br /&gt;       पुत्र के उत्पन्न करने में, प्रतिनिधि नहीं होते हैं अर्थात ये काम अपने आप ही करने के हैं, दूसरे से करान के योग्य नहीं हैं।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;गधा झुंझला कर बोला-- अरे दुष्टबुद्धि, तू बड़ा पापी है कि विपत्ति में स्वामी के काम की अवहेलना करता है। ठीक जिस किसी भी प्रकार से स्वामी जग जावे ऐसा मैं तो अवश्य कर्रूँगा।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  क्योंकि पीठ के बल धूप खाय, पेट के बल अग्नि तापे, स्वामी की सब प्रकार से वफादारी और परलोक की बिना कपट से सेवा करनी चाहिए।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;यह कह कर उसने अत्यंत रेंकने का शब्द किया। तब वह धोबी उसके चिल्लाने से जाग उठा और नींद टूटने के क्रोध के मारे उठ कर लकड़ी से गधे को मारा कि जिससे वह मर गया।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:180%;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-size:130%;" &gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; &lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;कथा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;३&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;:&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-family:Gargi;font-size:130%;"  &gt;सिंह, चूहा और       बिलाव&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; उत्तर दिशा में अर्बुदशिखर नामक पर्वत पर दुदार्ंत नामक एक बड़ा पराक्रमी सिंह रहता था। उस पर्वत की कंदरा में सोते हुए सिंह की लटाके बालों को एक चूहा नित्य काट जाया करता था, तब लटाओं के छोर को कटा देख कर क्रोध से बिल के भीतर घुसे हुए चूहे को नहीं पा कर सिंह सोचने लगा&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;        &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; अर्थात, जो छोटा शत्रु हो और पराक्रम से भी न मिले तो उसको मारने के लिए उसके चाल और बल के समान घातक उसके आगे कर देना चाहिए।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;यह सोचकर उसने गाँव में जा कर भरोसा दे कर दधिकर्ण नामक बिलाव को यत्न से ला कर माँस का आहार दे कर अपनी गुफा में रख लिया। बाद में उसके भय से चूहा भी बिल से नहीं निकलने लगा -- जिससे यह सिंह बालों के नहीं कटने के कारण सुख से सोने लगा। जब चूहे का शब्द सुनता था तब तब माँस के आहार से उस बिलाव को तृप्त करता था।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;फिर एक दिन भूख के मारे बाहर घूमते हुए उस चूहे को बिलाव ने पकड़ लिया और मार डाला। बाद में उस सिंह ने बहुत समय तक जब चूहे को ने देखा और उसका शब्द भी न सुना, तब उसके उपयोगी न होने से बिलाव के भोजन देने में भी कम आदर करने लगा। फिर दधिकर्ण आहारबिहार से दुर्बल हो कर मर गया।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; उत्तर दिशा में अर्बुदशिखर नामक पर्वत पर दुदार्ंत नामक एक बड़ा पराक्रमी सिंह रहता था। उस पर्वत की कंदरा में सोते हुए सिंह की लटाके बालों को एक चूहा नित्य काट जाया करता था, तब लटाओं के छोर को कटा देख कर क्रोध से बिल के भीतर घुसे हुए चूहे को नहीं पा कर सिंह सोचने लगा&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;अर्थात, जो छोटा       शत्रु हो और पराक्रम से भी न मिले तो       उसको मारने के लिए उसके चाल और बल के       समान घातक उसके &lt;span&gt;आगे&lt;/span&gt; कर देना चाहिए।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;       &lt;br /&gt;  यह सोचकर उसने गाँव में जा कर भरोसा दे कर दधिकर्ण नामक       बिलाव को यत्न से ला कर माँस का आहार दे कर       अपनी गुफा में रख लिया। बाद में उसके       भय से चूहा भी बिल से नहीं निकलने       लगा -- जिससे यह सिंह बालों के नहीं कटने के कारण       सुख से सोने लगा। जब चूहे का शब्द       सुनता था तब तब माँस के आहार से उस       बिलाव को तृप्त करता था।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  फिर एक दिन भूख के मारे बाहर घूमते हुए उस चूहे को       बिलाव ने पकड़ लिया और मार डाला।       बाद में उस सिंह ने बहुत समय तक       जब चूहे को ने देखा और उसका शब्द       भी न सुना, तब उसके उपयोगी न होने       से बिलाव के भोजन देने में भी कम       आदर करने लगा। फिर दधिकर्ण आहारबिहार       से दुर्बल हो कर मर गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;कथा&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;४&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;:&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);font-family:Gargi;font-size:130%;"  &gt;बंदर, घंटा और कराला नामक &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);font-family:Gargi;font-size:130%;"  &gt;कुटनी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;श्रीपर्वत के बीच में एक ब्रह्मपुर नामक नगर       था। उसके शिखर पर एक घंटाकर्ण नामक       राक्षस रहता था, यह मनुष्यों से उड़ती हुई       खबर सुनी जाती है। एक दिन घंटे को       ले कर भागते हुए किसी चोर को व्याघ्र ने       मार डाला ओर उसके हाथ से गिरा हुआ घंटा       बंदरों के हाथ लगा। बंदर उस घंटे को       बार- बार बजाते थे। तब नगरवासियों ने देखा कि वह मनुष्य खा       लिया गया और प्रतिक्षण में घंटे का बजना       सुनाई देता है। तब सब नागरिक लोग       ""घंटाकर्ण क्रोध से मनुष्यों को खाता है       और घंटे को बजाता है'', यह कह कर नगर       से भाग चले।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;       बाद में कराला नामक कुटनी ने सोचा कि यह घंट का       शब्द बिना अवसर का है, इसलिए क्या       बंदर घंटे को बजाते हैं ? इस बात को       अपने आप जान कर राजा से कहा -- जो कुछ धन खर्च       करो, तो मैं इस घंटाकर्ण राक्षस को वश       में कर लूँ। फिर राजा ने उसे धन दिया       और कुटनी ने मंडल बनाया और उसमें       गणेश आदि की पूजा का चमत्कार दिखला कर       और बंदरों को अच्छे लगने वाले फल       ला कर वन में उनको फैला दिया। फिर       बंदर घंटे को छोड़ कर फल खाने लग गये       और कुटनी घंटे को ले कर नगर में आई       और सब जनों ने उसका आदर किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;कथा&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;५&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;:&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;font-family:Gargi;font-size:130%;"  &gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सिंह और &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;बूढा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; शशक&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;मंदर नामक पर्वत पर दुदार्ंत नामक एक सिंह रहता था और वह सदा पशुओं का वध करता रहता था। तब सब पशुओं ने मिल कर उस सिंह से विनती की, सिंह एक साथ बहुत से पशुओं की क्यों हत्या करते हो ? जो प्रसन्न हो तो हम ही तुम्हारे भोजन के लिए नित्य एक पशु को भेज दिया करेंगे। फिर सिंह ने कहा -- जो यह तुमको इष्ट है तो यों ही सही। उस दिन से निश्चित किये हुए एक पशु को खाया करता था। फिर एक दिन एक बूढ़े शशक (खरगोश) की बारी आई।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;                &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; वह सोचने लगा-- जीने की आशा से भय के कारण की अर्थात मारने वाले की विनय की जाती है और वह मरना ही ठहरा, फिर मुझे सिंह की विनती से क्या काम है ?&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;इसलिए धीरे- धीरे चलता हूँ, पीछे सिंह भी भूख के मारे झुंझला कर उससे बोला -- तू किसलिए देर करके आया है ? शशक बोला -- महाराज, मैं अपराधी नहीं हूँ, मार्ग में आते हुए मुझको दूसरे सिंह ने बल से पकड़ लिया था। उसके सामने फिर लौट आने की सौगंध खा कर स्वामी को जताने के लिए यहाँ आया हूँ। सिंह क्रोधयुक्त हो कर बोला -- शीघ्र चल कर दुष्ट को दिखला कि वह दुष्ट कहाँ बैठा है। फिर शशक उसे साथ ले कर एक गहरा कुँआ दिखलाने को ले गया। वहाँ पहुँच कर, स्वामी, आप ही देख लीजिए, यह कह कर उस कुँए के जल में उसी सिंह की परछाई दिखला दी। फिर सिंह क्रोध से दहाड़ कर घमंड से उसके ऊपर अपने को गिरा कर मर गया।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;font-size:130%;" &gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;कथा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;६&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;:&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;font-family:Gargi;font-size:130%;"  &gt;कौए का जोड़ा और &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;font-family:Gargi;font-size:130%;"  &gt;काले       साँप&lt;/span&gt;        &lt;span style="font-weight: bold;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;किसी वृक्ष पर काग और कागली रहा करते       थे, उनके बच्चे उसके खोड़र में रहने       वाला काला सांप खाता था। कागली पुनः गर्भवती हुई       और काग से कहने लगी -- ""हे स्वामी, इस       पेड़ को छोड़ो, इसमें रहने वाला       काला साँप हमारे बच्चे सदा खा जाता है।&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;blockquote&gt;        &lt;/blockquote&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span&gt;अर्थात&lt;/span&gt; दुष्ट स्री, धूर्त मित्र, उत्तर देने वाला सेवक, सपं वाले घर में रहना, मानो साक्षात् मृत्यु ही है, इसमें संदेह नहीं है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; काग बोला-- प्यारी, डरना नहीं चाहिए, बार- बार मैंने इसका अपराध सहा है, अब फिर क्षमा नहीं कर्रूँगा। कागली बोली-- किसी प्रकार ऐसे बलवान के साथ तुम लड़ सकते हो? काग बोला-- यह शंका मत करो।&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; अर्थात जिसको बुद्धि है उसको बल है और जो निर्बुद्धि है उसका बल कहाँ से आवे ? देख मद से उन्मत्त सिंह को शशक ने मार डाला।&lt;br /&gt;       कागली बोली-- जो करना है करो। काग बाला-- यहाँ पास ही सरोवर में राजपुत्र नित्य आ कर स्नान करता है। स्नान के समय उसके अंग से उतार कर घाट पर रखे हुए सोने के हार को चोंच में पकड़ कर इस बिल्ले में ला कर धर दीजिये। पीछे एक दिन राजपुत्र के नहाने के लिए जल में उतरने पर कागली ने वही किया। फिर सोने के हार के पीछे ढूंढ़ते हुए खोखल में राजा के सिपाही ने उस वृक्ष के बिल में काले साँप को देखा और मार डाला।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3486815723019470360-8863284870174832573?l=anuragshandilyahindi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anuragshandilyahindi.blogspot.com/feeds/8863284870174832573/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3486815723019470360&amp;postID=8863284870174832573&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3486815723019470360/posts/default/8863284870174832573'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3486815723019470360/posts/default/8863284870174832573'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anuragshandilyahindi.blogspot.com/2008/12/blog-post_3252.html' title='हितोपदेश की कथाएँ- सुहृद्भेद'/><author><name>ANURAG SHANDILYA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09780770213161059080</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3486815723019470360.post-1227142331383675345</id><published>2008-12-18T22:40:00.000+05:30</published><updated>2008-12-18T22:59:29.751+05:30</updated><title type='text'>हितोपदेश की कथाएँ- मित्रलाभ</title><content type='html'>&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;कथा&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;१&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;:&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-size:130%;" &gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;"&gt;सुवर्णकंकणधारी बूढ़ा बाघ और       &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-size:130%;" &gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;"&gt;मुसाफिर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;एक समय दक्षिण दिशा में एक वृद्ध बाघ स्नान करके कुशों को हाथ में लिए हुए कह रहा था-- हे हो मार्ग के चलने वाले पथिकों ! मेरे हाथ में रखे हुए इस सुवर्ण के कड्कण (कड़ा) को ले लो, इसे सुनकर लालच के वशीभूत होकर किसी बटोही ने (मन में) विचारा -- ऐसी वस्तु, (सुवर्ण कड्क) भाग्य से उपलब्ध होती है। परंतु इसे लेने के लिये, बाघ के पास जाना उचित नहीं, क्योंकि इसमें प्राणों का संदेह है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;अनिष्ट स्थान बाघ इत्यादि से सुवर्ण, कड्क सदृश अभीष्ट वस्तु के लाभ की संभावना होते हुए भी कल्याण होना न नहीं आता, क्योंकि जिस अमृत में जहर का संपर्क है, वह अमृत भी मौत का कारण है, न कि अमरता का।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  किंतु धन पैदा करने की सभी क्रियाओं में संदेह की संभावना रहती ही है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;कोई भी व्यक्ति संदेहपूर्ण कार्य में बिना पग बढ़ाये कल्याण के दर्शन में असमर्थ ही रहता है। हाँ, फिर संदहपूर्ण कार्य करने पर यदि वह जीता रहता है, तो कल्याण का दर्शन करता है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  इस कारण से सर्वप्रथम मैं इसके वाक्य के तथ्य सत्य, अतथ्य असत्य का परीक्षण&lt;br /&gt;करता हूँ। वह उच्चस्वर में बोलता है -- कहाँ है तुम्हारा कंगन ? बाघ हाथ फैला कर देखाता है। पथिक बोला मारने वाले तुम में कैसे विश्वास हो ?&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;मुझे इतना भी लोभ नहीं है, जिससे मैं अपने हाथ में रखे हुए सुवर्ण कंगन को जिस किसी रास्ता चलता अपरिचित व्यक्ति को दे देना चाहता हूँ। परंतु बाघ मनुष्य को भक्षक है, इस लोकापवाद को हटाया नहीं जा सकता।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;अंधपरंपरा पर चलने वाला लोक धर्म के विषय में गोवध करने वाले ब्राह्मण को जैसे प्रमाण मानता है, वैसे उपदेश देनेवाली कुट्ठिनी को प्रमाणता से स्वीकार नहीं करता। अर्थात संसार कुट्ठिनी के वाक्य को धर्म के विषय में प्रमाण नहीं मानता।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;हे युधिष्ठिर ! जिस प्रकार मरुप्रदेश में वृष्टि सफल होती है, जिस प्रकार भूख से पीड़ित को भोजन देना सफल होता है, उसी तरह दरिद्र को दिया गया दान सफल होता है।&lt;/span&gt;                &lt;p align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; प्राण जैसे अपने लिए प्रिय हैं, उसी तरह अन्य प्राणियों को भी अपने प्राण प्रिय होंगे। इस कारण से सज्जन जीवनमात्र पर दया करते हैं।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;निषेध में तथा दान में, सुख अथवा दु:ख में, प्रिय एवं अप्रिय में सज्जन पुरुष अपनी तुलना से अनुभव करता है, अर्थात मुझे किसी ने कुछ दिया तो हर्ष होता है, यदि अनादर किया तो दुख होता है। इस तरह मैं भी किसी को कुछ दूँगा तो हर्ष होगा, निषेध कर्रूँगा तो दुख होगा। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; जो पुरुष दूसरे की स्रियों को अपनी माता की तरह एवं अन्य के धन को मिट्टी के ढेले के समान तथा प्राणिमात्र को अपने समान देखता है, वह पंडित है, अर्थात सत असत के विवेक करने वाली बुद्धि वाला है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;        &lt;p&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; और चंद्रमा जो आकाश       में विचरता है, अंधकार दूर करता है, सहस्त्र किरणों को धारण करता है और नक्षत्रों       में बीच में चलता है उस चंद्रमा को       भी भाग्य से राहु ग्रस्त होता है, इसलिए जो कुछ       भाग्य (ललाट) में विधाता ने लिख दिया है उसे कौन मिटा       सकता है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  यह बात वह सोच ही रहा था जब उसको       बाघ ने मार डाला और खा गया। इसी       से कहा जाता है कंगन के लोभ से इत्यादि       बिना विचारे काम कभी नहीं करना चाहिए।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;कथा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;२&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;:&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-size:130%;" &gt;&lt;span style="font-family:Gargi;"&gt;कबूतर, काग, कछुआ, मृग और &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-family:Gargi;font-size:130%;"  &gt;चूहा &lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;गोदावरी के तीर पर एक बड़ा सैमर का       पेड़ है। वहाँ अनेक दिशाओं के देशों       से आकर रात में पक्षी बसेरा करते हैं। एक दिन       जब थोड़ी रात रह गई ओर भगवान कुमुदिनी के नायक चंद्रमा ने       अस्ताचल की चोटी की शरण ली तब लघुपतनक नामक काग जगा       और सामने से यमराज के समान एक       बहेलिए को आते हुए देखा, उसको देखकर       सोचने लगा, कि आज प्रातःकाल ही बुरे का       मुख देखा है। मैं नहीं जानता हूँ कि क्या       बुराई दिखावेगा। &lt;/span&gt;        &lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt; &lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  सहस्रों शोक की और सैकड़ों भय की बातें मूर्ख पुरुष को दिन पर दिन दुख देती है, और पण्डित को नहीं।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;फिर उस व्याध ने चावलों की कनकी को बिखेर कर जाल फैलाया और खदु वहाँ छुप कर बैठ गया। उसी समय में परिवार सहित आकाश में उड़ते हुए चित्रग्रीव नामक कबूतरों के राजा ने चावलों की कनकी को देखा, फिर कपोतराज चावल के लोभी कबूतरों से बोला-- इस निर्जन वन में चावल की कनकी कहाँ से आई ? पहले इसका निश्चय करो। मैं इसको कल्याणकारी नहीं देखता हूँ। अवश्य इन चावलों की कनकी के लोभ से हमारी बुरी गति हो सकती है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;        &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;  &lt;/p&gt;                &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; अच्छी रीति से पका हुआ भोजन, विद्यावान पुत्र, सुशिक्षित अर्थात आज्ञाकारिणी स्री, अच्छे प्रकार से सेवा किया हुआ राजा, सोच कर कहा हुआ वचन, और विचार कर किया हुआ काम ये बहुत काल तक भी नहीं बिछड़ते हैं।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  यह सुनकर एक कबूतर घमंड से बोला ,""अजी, तुम क्या कहते हो&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  जब आपत्तिकाल आए तब वृद्धों की बात माननी चाहिए, परंतु उस समय सब जगह मानने से तो भोजन भी न मिले।&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  इस पृथ्वी तल पर अन्न और पान संदेहोंसे भरा है, किस वस्तु में खाने- पीने की ईच्छा करे या कैसे जिये ?&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; ईष्या करने वाला, घृणा करने वाला, असंतोषी, क्रोधी, सदा संदेह करने वाला और पराये आसरे जीने वाला ये छः प्रकार के मनुष्य हमेशा दुखी होते हैं।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  यह सुनकर भी सब कबुतर बहेलिये के चावल के कण जहाँ छीटे थे, वहाँ बैठ गये।&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  क्योंकि अच्छे बड़े- बड़े शास्रों को पढ़ने तथा सुनने वाले और संदेहों को दूर करने वाले भी लोभ के वश में पड़ कर दुख भोगते हैं।&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  लोभ से क्रोध उत्पन्न होता है, लोभ से विषय भोग की इच्छा होती है और लोभ से मोह और नाश होता है, इसलिए लोभ ही पाप की जड़ है।&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; सोने के मृग का होना असंभव है, तब भी रामचंद्रजी सोने के मृग के पीछे लुभा गये, इसलिये विपत्तिकाल आने पर महापुरुषों की बुद्धियाँ भी बहुधा मलिन हो जाती है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  दाना पाने के लालच से उतरे सब कबूतर जाल में फँस गये और फिर जिसके वचन से वहाँ उतरे से उसका तिरस्कार करने लगे।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;        &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;  &lt;/p&gt;                &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; समूह के आगे मुखिया होकर न जाना चाहिये। क्योंकि यदि काम सिद्ध हो गया तो फल सबों को बराबर प्राप्त होगा, और अगर काम बिगड़ गया तो मुखिया ही मारा जाएगा। सबको उसकी निंदा करते देख चित्रग्रीव बोला-- "" इसका कुछ दोष नहीं है।''&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  हितकारक पदार्थ भी आने वाली आपत्तियों का कारण हो जाती है, जैसे गोदोहन के समय माता की जाँघ ही बछड़े के बाँधने का खूँटा हो जाती है।&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; बंधु वह है, जो आपत्ति में पड़े हुए मनुष्यों को निकालने में समर्थ हो और जो दुखियों की रक्षा करने के उपाय बताने की बजाय उलाहना देने में चतुराई समझे, वह बंधु नहीं है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  आपत्ति से घबरा जाना तो कायर पुरुष का चिन्ह है, इसलिये इस काम में धीरज धर कर उपाय सोचना चाहिए।&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; आपदा में धीरज, बढ़ती में क्षमा, सभा में वाणी की चतुरता, युद्ध में पराक्रम, यश में रुचि और शास्र में अनुराग ये बातें महात्माओं में स्वाभाव से ही होती है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;जिसे संपत्ति में हर्ष और आपत्ति में खेद न हो और संग्राम में धीरता हो, ऐसा तीनों लोक में तिलक का जन्म विरला होता है और उसको विरली माता ही जनती है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;इस संसार में अपना कल्याण चाहने वाले पुरुष को निद्रा, तंद्रा, भय, क्रोध, आलस्य और दीर्घसूत्रता ये छः अवगुण छोड़ देने चाहिए। अब भी ऐसा करो, सब एक मत होकर जाल को ले उड़ो।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  छोटी- छोटी       वस्तुओं के समूह से भी कार्य सिद्ध हो जाता है, जैसे घास की       बटी हुई रस्सियों से मतवाला हाथी       भी बाँधे जाते हैं।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  अपने कुल के थोड़े मनुष्यों का समूह भी कल्याण का करने       वाला होता है, क्योंकि तुस (छिलके)       से अलग हुए चावल फिर नहीं उगते हैं।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  यह सोच कर सब कबूतर जाल को लेकर       उड़े और वह बहेलिया जाल को लेकर       उड़ने&lt;br /&gt;       वाले कबूतरों को दूर से देख कर पीछे दौड़ता हुआ       सोचने लगा, ये पक्षी मिल कर मेरे जाल को       लेकर उड़ रहे हैं, परंतु जब ये गिरेंगे तब       मेरे वश में हो जायेंगे। फिर जब       वे पक्षी आँखों से ओझल हो गये तब       व्याध लौट गया।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  जब कबूतर ने देखा कि लोभी व्याध       लौट रहा है तब कबूतर ने कहा कि अब क्या करना चाहिए।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; माता, पिता और मित्र       ये तीनों स्वभाव से हितकारी होते हैं और दूसरे       लोग कार्य और किसी कारण से हित की इच्छा करने       वाले होता हैं।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  इसलिए मेरा मित्र हिरण्यक नामक चूहों का       राजा गंडकी नदी के तीर पर चित्रवन       में रहता है, वह हमारे फंदों को काटेगा। यह विचार कर सह हिरण्यक के बिल के पास गये। हिरण्यक       सदा आपत्ति आने की आशंका से अपना बिल सौ द्वार का       बना कर रहता था। फिर हिरण्यक कबूतरों के       उतरने की आहट से डर कर चुपके से       बैठ गया। चित्रग्रीव बोला-- हे मित्र हिरण्यक, हमसे क्यों नहीं       बोलते हो ? फिर हिरण्यक उसकी बोली पहचान कर       शीघ्रता से बाहर निकल कर बोला -- अहा !       मैं पुण्यवान हूँ कि मेरा प्यारा मित्र चित्रग्रीव आया है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  जिसकी मित्र के       साथ बोल- चाल है, जिसका मित्र के       साथ रहना- सहना हो, और जिसकी मित्र के       साथ गुप्त बात- चीत हो, उसके समान कोई इस       संसार में पुण्यवान नहीं है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  अपने मित्र को जाल में फँसा देखकर आश्चर्य       से क्षण भर ठहर कर बोला"-- मित्र, यह क्या है ? चित्रग्रीव       बोला"-- मित्र, यह हमारे पूर्वजन्म के कर्मो का फल है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  जिस कारण       से, जिसके करने से, जिस प्रकार से, जिस       समय में, जिस काल तक और जिस स्थान       में जो कुछ भला और बुरा अपना कर्म है, उसी कारण       से , उसी के द्वारा, उसी प्रकार से, उसी       समय में, वही कर्म, उसी काल तक, उसी स्थान       में, प्रारब्ध के वश से पाता है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; रोग, शोक, पछतावा,       बंधन और आपत्ति ये देहधारियों (प्राणियों) के       लिए अपने अपराधरुपी वृक्ष के फल हैं।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  यह सुनकर हिरण्यक चित्रग्रीव के बंधन काटने के       लिए शीघ्र पास आया। चित्रग्रीव बोला-- मित्र, ऐसा       मत करो, पहले मेरे उन आश्रितों के       बंधन काटो, मेरा बंधन बाद में काटना। हिरण्यक ने       भी कहा -- मित्र, मैं निर्बल हूँ और मेरे दाँत       भी कोमल हैं, इसलिए इन सबका बंधन काटने के       लिए कैसे समर्थ हूँ ? इसलिए जब तक       मेरे दाँत नहीं टूटेंगे, तब तक तुम्हारा       फंदा काटता हूँ। बाद में इनके भी       बंधन जहाँ तक कट सकेंगे तब तक काटूँगा। चित्रग्रीव       बोला-- यह ठीक है, तो भी यथाशक्ति पहले इनके काटो। हिरण्यक ने कहा-- अपने को छोड़कर अपने आश्रितों की       रक्षा करना यह नीति जानने वालों को       संमत नहीं है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  क्योंकि मनुष्य को आपत्ति के लिए धन की, धन देकर स्री की और धन और स्री देकर अपनी       रक्षा सर्वदा करनी चाहिए।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  दूसरे धर्म,       अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों की रक्षा के       लिए प्राण कारण हैं, इसलिए जिसने इन प्राणों का घात किया, उसने क्या घात नहीं किया ?       अर्थात सब कुछ घात किया और जिसने प्राणों का       रक्षण किया उसने क्या रक्षण न किया ? अर्थात       सबका रक्षण किया।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  चित्रग्रीव बोला-- मित्र, नीति तो ऐसी ही है, परंतु       मैं अपने आश्रितोंका दुख सहने को सब प्रकार       से असमर्थ हूँ। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  चित्रग्रीव कहता है कि पण्डित को पराये उपकार के       लिए अपना धन और प्राणों को भी छोड़ देना चाहिए, क्योंकि विनाश तो अवश्य होगा, इसलिये       अच्छे पुरुषों के लिए प्राण त्यागना अच्छा है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  दूसरा यह भी एक विशेष कारण है कि इन कबूतरों का और मेरा जाति, द्रव्य और बल       समान है, तो मेरी प्रभुता का फल कहो, जो अब न होगा तो किस काल       में और क्या होगा ?&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  आजीविका के बिना भी ये मेरा साथ नहीं छोड़ते हैं, इसलिए प्राणों के       बदले भी इन मेरे आश्रितों को जीवनदान दो।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  हे मित्र, मांस, मल, मूत्र तथ हड्डी से       बने हुए इस विनाशी शरीर में आस्था को छोड़ कर       मेरे यश को बढ़ाओ। जो अनित्य और मल-       मूत्र से भरे हुए शरीर से निर्मल और नित्य यश मिले तो क्या नहीं       मिला ? अर्थात सब कुछ मिला।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; शरीर और दयादि गुणों       में बड़ा अंतर है। शरीर तो क्षणभंगुर है और गुण कल्प के अंत तक रहने       वाले हैं।&lt;br /&gt;  यह सुनकर हिरण्यक प्रसन्नचित्त तथा पुलकित होकर       बोला-- धन्य है, मित्र, धन्य है। इन आश्रितों पर दया विचारने       से तो तुम तीनों लोक की ही प्रभुता के       योग्य हो। ऐसा कह कर उसने सबका       बंधन काट डाला। बाद में हिरण्यक       सबका आदर- सत्कार कर बोला -- मित्र चित्रग्रीव, इस जाल       बंधन के विषय में दोष की शंका कर अपनी अवज्ञा नहीं करनी चाहिए।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  जो पक्षी सैकड़ों       योजना से भी अधिक दूर से अन्न के दाने को       या माँस को देखता है, वही बुरा       समय आने पर जाल की बड़ी गाँठ नहीं देखता है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  चंद्रमा तथा सूर्य को ग्रहण की पीड़ा, हाथी और       सपं का बंधन और पण्डित की दरिद्रता, देख कर       मेरी तो समझ में यह आता है कि प्रारब्ध ही       बलवान है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  और आकाश के एकांत स्थान में विहार करने       वाले पक्षी भी विपत्ति में पड़ जाते हैं। और चतुर धीवर       मछलियों को अथाह समुद्र में भी पकड़       लेते हैं। इस संसार में दुर्नीति क्या है और       सुनीति क्या है और विपत्तिरहित स्थान के       लाभ में क्या गण है ? अर्थात कुछ नहीं है। क्योंकि काल आपत्तिरुप अपने हाथ       फैला कर बैठा है और कुछ समय आने पर दूर ही से ग्रहण कर झपट       लेता है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;       यों समझा कर और अतिथि सत्कार कर तथा       मिल भेटकर उसने चित्रग्रीव को विदा किया और वह अपने परिवारसमेत अपने देश को गया। हिरण्यक       भी अपने बिल में घुस गया।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  इसके बाद लघुपतनक नामक कौवा सब       वृत्तांत को जानने वाला आश्चर्य से यह बोला-- हे हिरण्यक, तुम प्रशंसा के       योग्य हो, इसलिए कृपा करके मुझसे       भी मित्रता कर लो। यह सुन कर हिरण्यक       भी बिल के भीतर से बोला-- तू कौन है ? वह       बोला-- मैं लघुपतनक नामक कौवा हूँ। हिरण्यक हँस कर कहने       लगा-- तेरे संग कैसी मित्रता ?&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  क्योंकि पंडित को चाहिए कि जो वस्तु       संसार में जिस वस्तु के योग्य हो उसका उससे       मेल आपस में कर दें, मैं तो अन्न हूँ और तुम खाने       वाले हो। इस लिए भक्ष्य और भक्षक की प्रीति कैसी होगी ?&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  कौवा बोला-- तुझे खा लेने से भी तो       मेरा बहुत आहार नहीं होगा, मैं निष्कपट चित्रग्रीव के       समान तेरे जीने से जीता रहूँगा।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  पुण्यात्मा मृग- पक्षियों का भी विश्वास देखा जाता है, क्योंकि पुण्य ही करने       वाले सज्जनों का स्वभाव सज्जनता के कारण कभी नहीं पलटता है। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; चाहे जैसे क्रोध       में क्यों न हो सज्जन का स्वभाव कभी डामाडोल न होगा, जैसे जलते हुए तनकों की आँच       से समुद्र का जल कौन गरम कर सकता है ?&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  हिरण्यक ने कहा -- तू चंचल है, ऐसे चंचल के       साथ स्नेह कभी नहीं करना चाहिए। दूसरा तुम       मेरे वैरियों के पक्ष के हो।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  और यह कहा है कि       वैरी चाहे जितना मीठा बन कर मेल करे, परंतु उसके       साथ मेल न करना चाहिये, क्योंकि पानी चाहे जितना       भी गरम हो आग को बुझा ही देता है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  दुर्जन विद्यावान       भी हो, परंतु उसे छोड़ देना चाहिये, क्योंकि       रत्न से शोभायमान सपं क्या भयंकर नहीं होता है&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  जो बात नही हो सकती, वह कदापि नहीं हो       सकती है और जो हो सकती है, वह हो ही       सकती है, जैसे पानी पर गाड़ी नहीं चलती और जमीन पर नाव नहीं चल       सकती है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;       लघुपतनक कौवा बोला-- मैंने सब       सुन लिया, तो भी मेरा इतना संकल्प है कि तेरे       संग मित्रता अवश्य करनी चाहिए। नहीं तो       भूखा मर अपघात कर्रूँगा।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  दुर्जनों के मन में कुछ, वचन में और काम       में कुछ, और सज्जनों के जी में, बचन       में और काम में एक बात होती है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  इसलिये तेरा भी मनोरथ हो। यह कह कर हिरण्यक मित्रता करके विविध प्रकार के       भोजन से कौवे को संतुष्ट करके बिल में घुस गया और कौवा       भी अपने स्थान को चला गया। उस दिन से       उन दोनों का आपस में भोजन के देने-       लेने से, कुशल पूछने से और विश्वासयुक्त       बातचीत से समय कटने लगा।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  एक दिन लघुपतनक ने हिरण्यक से कहा -- मित्र, इस स्थान       में बड़ी मुश्किल से भोजन मिलता है, इसलिए इस स्थान को छोड़कर दूसरे स्थान       में जाना चाहता हूँ। हिरण्यक ने कहा -- मित्र, कहाँ जाओगे ?&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;        &lt;p align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; बुद्धिमान एक पैर से चलता है और दूसरे       से ठहरता है। इसलिए दूसरा स्थान निश्चत किये       बिना पहला स्थान नहीं छोड़ना चाहिये।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  कौवा बोला -- एक अच्छी भांति देखा भाला स्थान है। हिरण्यक       बोला-- कौन सा है ?  कौआ बोला -- दण्डकवन       में कर्पूरगौर नाम का एक सरोवर है, उसमें       मन्थरनामक एक धर्मशील कछुआ मेरा बहुत पुराना और प्यारा मित्र रहता है। वह विविध प्रकार के       भोजन से मेरा सत्कार करेगा। हिरण्यक       भी बोला-- तो मैं यहाँ रह कर क्या कर्रूँगा&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  क्योंकि जिस देश       में न सन्मान, न जीविका का साधन, न भाई       या संबंधी और कुछ विद्या का भी लाभ न हो, उस देश को छोड़ देना चाहिये।       अर्थात दूसरे शब्दों में जीविका, अभय,       लज्जा, सज्जनता और उदारता ये पाँचों       बातें जहाँ न हो, वहाँ नहीं रहना चाहिये।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;       साथ ही, जहाँ ॠण देने वाला, वैद्य, वेदपाठी और       सुंदर जल से भरी नदी, ये चारों न हो, वहाँ नहीं रहना चाहिए।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  इसलिये मुझे भी वहाँ ले चलो। बाद       में कौवा उस मित्र के साथ अच्छी अच्छी बातें करता हुआ       बेखटके उस सरोवर के पास पहुँचा। फिर       मन्थर ने उसे दूर से देखते ही लघुपतनक का       यथोचित अतिथिसत्कार करके चूहे का       भी अतिथिसत्कार किया।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  क्योंकि बालक, बूढ़ा और युवा इनमें       से घर पर कोई आया हो, उसका आदर       सत्कार करना चाहिये, क्योंकि अभ्यागत सब       वर्णो का पूज्य है। ब्राह्मणों को अग्नि, चारों       वणाç को ब्राह्मण, स्रियों को पति और       सबको अभ्यागत सर्वदा पूजनीय है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  कौवा बोला-- मित्र मन्थर, इसका अधिक       सत्कार करो, क्योंकि यह पुण्यात्माओं का&lt;br /&gt;       मुखिया और करुणा का समुद्र हिरण्यक नामक चूहों का       राजा है। इसके गुणों की बड़ाई दो सहस्त्र जीभों       से शेष नाग भी कभी नहीं कर सकता है। यह कह कर चित्रग्रीव का       वृत्तांत कह सुनाया। मन्थर बड़े आदर       से हिरण्यक का सत्कार करके पूछने       लगा-- हे मित्र, यह निर्जन वन में अपने आने का       भेद तो कहो।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  विपत्तियों के आ जाने पर निर्णय करके काम करना ही चतुराई है, क्योंकि       बिना विचारे काम करने वालों को पद       में विपत्तियाँ हैं। कुल की मर्यादा के       लिए एक हो, गाँवभर के लिए कुल को, देश के       लिए गाँव को और अपने लिये पृथ्वी को छोड़ देना चाहिये।       अनायास मिला हुआ जल और भय से       मिला मीठा भोजन उन दोनों में विचार कर देखता हूँ, तो जिसमें चित्त       बेखटक रहे उसी में सुख है या पराधीन       भोजने से सवाधीन जल का मिलना उत्तम है। यह विचार कर       मैं निर्जन वन में आया हूँ।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; सिंह और हाथियों       से भरे हुए वन के नीचे रहना, पके हुए कंद       मूल फल खाकर जल पान करना तथा घास के       बिछौने पर सोना और छाल के वस्र पहनना       अच्छा है, पर भाई बंधुओं के बीच धनहीन जीना       अच्छा नहीं है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  फिर मेरे पुण्य से उदय से इस मित्र ने परम स्नेह       से मेरा आदर किया और अब पुण्य की       रीति से तुम्हारा आश्रय मुझे स्वर्ग के       समान मिल गया।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;       मंथन बोला-- धन तो चरणों की धूलि के       समान है, यौवन पहाड़ की नदी के वेग के       समान है, आयु चंचल जल की बिंदु के       समान चपल है और जीवन फेन के समान है, इसलिए जो निर्बुद्धि       स्वर्ग की आगल को खोलने वाले धर्म को नहीं करता है, वह पीछे       बुढ़ापे में पछता कर शोक की अग्नि में जलाया जाता है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  गंभीर सरोवर       में भरे हुए जल के चारों ओर निकलने के (बार-       बार जल निकाल देना जैसा सरोवर की       शुद्धि का कारण है, उसी के) समान कमाये हुए धन का       सत्पात्र में दान करना ही रक्षा है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;       लोभी जिस धन को धरती में अधिक नीचे गाड़ता है, वह धन पाताल       में जाने के लिए पहले से ही मार्ग कर       लेता है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  और जो मनुष्य अपने सुख को रोक कर धनसंचय करने की इच्छा करता है, वह दूसरों के       लिए बोझ ढ़ोने वाले मजदूर के समान क्लेश ही       भोगने वाला है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  दान और उपभोगहीन धन       से जो धनी होते हैं, तो क्या उसी धन       से हम धनी नहीं हैं ? अर्थात अवश्य है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  जो मनुष्य धन को देवता के,       ब्राह्मण के तथा भाई बंधु के काम में नहीं       लाता है, उसे कृपण का धन तो जल जाता है या चोर चुरा       ले जाते हैं अथवा राजा छीन लेता है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  प्रिय वाणी के सहित दान, अहंकाररहित ज्ञान, क्षमायुक्त       शूरता, और दानयुक्त धन, ये चार बातें दुनिया       में दुर्लभ हैं।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  और संचय नित्य करना चाहिये, पर अति       संचय करना योग्य नहीं है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  महात्माओं का स्नेह       मरने तक, क्रोध केवल क्षणमात्र और परित्याग केवल संगरहित होता है       अर्थात वे कुछ बुराई नहीं करते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;        &lt;p align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; यह सुनकर       लघुपतनक बोला-- हे मन्थर, तुम धन्य हो, और तुम प्रशंसनीय गुणवाले हो।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; सज्जन ही सज्जनों की आपत्ति को       सर्वदा दूर करने के योग्य होते हैं। जैसे कीचड़       में फँसे हाथियों के निकालने के       लिए हाथी ही समर्थ होते हैं।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  तब वे इस प्रकार अपनी इच्छानुसार खाते - पीते, खेलते - कूदते संतोष कर       सुख से रहने लगे।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  एक दिन चित्रांग नामक मृग किसी के डर के       मारे उनसे आ कर मिला, इसके पीछे       मृग को आता हुआ देख भय को समझ       मन्थर तो पानी मे घुस गया, चूहा बिल में चला गया और काक       भी उड़ कर पेड़ पर बैठ गया। फिर लघुपतनक ने दूसरे       से निर्णय किया कि, भय का कोई भी कारण नहीं है, यह       सोचकर बाद में सब मिल कर वहाँ ही       बैठ गये। मन्थरने कहा -- कुशल हो ? हे       मृग, तुम्हारा आना अच्छा हुआ। अपनी इच्छानुसार जल आहार आदि       भोग करो अर्थात खाओ, पीयो,और यहाँ रह कर इस       वन को सनाथ करो। चित्रांग बोला --       व्याध के डर से मैं तुम्हारी शरण में आया हूँ और तुम्हारे       साथ मित्रता करनी चाहता हूँ। हिरण्य       बोला-- मित्रता तो हमारे साथ तुम्हारी       अनायास हो गई है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  क्योंकि मित्र चार प्रकार के होते हैं, एक तो       वो जिनका जन्म से ही जैसे पुत्रादि, दूसरे विवाहादि       संबंध से हो गये हो, तीसरे कुल परंपरा       से आए हुए हों तथा चौथे वे जो आपत्तियों       से बचावें।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  इसलिए यहाँ तुम अपने घर से भी अधिक आनंद       से रहो। यह सुन कर मृग प्रसन्न हो अपनी इच्छानुसार       भोजन करके तथा जल पी कर जल के पास       वृक्ष की छाया में बैठ गया। मन्थर ने कहा कि -- हे मित्र       मृग, इस निर्जन वन में तुम्हें किसने डराया है  क्या कभी कभी&lt;br /&gt;       व्याध आ जाते हैं मृग ने कहा -- कलिंग देश       में रुक्मांगद नामक राजा है और वह दिग्विजिय करने के       लिये आ कर चंद्रभागा नदी के तीर पर अपनी       सेना को टिका कर ठहरा है। और प्रातःकाल वह यहाँ आ कर कर्पूर       सरोवर के पास ठहरेगा, यह उड़ती हुई       बात शिकारियों के मुख से सुनी जाती है। इसलिये प्रातःकाल यहाँ रहना       भी भय का कारण है। यह सोच कर समय के       अनुसार काम करना चाहिये। यह सुन कर कछुआ डर कर       बोला -- मैं तो दूसरे सरोवर को जाता हूँ। काग और       मृग ने भी कहा -- ऐसा ही हो अर्थात चलो। फिर हिरण्यक हँस कर       बोला-- दूसरे सरोवर तक पहुँचने पर       मंथर जीता बचेगा। परंतु इसके पटपड़       में चलने का कौन सा उपाय है। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  जल के जंतुओं को जल का, गढ़       में रहने वालों को गढ़ का, सिंहादि       वनचरों को अपनी भूमि का और राजाओं को अपने       मंत्री का परम बल होता है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  उसके हितकारक वचनों को न मान कर       बड़े भय से मूर्ख की भांति वह मन्थर उस       सरोवर को छोड़ कर चला। वे हिरण्यक आदि       भी स्नेह से विपत्ति की शंका करते हुए       मन्थर के पीछे- पीछे चले। फिर पटपड़       में जाते हुए मन्थर को, वन में घूमते हुए किसी       व्याध ने पाया। वह उसे पा कर धनुष       मे बांध घुमता हुआ क्लेस से उत्पन्न हुई क्षुधा ओर प्यास       से व्याकुल, अपने घर की ओर चला। पीछे       मृग, काग और चूहा वे बड़ा विषाद करते हुए उसके पीछे- पीछे चले।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  हिरण्यक विलाप करने लगा -- समुद्र के पार के       समान नि:सीमा एक दुख के पार जब तक       मैं नहीं जाता हूँ, तब तक मेरे लिए दूसरा दुख आ कर उपस्थित हो जाता है, क्योंकि       अनर्थ के साथ बहुत से अनर्थ आ पड़ते हैं।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;       स्वभाव से स्नेह करने वाला मित्र तो प्रारब्ध       से ही मिलता है कि जो सच्ची मित्रता को आपत्तियों       में भी नहीं छोड़ता है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  न माता, न स्री       में, न सगे भाई में , न पुत्र में ऐसा विश्वास होता है कि जैसा       स्वाभाविक मित्र में होता है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  इस संसार में अपने पाप- पुण्यों से किये गये और समय के उलट- पलट       से बदलने वाले सुख- दुख , पुर्वजन्म के किये हुए पाप- पुण्यों के फल       मैंने यहाँ ही देख लिये।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; अथवा यह ऐसे ही है --       शरीर के पास ही उसका नाथ है और       संपत्तियाँ आपत्तियों का मुख्य स्थान है और       संयोग के साथ वियोग है, अर्थात अस्थिर है और       उत्पन्न हुआ सब सब नाथ होने वाला है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  और विचार कर बोला -- शोक और शत्रु के       भय से बचाने वाला तथा प्रीति और विश्वास का पात्र, यह दो       अक्षर का मित्र रुपी रत्न किसने रचा है ?&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  और अंजन के समान नेत्रों को प्रसन्न करने       वाला, चित्त को आनंद देने वाला और मित्र के       साथ सुख दुख में साथ देने वाला, अर्थात दुख       में दुखी, सुख में सुखी हो ऐसा मित्र होना दुर्लभ है और       संपत्ति के समय में धन हरने वाले मित्र हर जगह       मिलते हैं। परंतु विपत्काल ही उनके परखने की कसौटी है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  इस प्रकार बहुत- सा विलास करके हिरण्यने चित्रांग और       लघुपतनक से कहा -- जब तक यह व्याध       वन से न निकल जाए, तब तक मन्थर को छुड़ाने का       यत्न करो। वे दोनों बोले-- शीघ्र कार्य को कहिये। हिरण्यक       बोला-- चित्रांग जल के पास जा कर मरे के       समान अपना शरीर दिखावे और काक उस पर       बैठ के चोंच से कुछ- कुछ खोदे। यह       व्याध कछुए को अवश्य वहाँ छोड़ कर       मृगमाँस के लोभ से शीघ्र जाएगा। फिर       मैं मन्थर के बंधन काट डालूँगा। और जब       व्याध तुम्हारे पास आवे तब भाग जाना। तब चित्रांग और       लघुपतनक ने शीघ्र जा कर वैसा ही किया तो वह       व्याध पानी पी कर एक पेड़ के नीचे बैठा       मृग को उस प्रकार देख पाया। फिर छुरी       लेकर आनंदित होता हुआ मृग के पास जाने       लगा। इतने ही में हिरण्यक ने आ कर कछुए को       बंधन काट डाला। तब वह कछुआ शीघ्र       सरोवर में घुस गया। वह मृग उस       व्याध को पास आता हुआ देख उठ कर भाग गया। जब       व्याध लौट कर पेड़ के नीचे आया, तब कछुए को न देखकर       सोचने लगा-- मेरे समान बिना विचार करने       वाले के लिए यही उचित था।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  जो निश्चित को छोड़ कर अनिश्चित पदार्थ का आसरा करता है, उसके निश्चित पदार्थ नष्ट हो जाते हैं और अनिश्चित       भी जाता रहता है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  फिर वह अपने प्रारब्ध को दोष लगाता हुआ निराश होकर अपने घर गया।       मन्थर आदि भी सब आपत्ति से निकल अपने- अपने स्थान पर जा कर       सुख से रहने लगे।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255); font-weight: bold;font-size:130%;" &gt;&lt;span&gt;कथा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;३&lt;/span&gt;:&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255); font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;     &lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;मृग, काग और &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;धूर्त&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; गीदड़&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;मगध देश में चंपकवती नामक एक महान अरण्य था, उसमें बहुत दिनों में मृग और कौवा बड़े स्नेह से रहते थे। किसी गीदड़ ने उस मृग को हट्ठा- कट्ठा और अपनी इच्छा से इधर- उधर घूमता हुआ देखा, इसको देख कर गीदड़ सोचने लगा -- अरे, कैसे इस सुंदर (मीठा) माँस खाऊँ ? जो हो, पहले इसे विश्वास उत्पन्न कराऊँ। यह विचार कर उसके पास जाकर बोला -- हे मित्र, तुम कुशल हो ? मृग ने कहा "तू कौन है ?' वह बोला -- मैं क्षुद्रबुद्धि नामक गीदड़ हूँ। इस वन में बंधुहीन मरे के समान रहता हूँ, और सब प्रकार से तुम्हारा सेवक बन कर रहूँगा। मृग ने कहा -- ऐसा ही हो, अर्थात रहा कर। इसके अनंतर किरणों की मालासे भगवान सूर्य के अस्त हो जाने पर वे दोनों मृग के घर को गये और वहाँ चंपा के वृक्ष की डाल पर मृग का परम मित्र सुबुद्धि नामक कौवा रहता था। कौए ने इन दोनों को देखकर कहा -- मित्र, यह चितकवरा दूसरा कौन है ? मृग ने कहा -- यह गीदड़ है। हमारे साथ मित्रता करने की इच्छा से आया है। कौवा बोला -- मित्र, अनायास आए हुए के साथ मित्रता नहीं करनी चाहिये।&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;       &lt;br /&gt;       &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; कहा भी गया है कि -- जिसका कुल और स्वभाव नहीं जाना है, उसको घर में कभी न ठहराना चाहिए, क्योंकि बिलाव के अपराध में एक बूढ़ा गिद्ध मारा गया।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;यह सुनकर सियार झुंझलाकर बोला-- मृग से पहले ही मिलने के दिन तुम्हारी भी तो कुल और स्वभाव नहीं जाना गया था। फिर कैसे तुम्हारे साथ इसकी गाढ़ी मित्रता हो गई।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; जहाँ पंडित नहीं होता है, वहाँ थोड़े पढ़े की भी बड़ाई होती है। जैसे कि जिस देश में पेड़ नहीं होता है, वहाँ अरण्डाका वृक्ष ही पेड़ गिना जाता है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  और दूसरे यह अपना है या पराया है, यह अल्पबुद्धियों की गिनती है। उदारचरित वालों को तो सब पृथ्वी ही कुटुंब है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;जैसा यह मृग मेरा बंधु है, वैसे ही तुम भी हो। मृग बोला -- इस उत्तर- प्रत्युत्तर से क्या है ? सब एक स्थान में विश्वास की बातचीत कर सुख से रहो।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;क्योंकि न तो कोई किसी का मित्र है, न कोई किसी का शत्रु है। व्यवहार से मित्र और शत्रु बन जाते हैं। कौवे ने कहा-- ठीक है। फिर प्रातःकाल सब अपने अपने मनमाने देश को गये।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;एक दिन एकांत में सियार ने कहा -- मित्र मृग, इस वन में एक दूसरे स्थान में अनाज से भरा हुआ खेत है, सो चल कर तुझे दिखाऊँ। वैसा करने पर मृग वहाँ जा कर नित्य अनाज खाता रहा। एक दिन उसे खेत वाले ने देख कर फँदा लगाया। इसके बाद जब वहाँ मृग फिर चरने को आया सो ही जाल में फँस गया और सोचने लगा-- मुझे इस काल की फाँसी के समान व्याध के फंदे से मित्र को छोड़कर कौन बचा सकता है ? इस बीच में सियार वहाँ आकर उपस्थित हुआ और सोचने लगा-- मेरे छल की चाल से मेरा मनोरथ सिद्ध हुआ और इस उभड़े हुए माँस और लहू लगी हुई हड्डियाँ मुझे अवश्य मिलेंगी और वे मनमानी खाने के लिए होंगी। मृग उसे देख प्रसन्न होकर बोला -- हो मित्र मेरा बंधन काटो और मुझे शीघ्र बचाओ।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;        &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt; &lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  आपत्ति में मित्र, युद्ध में शूर, उधार में सच्चा व्यवहार, निर्धनता में स्री और दु:ख में&lt;br /&gt;       भाई (या कुटुंबी) परखे जाते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;        &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;  &lt;/p&gt;        &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; और दूसरे विवाहादि       उत्सव में, आपत्ति में, अकाल में, राज्य के पलटने       में, राजद्वार में तथा श्मशान में, जो       साथ रहता है, वह बांधव है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  सियार जाल को बार- बार देख सोचने       लगा -- यह बड़ा कड़ा बंध है और बोला-- ""मित्र,       ये फँदे तांत के बने हुए हैं, इसलिए आज       रविवार के दिन इन्हें दाँतों से कैसे छुऊँ मित्र जो       बुरा न मानो तो प्रातः काल जो कहोगे,       सो कर्रूँगा''। ऐसा कह कर उसके पास ही वह अपने को छिपा कर       बैठ गया। पीछे वह कौवा सांझ होने पर       मृग को नहीं आया देख कर इधर- उधर ढ़ूढ़ते- ढ़ूंढ़ते उस प्रकार उसे (बंधन       में) देख कर बोला --""मित्र, यह क्या है ?''       मृग ने कहा -- ""मित्र का वचन नहीं मानने का फल है''।&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  जैसा कहा गया है कि जो मनुष्य अपने हितकारी मित्रों का       वचन नहीं सुनता है, उसके पास ही विपत्ति है और अपने       शत्रुओं को प्रसन्न करने वाला है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  कौवा बोला -- ""वह ठग कहाँ है ? मृग ने कहा --""मेरे       मांस का लोभी यहाँ ही कहाँ बैठा होगा ? कौवा       बोला -- मैंने पहले ही कहा था।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;       मेरा कुछ अपराध नहीं है, अर्थात मैंने इसका कुछ नहीं       बिगाड़ा है, अतएव यह भी मेरे संग विश्वासघात न करेगा, यह       बात कुछ विश्वास का कारण नहीं है, क्योंकि गुण और दोष को       बिना सोचे शत्रुता करने वाले नीचों       से सज्जनों को अवश्य भय होता ही है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  और जिनकी मृत्यु पास आ गयी है, ऐसे मनुष्य न तो       बुझे हुए दिये की चिरांद सूंघ सकते हैं, न मित्रता का       वचन सुनते हैं और न अर्रूंधती के तारे को देख       सकते हैं।&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  पीठ पीछे काम       बिगाड़ने वाले और मुख पर मीठी-       मीठी बातें करने वाले मित्र को, मुख&lt;br /&gt;       पर दूध वाले विष के घड़े के समान छोड़ देना चाहिए।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  कौवे ने लंबी सांस भर कर कहा कि --"" अरे ठग, तुझ पापी ने यह क्या किया ?'' क्योंकि       अच्छे प्रकार से बोलने वालों को, मीठे-       मीठे वचनों तथा मि कपट से वश       में किये हुओं को, आशा करने वालों को,       भरोसा रखने वालों को और धन के       याचकों को, ठगना क्या बड़ी बात है ?&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  और हे पृथ्वी, जो मनुष्य उपकारी, विश्वासी तथा       भोले- भाले मनुष्य के साथ छल करता है उस ठग पुरुष को हे       भगवति पृथ्वी, तू कैसे धारण करती है&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; दुष्ट के साथ मित्रता और प्रीति नहीं करनी चाहिये, क्योंकि गरम अंगारा हाथ को जलाता है और ठंढ़ा हाथ को काला कर देता है। दुर्जनों का यही आचरण है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;       मच्छर दुष्ट के समान सब चरित्र करता है,       अर्थात् जैसे दुष्ट पहले पैरों पर गिरता है,       वैसे ही यह भी गिरता है। जैसे दुष्ट पीठ पीछे       बुराई करता है, वैसे ही यह भी पीठ       में काटता है। जैसे दुष्ट कान के पास       मीठी मीठी बात करता है, वैसे ही यह भी कान के पास       मधुर विचित्र शब्द करता है और जैसे दुष्ट आपत्ति को देखकर निडर हो बुराई करता है,       वैसे ही मच्छर भी छिद्र अर्थात् रोम के छेद       में प्रवेश कर काटता है।&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  और दुष्ट मनुष्य का प्रियवादी होना यह विश्वास का कारण नहीं है। उसकी जीभ के आगे मिठास और हृदय       में हालाहल विष भरा है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;प्रातःकाल कौवे ने उस खेत वाले को लकड़ी हाथ में लिये उस स्थान पर आता हुआ देखा, उसे देख कर कौवे ने मृग से कहा --""मित्र हरिण, तू अपने शरीर को मरे के समान दिखा कर पेट को हवा से फुला कर और पैरों को ठिठिया कर बैठ जा। जब मैं शब्द कर्रूँ तब तू झट उठ कर जल्दी भाग जाना। मृग उसी प्रकार कौवे के वचन से पड़ गया। फिर खेत वाले ने प्रसन्नता से आँख खोल कर उस मृग को इस प्रकार देखा, आहा, यह तो आप ही मर गया। ऐसा कह कर मृग की फाँसी को खोल कर जाल को समेटने का प्रयत्न करने लगा, पीछे कौवे का शब्द सुन कर मृग तुरंत उठ कर भाग गया। इसको देख उस खेत वाले ने ऐसी फेंक कर लकड़ी मारी कि उससे सियार मारा गया।&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  जैसा कहा गया है कि प्राणी तीन वर्ष, तीन मास, तीन पक्ष और तीन दिन में, अधिक पाप और पुण्य का फल यहाँ ही भोगता है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;कथा&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;४&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;:&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);font-family:Gargi;font-size:130%;"  &gt;भैरव नामक शिकारी, मृग, शूकर &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);font-family:Gargi;font-size:130%;"  &gt;और       गीदड़&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;कल्याणकटक बस्ती में एक भैरव नामक व्याध (शिकारी) रहता था। वह एक दिन मृग को ढ़ूढ़ता- ढ़ूंढ़ता विंध्याचल की ओर गया, फिर मारे हुए मृग को ले कर जाते हुए उसने एक भयंकर शूकर को देखा। तब उस व्याध ने मृग को भूमि पर रख कर शूकर को बाण से मारा। शूकर ने भी भयंकर गर्जना करके उस व्याध के मुष्कदेश मे ऐसी टक्कर मारी कि, वह कटे पेड़ के समान जमीन पर गिर पड़ा।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  क्योंकि जल, अग्नि, विष, शस्र, भूख, रोग और पहाड़ से गिरना इसमें से किसी- न- किसी बहाने को पा कर प्राणी प्राणों से छूटता है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;उन दोनों के पैरों की रगड़ से एक सपं भी मर गया। इसके पीछे आहार को चाहने वाले दीर्घराव नामक गीदड़ ने घूमते घूमते उन मृग, व्याध, सपं और शूकर को मरे पड़े हुए देखा और विचारा कि आहा, आज तो मेरे लिए बड़ा भोजन तैयार है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;अथवा, जैसे देहधारियों को अनायास दु:ख मिलते हैं वैसे ही सुख भी मिलते हैं, परंतु इसमें प्रारब्ध बलवान है, ऐसा मानता हूँ। जो कुछ हो, इनके माँसों से मेरे तीन महीने तो सुख से कटेंगे।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  एक महीने को मनुष्य होगा, दो महीने को हरिण और शूकर होंगे और एक दिन को सपं&lt;br /&gt;       होगा और आज धनुष की डोरी चाबनी चाहिये।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;फिर पहले भूख में यह स्वादरहित, धनुष में लगा हुआ तांत का बंधन खाउँ। यह कह कर वैसा करने पर तांत के बंधन के टूटते ही उछटे हुए धनुष से हृदय फट कर वह दीर्घराव मर गया। इसलिए कहा गया है, संचय नित्य करना चाहिये।&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;       &lt;br /&gt;       &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; शास्र पढ़ कर भी मूर्ख होते हैं, परंतु जो क्रिया में चतुर हैं, वहीं सच्चा पण्डित है, जैसे अच्छे प्रकार से निर्णय की हुई औषधि भी रोगियों को केवल नाममात्र से अच्छा नहीं कर देती है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;शास्र की विधि, पराक्रम से डरे हुए मनुष्य को कुछ गुण नहीं करती है, जैसे इस संसार में हाथ पर धरा हुआ भी दीपक अंधे को वस्तु नहीं दिखा सकती है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;इस शेष दशा में शांति करनी चाहिये और इसे भी अधिक क्लेश तुमको नहीं मानना चाहिये। क्योंकि राजा, कुल की वधु, ब्राह्मण, मंत्री, स्तन, दंत, केश, नख और मनुष्य ये अपने स्थान से अलग हुए शोभा नहीं देते हैं। यह जान कर बुद्धिमान को अपना स्थान नहीं छोड़ना चाहिये। यह कायर पुरुष का वचन है।&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  क्योंकि, सिंह, सज्जन पुरुष और हाथी ये स्थान को छोड़ कर जाते हैं और काक, कायर पुरुष और मृग ये वहाँ ही नाश होते हैं।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;वीर और उद्योगी पुरुषों को देश और विदेश क्या है ? अर्थात जैसा देश वैसा ही विदेश। वे तो जिस देश में रहते हैं, उसी को अपने बाहु के प्रताप से जीत लेते हैं। जैसे सिंह वन में दांत, नख, पूँछ के प्रहार करता हुआ फिरता है, उसी वन में (अपने बल से) मारे हुए हाथियों के रुधिर से अपने प्यास बुझाता है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;और जैसे मैण्डक कूप के पास पानी के गड्ढ़े में और पक्षी भरे हुए सरोवर को आते हैं, वैसे ही सब संपत्तियाँ अपने आप उद्योगी पुरुष के पास आती हैं।&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; और आए हुए सुख और दु:ख को भोगना चाहिये। क्योंकि सुख और दु:ख पहिये की तरह घुमते हैं (यानि सुख के बाद दुख और दुख के बाद सुख आता जाता है।)&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;और दूसरे- उत्साही तथा आलस्यहीन, कार्य की रीति को जानने वाला, द्यूतक्रीड़ा आदि व्यसन से रहित, शूर, उपकार को मानने वाला और पक्की मित्रता वाला ऐसे पुरुष के पास रहने के लिए लक्ष्मी आप ही जाती है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;कथा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;५&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;:&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-family:Gargi;font-size:130%;"  &gt;धूर्त गीदड़ और कर्पूरतिलक हाथी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;ब्रह्मवन में कर्पूरतिलक नामक हाथी था। उसको देखकर सब गीदड़ों ने सोचा,""यदि यह किसी तरह से मारा जाए तो उसकी देह से हमारा चार महीने का भोजन होगा।'' उसमें से एक बूढ़े गीदड़ ने इस बात की प्रतिज्ञा की -- मैं इसे बुद्धि के बल से मार दूँगा। फिर उस धूर्त ने कर्पूरतिलक हाथी के पास जा कर साष्टांग प्रणाम करके कहा -- महाराज, कृपादृष्टि कीजिये। हाथी बोला -- तू कौन है, सब वन के रहने वाले पशुओं ने पंचायत करके आपके पास भेजा है, कि बिना राजा के यहाँ रहना योग्य नहीं है, इसलिए इस वन के राज्य पर राजा के सब गुणों से शोभायमान होने के कारण आपको ही राजतिलक करने का निश्चय किया है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  जो कुलाचार और लोकाचार में निपुण हो तथा प्रतापी, धर्मशील और नीति में कुशल हो वह पृथ्वी पर राजा होने के योग्य होता है।&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;       &lt;br /&gt;       &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt; पहले राजा को ढ़ूंढ़ना चाहिये, फिर स्री और उसके बाद धनको ढूंढ़े, क्योंकि राजा के नहीं होने से इस दुनिया में कहाँ स्री और कहाँ से धन मिल सकता है ?&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;राजा प्राणियों का मेघ के समान जीवन का सहारा है और मेवके नहीं बरसने से तो लोक जीता रहता है, परंतु राजा के न होने से जी नहीं सकता है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;इस राजा के अधीन इस संसार में बहुधा दंड के भय से लोग अपने नियत कार्यों में लगे रहते है और न तो अच्छे आचरण में मनुष्यों का रहना कठिन है, क्योंकि दंड के ही भय से कुल की स्री दुबले, विकलांग रोगी या निर्धन भी पति को स्वीकार करती है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;इस लिए लग्न की घड़ी टल जाए, आप शीघ्र पधारिये। यह कह उठ कर चला फिर वह कर्पूरतिलक राज्य के लोभ में फँस कर गीदड़ों के पीछे दौड़ता हुआ गहरी कीचड़ में फँस गया। फिर उस हाथी ने कहा -- ""मित्र गीदड़, अब क्या करना चाहिए ? कीचड़ में गिर कर मैं मर रहा हूँ। लौट कर देखो। गीदड़ ने हँस कर कहा -- "" महाराज, मेरी पूँछ का सहारा पकड़ कर उठो, जैसा मुझ सरीखे की बात पर विश्वास किया, तैसा शरणरहित दुख का अनुभव करो।&lt;br /&gt;       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                &lt;p style="margin-top: 1px; margin-bottom: 1px;" align="left"&gt;&lt;span style="font-family:Gargi;font-size:130%;"&gt;  जैसा कहा गया है -- जब बुरे संगत से बचोगे तब जानो जीओगे, और जो दुष्टों की संगत में पड़ोगे तो मरोगे।&lt;br /&gt;       फिर बड़ी कीचड़ में फँसे हुए हाथी को गीदड़ों ने खा लिया।       &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;(इन कथाओं की नक़ल या प्रकाशन सर्वथा वर्जित है) &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3486815723019470360-1227142331383675345?l=anuragshandilyahindi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anuragshandilyahindi.blogspot.com/feeds/1227142331383675345/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3486815723019470360&amp;postID=1227142331383675345&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3486815723019470360/posts/default/1227142331383675345'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3486815723019470360/posts/default/1227142331383675345'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anuragshandilyahindi.blogspot.com/2008/12/blog-post_18.html' title='हितोपदेश की कथाएँ- मित्रलाभ'/><author><name>ANURAG SHANDILYA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09780770213161059080</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3486815723019470360.post-8147593020200481669</id><published>2008-12-17T15:53:00.000+05:30</published><updated>2008-12-17T16:39:40.820+05:30</updated><title type='text'>शिक्षाप्रद कहानियाँ</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;कहानी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;१&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;:&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255); font-weight: bold;"&gt;हितैषियों का साथ&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; &lt;span style="font-weight: bold;"&gt;(&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;पंचतंत्र&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;) &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी जंगल में एक सियार रहता था। एक बार भोजन के लालच में वह शहर में चला आया। शहर  के कुत्ते उसके पीछे पड़ गए। डर के कारण सियार एक धोबी के घर में घुस गया। धोबी के  आँगन में एक नाँद था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सियार उसी में कूद गया। इससे वह पूरी तरह नीले रंग  में रंग गया। कुत्तों ने जब उसका नीला शरीर देखा तो उसे कोई विचित्र और भयानक जंतु  समझकर भाग खड़े हुए। सियार मौका पाकर निकला और सीधे जंगल में चला गया। नीले रंगवाले  विचित्र पशु को देखकर शेर और बाघ तक उससे भयभीत हो गए। वे इधर-उधर भागने  लगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धूर्त सियार ने सबको भय से व्याकुल जानकर कहा-‘भाई, तुम मुझे देखकर इस  तरह क्यों भाग रहे हो? मुझे तो विधाता ने आज स्वयं अपने हाथों से बनाया है। जानवरों  का कोई राजा नहीं था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए ब्रह्मा ने मेरी रचना करके कहा-‘मैं तुम्हें सभी  जानवरों का राजा बनाता हूँ। तुम धरती पर जाकर जंगली जंतुओं का पालन करो। मैं  ब्रह्मा के आदेश से ही आया हूँ’’ नीला जानवर उन सबका स्वामी है-यह बात सुनकर सिंह,  बाघ आदि सभी जंतु उसके समीप आकर बैठ गए। वे उसे प्रसन्न करने के लिए उसकी चापलूसी  करने लगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धूर्त सियार ने सिंह को अपना महामंत्री नियुक्त किया। इसी प्रकार  बाघ को सेनानायक बनाया, चीते को पान लगाने का काम सौंपा, भेड़िए को द्वारपाल बना  दिया। उसने सभी जीव-जंतुओं को कोई-न-कोई जिम्मेदारी सौंपी, लेकिन अपनी जाति के  सियारों से बात तक न की। उन्हें धक्के देकर बाहर निकलवा दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिंह आदि  जंतु जंगल में शिकार करके लाते और उसके सामने रख देते थे। सियार स्वामी की तरह मांस  को सभी जीवों में बाँट देता था। इस प्रकार उसका राजकाज आराम से चलता रहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक  दिन वह अपनी राजसभा में बैठा था। उसे दूर से सियारों के चिल्लाने की आवाज सुनाई  पड़ी। सियारों की ‘हुआ-हुआ’ सुनकर वह पुलकित हो गया और आनंद-विभोर होकर सुर-में-सुर  मिलाकर ‘हुआ-हुआ’करने लगा। उसके चिल्लाने से सिंह आदि जानवरों को पता चल गया कि यह  तो मामूली सियार है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह मक्कारी के बल पर राजा बनकर हम पर शासन कर रहा है।  वे लज्जा और क्रोध से भर गए और उन्होंने एक ही प्रहार से सियार को मार डाला। इसीलिए  कहा गया है कि आत्मीय जनों को कभी नहीं छोड़ना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;कहानी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;२&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;:&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255); font-weight: bold;"&gt;सियार का विश्वासघात&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी जंगल में एक शेर रहता था। एक सियार उसका सेवक था। एक बार एक हाथी से शेर की  लड़ाई हो गई। शेर बुरी तरह घायल हो गया। वह चलने-फिरने में भी असमर्थ हो गया। आहार  न मिलने से सियार भी भूखा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शेर ने सियार से कहा-‘तुम जाओ और किसी पशु को  खोजकर लाओ, जिसे मारकर हम अपने पेट भर सकें।’ सियार किसी जानवर की खोज करता हुआ एक  गाँव में पहुँच गया। वहाँ उसने एक गधे को घास चरते हुए देखा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सियार गधे के  पास गया और बोला-‘मामा, प्रणाम! बहुत दिनों बाद आपके दर्शन हुए हैं। आप इतने दुबले  कैसे हो गए?’ गधा बोला-‘भाई, कुछ मत पूछो। मेरा स्वामी बड़ा कठोर है। वह पेटभर कर  घास नहीं देता। इस धूल से सनी हुई घास खाकर पेट भरना पड़ता है।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सियार ने  कहा-‘मामा, उधर नदी के किनारे एक बहुत बड़ा घास का मैदान है। आप वहीं चलें और मेरे  साथ आनंद से रहें।’गधे ने कहा-‘भाई, मैं तो गाँव का गधा हूँ। वहाँ जंगली जानवरों के  साथ मैं कैसे रह सकूँगा?’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सियार बोला- ‘मामा, वह बड़ी सुरक्षित जगह है।  वहाँ किसी का कोई डर नहीं है। तीन गधियाँ भी वहीं रहती हैं। वे भी एक धोबी के  अत्याचारों से तंग होकर भाग आई हैं। उनका कोई पति भी नहीं है। आप उनके योग्य हो!’  चाहो तो उन तीनों के पति भी बन सकते हो। चलो तो सही।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सियार की बात सुनकर  गधा लालच में आ गया। गधे को लेकर धूर्त सियार वहाँ पहुँचा, जहाँ शेर छिपा हुआ बैठा  था। शेर ने पंजे से गधे पर प्रहार किया लेकिन गधे को चोट नहीं लगी और वह डरकर भाग  खड़ा हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तब सियार ने नाराज होकर शेर से कहा-‘तुम एकदम निकम्मे हो गए! जब  तुम एक गधे को नहीं मार सकते, तो हाथी से कैसे लड़ोगे?’ शेर झेंपता हुआ बोला-‘मैं  उस समय तैयार नहीं था, इसीलिए चूक हो गई।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सियार ने कहा-‘अच्छा, अब तुम  पूरी तरह तैयार होकर बैठो, मैं उसे फिर से लेकर आता हूँ।’ वह फिर गधे के पास  पहुँचा। गधे ने सियार को देखते ही कहा-‘तुम तो मुझे मौत के मुँह में ही ले गए थे। न  जाने वह कौन-सा जानवर था। मैं बड़ी मुश्किल से जान बचाकर भागा!’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सियार ने  हँसते हुए कहा-‘अरे मामा, तुम उसे पहचान नहीं पाए। वह तो गर्दभी थी। उसने तो प्रेम  से तुम्हारा स्वागत करने के लिए हाथ बढ़ाया था। तुम तो बिल्कुल कायर निकले! और वह  बेचारी तुम्हारे वियोग में खाना-पीना छोड़कर बैठी है। तुम्हें तो उसने अपना पति मान  लिया है। अगर तुम नहीं चलोगे तो वह प्राण त्याग देगी।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गधा एक बार फिर सियार  की बातों में आ गया और उसके साथ चल पड़ा। इस बार शेर नहीं चूका। उसने गधे को एक ही  झपट्टे में मार दिया। भोजन करने से पहले शेर स्नान करने के लिए चला गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस  बीच सियार ने गधे के दोनों कानों के साथ-साथ उसका हृदय भी खा लिया। शेर स्नान करके  लौटा तो नाराज होकर बोला-‘ओ सियार के बच्चे! तूने मेरे भोजन को जूठा क्यों किया?  तूने इसके हृदय और कान को क्यों खा लिया?’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धूर्त सियार गिड़गिड़ाता हुआ  बोला-‘महाराज, मैंने तो कुछ भी नहीं खाया है। इस गधे के कान और हृदय थे ही नहीं।  यदि इसके कान और हृदय होते तो यह दोबारा मेरे साथ कैसे आ सकता था। शेर को सियार की  बात पर विश्वास आ गया। वह शांत होकर भोजन करने में जुट गया।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;कहानी&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;३&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;: &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255); font-weight: bold;"&gt;कबूतर की अतिथि सेवा&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी जंगल में एक बहेलिया घूमा करता था। वह पशु-पक्षियों को पकड़ता था और उन्हें  मार देता था। उसका कोई भी मित्र न था। वह हमेशा जाल, डंडा और पिंजरा लेकर जंगल में  घूमता रहता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन उसने एक कबूतरी को पकड़कर अपने पिंजरे में बंद कर  लिया। इसी बीच जंगल में घना अँधेरा छा गया। तेज आँधी आई और मूसलाधार वर्षा होने  लगी। बहेलिया काँपता हुआ एक वृक्ष के नीचे छिपकर बैठ गया। वह दुखी स्वर में  बोला-‘जो भी यहाँ रहता हो, मैं उसकी शरण में हूँ।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसी वृक्ष पर अपनी पत्नी  के साथ एक कबूतर रहता था। उसकी प्रिया कबूतरी अब तक नहीं लौटी थी। कबूतर सोच रहा था  कि शायद आँधी और वर्षा में फँसकर उसकी मृत्यु हो गई थी। कबूतर उसके वियोग में विलाप  कर रहा था। बहेलिए ने जिस कबूतरी को पकड़ा था, वह वही कबूतरी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहेलिए की  पुकार सुनकर पिंजरे में बंद कबूतरी ने कबूतर से कहा-‘इस समय यह बहेलिया तुम्हारी  शरण में आया है। तुम अतिथि समझकर इसका सत्कार करो। इसने ही मुझे पिंजरे में बद कर  रखा है, इस बात पर इससे घृणा मत करो।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कबूतर ने बहेलिए से पूछा-‘भाई, मैं  तुम्हारी क्या सेवा करुँ?’ बहेलिए ने काँपते हुए कहा-‘मुझे इस समय बहुत जाड़ा लग  रहा है। जाड़े को दूर करने का कुछ उपाय करो।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कबूतर कहीं से एक जलती लकड़ी  ले आया। उससे सूखे पत्तों को जलाकर वह बहेलिए से बोला- ‘उस आग से अपना जाड़ा दूर  करो। मैं तो जंगल से मिलने वाली चीजों को खाकर अपनी भूख मिटा लेता हूँ। लेकिन  तुम्हारी भूख मिटाने के लिए क्या करूँ, यह समझ में नहीं आ रहा है। जो शरीर घर पर आए  अतिथि के काम न आ सके, उस शरीर को धारण करने से क्या लाभ!’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कबूतर अपनी बात  करता रहा किंतु उसने कबूतरी को पकड़ने के लिए बहेलिए की निंदा नहीं की। थोड़ी देर  में उसने बहेलिए से कहा-‘अब मैं तुम्हारी भूख मिटाने का उपाय करता हूँ। इतना कहकर  कबूतर थोड़ी देर आग के चारों ओर मँडराता रहा और अचानक आग में कूद पड़ा।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह  देखकर बहेलिया चकित रह गया। वह बोला-‘यह छोटा-सा कबूतर कितना महान है! मुझे अपना  मांस खिलाने के लिए यह स्वयं आग में कूद पड़ा।’ बहेलिए को अपने जीवन पर बड़ी ग्लानि  हुई। वह कबूतर के बलिदान और उसके उदार स्वभाव से बहुत प्रभावित हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आँसू  बहाते हुए बहेलिए ने अपना जाल और डंडा फेंक दिया। उसने पिंजरे में बंद कबूतरी को भी  मुक्त कर दिया। कबूतरी आग में जलकर मर जाने वाले अपने पति के पास बैठकर रोने लगी।  उसका वियोग न सह पाने के कारण वह भी आग में कूद गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार शरण में आए  हुए बहेलिए के लिए कबूतर और कबूतरी दोनों ने अपना बलिदान दे दिया। इसीलिए कहा गया  है कि सभी प्रकार का दुख उठाकर भी अतिथि की सेवा करनी चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;font-size:130%;" &gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;कहानी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;४&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;:&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; पत्नी से मिली सजा&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परम शक्तिशाली और यशस्वी एक प्रतापी राजा था। उसका नाम नंद था। उसके मंत्री का नाम  वररुचि था। वह सभी शास्त्रों का ज्ञाता और विचारक था। वह अपनी पत्नी को बहुत चाहता  था। एक बार किसी बात पर उसकी पत्नी से उसका कुछ झगड़ा हो गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पत्नी उससे  नाराज हो गई और अनशन करके प्राण देने पर तुल गई। वररुचि ने उसे बहुत मनाया और पूछा,  ‘बताओ-मैं तुम्हारी खुशी के लिए क्या करूँ?’ पत्नी ने कहा-‘तुम अपना सिर मुँड़वाओ और  मेरे चरणों में प्रणाम करो।’ वररुचि ने ऐसा ही किया। उसकी पत्नी प्रसन्न हो  गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी प्रकार एक बार राजा नंद की पत्नी भी क्रोध करके कलह मचाने लगी। राजा  भी अपनी पटरानी को बहुत प्यार करता था। इसलिए उसने उससे पूछा-‘तुम्हें प्रसन्न करने  के लिए मैं क्या करुँ?’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पत्नी बोली-‘तुम घोड़े की तरह अपने मुँह में लगाम  लगा लो। फिर मैं तुम पर सवारी करुँगी। तब तुम घोड़े की तरह हिनहिनाना!’ राजा नंद ने  विवश होकर पत्नी को प्रसन्न करने के लिए ऐसा ही किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले दिन राजसभा ने  नंद ने महामंत्री वररुचि को मुंडित केश देखकर पूछा-‘अरे महामंत्री, तुमने किस पर्व  पर यह मुंडन करवा लिया?’ चतुर महामंत्री से कुछ भी छिपा हुआ नहीं था। उसने  कहा-‘महाराज, स्त्री की याचना पर तो लोग घोड़े की तरह हिनहिनाते भी लगते हैं। केश  मुँडाना तो कुछ भी नहीं है।’ राजा लज्जित होकर चुप रह गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;कहानी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;५&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;: &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255); font-weight: bold;"&gt;बोलने वाली मांद&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; (&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;पंचतंत्र&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;) &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी जंगल में एक शेर रहता था। एक बार वह दिन-भर भटकता रहा, किंतु भोजन के लिए कोई  जानवर नहीं मिला। थककर वह एक गुफा के अंदर आकर बैठ गया। उसने सोचा कि रात में कोई न  कोई जानवर इसमें अवश्य आएगा। आज उसे ही मारकर मैं अपनी भूख शांत करुँगा।&lt;br /&gt;उस गुफा  का मालिक एक सियार था। वह रात में लौटकर अपनी गुफा पर आया। उसने गुफा के अंदर जाते  हुए शेर के पैरों के निशान देखे। उसने ध्यान से देखा। उसने अनुमान लगाया कि शेर  अंदर तो गया, परंतु अंदर से बाहर नहीं आया है। वह समझ गया कि उसकी गुफा में कोई शेर  छिपा बैठा है। चतुर सियार ने तुरंत एक उपाय सोचा। वह गुफा के भीतर नहीं  गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसने द्वार से आवाज लगाई- ‘ओ मेरी गुफा, तुम चुप क्यों हो? आज बोलती  क्यों नहीं हो? जब भी मैं बाहर से आता हूँ, तुम मुझे बुलाती हो। आज तुम बोलती क्यों  नहीं हो?’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुफा में बैठे हुए शेर ने सोचा, ऐसा संभव है कि गुफा प्रतिदिन  आवाज देकर सियार को बुलाती हो। आज यह मेरे भय के कारण मौन है। इसलिए आज मैं ही इसे  आवाज देकर अंदर बुलाता हूँ। ऐसा सोचकर शेर ने अंदर से आवाज लगाई और कहा-‘आ जाओ  मित्र, अंदर आ जाओ।’आवाज सुनते ही सियार समझ गया कि अंदर शेर बैठा है। वह तुरंत  वहाँ से भाग गया। और इस तरह सियार ने चालाकी से अपनी जान बचा ली।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;कहानी&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;६&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;:&lt;/span&gt; &lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;धोखेबाज का अंत&lt;/span&gt; (&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;पंचतंत्र&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;)&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी स्थान पर एक बहुत बड़ा तालाब था। वहीं एक बूढ़ा बगुला भी रहता था। बुढ़ापे के  कारण वह कमजोर हो गया था। इस कारण मछलियाँ पकड़ने में असमर्थ था। वह तालाब के  किनारे बैठकर, भूख से व्याकुल होकर आँसू बहाता रहता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बार एक केकड़ा  उसके पास आया। बगुले को उदास देखकर उसने पूछा, ‘मामा, तुम रो क्यों रहे हो? क्या  तुमने आजकल खाना-पीना छोड़ दिया है?..अचानक यह क्या हो गया?’ बगुले ने बताया-  ‘पुत्र, मेरा जन्म इसी तालाब के पास हुआ था। यहीं मैंने इतनी उम्र बिताई। अब मैंने  सुना है कि यहाँ बारह वर्षों तक पानी नहीं बरसेगा।’ केकड़े ने पूछा, ‘तुमसे ऐसा  किसने कहा है?’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बगुले ने कहा- ‘मुझे एक ज्योतिषी ने यह बात बताई है। इस  तालाब में पानी पहले ही कम है। शेष पानी भी जल्दी ही सूख जाएगा। तालाब के सूख जाने  पर इसमें रहने वाले प्राणी भी मर जाएँगे। इसी कारण मैं परेशान हूँ।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बगुले  की यह बात केकड़े ने अपने साथियों को बताई। वे सब बगुले के पास पहुँचे। उन्होंने  बगुले से पूछा-‘मामा, ऐसा कोई उपाय बताओ, जिससे हम सब बच सकें।’ बगुले ने  बताया-‘यहां से कुछ दूर एक बड़ा सरोवर है। यदि तुम लोग वहाँ जाओ तो तुम्हारे  प्राणों की रक्षा हो सकती है।’ सभी ने एक साथ पूछा-‘हम उस सरोवर तक पहुँचेंगे  कैसे?’ चालाक बगुले ने कहा-‘मैं तो अब बूढ़ा हो गया हूँ। तुम लोग चाहो तो मैं  तुम्हें पीठ पर बैठाकर उस तालाब तक ले जा सकता हूँ।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सभी बगुले की पीठ पर  चढ़कर दूसरे तालाब में जाने के लिए तैयार हो गए। दुष्ट बगुला प्रतिदिन एक मछली को  अपनी पीठ पर चढ़ाकर ले जाता और शाम को तालाब पर लौट आता। इस प्रकार उसकी भोजन की  समस्या हल हो गई। एक दिन केकड़े ने कहा-‘मामा, अब मेरी भी तो जान बचाइए।’ बगुले ने  सोचा कि मछलियाँ तो वह रोज खाता है। आज केकड़े का मांस खाएगा। ऐसा सोचकर उसने  केकड़े को अपनी पीठ पर बैठा लिया। उड़ते हुए वह उस बड़े पत्थर पर उतरा, जहाँ वह हर  दिन मछलियों को खाया करता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;केकड़े ने वहाँ पर पड़ी हुई हड्डियों को देखा।  उसने बगुले से पूछा-‘मामा, सरोवर कितनी दूर है? आप तो थक गए होंगे।’ बगुले ने  केकड़े को मूर्ख समझकर उत्तर दिया-‘अरे, कैसा सरोवर! यह तो मैंने अपने भोजन का उपाय  सोचा था। अब तू भी मरने के लिए तैयार हो जा। मैं इस पत्थर पर बैठकर तुझे खा  जाऊँगा।’ इतना सुनते ही केकड़े ने बगुले की गर्दन जकड़ ली और अपने तेज दाँतों से  उसे काट डाला। बगुला वहीं मर गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;केकड़ा किसी तरह धीरे-धीरे अपने तालाब तक  पहुँचा। मछलियों ने जब उसे देखा तो पूछा-‘अरे, केकड़े भाई, तुम वापस कैसे आ गए।  मामा को कहाँ छोड़ आए? हम तो उनके इंतजार में बैठे हैं।’ यह सुनकर केकड़ा हँसने  लगा। उसने बताया-‘वह बगुला महाठग था। उसने हम सभी को धोखा दिया। वह हमारे साथियों  को पास की एक चट्टान पर ले जाकर खा जाता था। मैंने उस धूर्त्त बगुले को मार दिया  है। अब डरने की कोई बात नहीं है। इसीलिए कहा गया है कि जिसके पास बुद्धि है, उसी के  पास बल भी होता है।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;कहानी&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;७&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;:&lt;/span&gt; &lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;चतुराई से कठिन काम भी संभव&lt;/span&gt;  (&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;पंचतंत्र&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;)&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक जंगल में महाचतुरक नामक सियार रहता था। एक दिन जंगल में उसने एक मरा हुआ हाथी  देखा। उसकी बांछे खिल गईं। उसने हाथी के मृत शरीर पर दांत गड़ाया पर चमड़ी मोटी होने  की वजह से, वह हाथी को चीरने में नाकाम रहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह कुछ उपाय सोच ही रहा था कि  उसे सिंह आता हुआ दिखाई दिया। आगे बढ़कर उसने सिंह का स्वागत किया और हाथ जोड़कर कहा,  “स्वामी आपके लिए ही मैंने इस हाथी को मारकर रखा है, आप इस हाथी का मांस खाकर मुझ  पर उपकार कीजिए।” सिंह ने कहा, “मैं तो किसी के हाथों मारे गए जीव को खाता नहीं  हूं, इसे तुम ही खाओ।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सियार मन ही मन खुश तो हुआ पर उसकी हाथी की चमड़ी को  चीरने की समस्या अब भी हल न हुई थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;थोड़ी देर में उस तरफ एक बाघ आ निकला।  बाघ ने मरे हाथी को देखकर अपने होंठ पर जीभ फिराई। सियार ने उसकी मंशा भांपते हुए  कहा, “मामा आप इस मृत्यु के मुंह में कैसे आ गए? सिंह ने इसे मारा है और मुझे इसकी  रखवाली करने को कह गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बार किसी बाघ ने उनके शिकार को जूठा कर दिया  था तब से आज तक वे बाघ जाति से नफरत करने लगे हैं। आज तो हाथी को खाने वाले बाघ को  वह जरुर मार गिराएंगे।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सुनते ही बाघ वहां से भाग खड़ा हुआ। पर तभी एक  चीता आता हुआ दिखाई दिया। सियार ने सोचा चीते के दांत तेज होते हैं। कुछ ऐसा करूं  कि यह हाथी की चमड़ी भी फाड़ दे और मांस भी न खाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसने चीते से कहा, “प्रिय  भांजे, इधर कैसे निकले? कुछ भूखे भी दिखाई पड़ रहे हो।” सिंह ने इसकी रखवाली मुझे  सौंपी है, पर तुम इसमें से कुछ मांस खा सकते हो। मैं जैसे ही सिंह को आता हुआ  देखूंगा, तुम्हें सूचना दे दूंगा, तुम सरपट भाग जाना”।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले तो चीते ने डर  से मांस खाने से मना कर दिया, पर सियार के विश्वास दिलाने पर राजी हो  गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चीते ने पलभर में हाथी की चमड़ी फाड़ दी। जैसे ही उसने मांस खाना शुरू  किया कि दूसरी तरफ देखते हुए सियार ने घबराकर कहा, “भागो सिंह आ रहा है”। इतना  सुनना था कि चीता सरपट भाग खड़ा हुआ। सियार बहुत खुश हुआ। उसने कई दिनों तक उस विशाल  जानवर का मांस खाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिर्फ अपनी सूझ-बूझ से छोटे से सियार ने अपनी समस्या का  हल निकाल लिया। इसीलिए कहते हैं कि बुद्धि के प्रयोग से कठिन से कठिन काम भी संभव  हो जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;कहानी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;८&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;:&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;बल से बड़ी बुद्धि&lt;/span&gt; (पंचतंत्र)&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक गुफा में एक बड़ा ताकतवर शेर रहता था। वह प्रतिदिन जंगल के अनेक जानवरों को मार  डालता था। उस वन के सारे जानवर उसके डर से काँपते रहते थे। एक बार जानवरों ने सभा  की। उन्होंने निश्चय किया कि शेर के पास जाकर उससे निवेदन किया जाए। जानवरों के कुछ  चुने हुए प्रतिनिधि शेर के पास गए। जानवरों ने उसे प्रणाम किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर एक  प्रतिनिधि ने हाथ जोड़कर निवेदन किया, ‘आप इस जंगल के राजा है। आप अपने भोजन के लिए  प्रतिदिन अनेक जानवरों को मार देते हैं, जबकि आपका पेट एक जानवर से ही भर जाता  है।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शेर ने गरजकर पूछा-‘तो मैं क्या कर सकता हूँ?’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सभी जानवरों में  निवेदन किया, ‘महाराज, आप भोजन के लिए कष्ट न करें। आपके भोजन के लिए हम स्वयं हर  दिन एक जानवर को आपकी सेवा में भेज दिया करेंगे। आपका भोजन हरदिन समय पर आपकी सेवा  से पहुँच जाया करेगा।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शेर ने कुछ देर सोचा और कहा-‘यदि तुम लोग ऐसा ही  चाहते हो तो ठीक है। किंतु ध्यान रखना कि इस नियम में किसी प्रकार की ढील नहीं आनी  चाहिए।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद हर दिन एक पशु शेर की सेवा में भेज दिया जाता। एक दिन शेर  के पास जाने की बारी एक खरगोश की आ गई। खरगोश बुद्धिमान था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसने मन-ही मन  सोचा- ‘अब जीवन तो शेष है नहीं। फिर मैं शेर को खुश करने का उपाय क्यों करुँ? ऐसा  सोचकर वह एक कुएँ पर आराम करने लगा। इसी कारण शेर के पास पहुँचने में उसे बहुत देर  हो गई।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खरगोश जब शेर के पास पहुँचा तो वह भूख के कारण परेशान था। खरगोश को  देखते ही शेर जोर से गरजा और कहा, ‘एक तो तू इतना छोटा-सा खरगोश है और फिर इतनी देर  से आया है। बता, तुझे इतनी देर कैसे हुई?’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खरगोश बनावटी डर से काँपते हुए  बोला- ‘महाराज, मेरा कोई दोष नहीं है। हम दो खरगोश आपकी सेवा के लिए आए थे। किंतु  रास्ते में एक शेर ने हमें रोक लिया। उसने मुझे पकड़ लिया।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने उससे कहा-  ‘यदि तुमने मुझे मार दिया तो हमारे राजा तुम पर नाराज होंगे और तुम्हारे प्राण ले  लेंगे।’ उसने पूछा-‘कौन है तुम्हारा राजा?’ इस पर मैंने आपका नाम बता दिया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सुनकर वह शेर क्रोध से भर गया। वह बोला, ‘तुम झूठ बोलते हो।’ इस पर  खरगोश ने कहा, ‘नहीं, मैं सच कहता हूँ तुम मेरे साथी को बंधक रख लो। मैं अपने राजा  को तुम्हारे पास लेकर आता हूँ।’&lt;br /&gt;खरगोश की बात सुनकर दुर्दांत शेर का क्रोध बढ़  गया। उसने गरजकर कहा, ‘चलो, मुझे दिखाओ कि वह दुष्ट कहाँ रहता है?’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खरगोश  शेर को लेकर एक कुँए के पास पहुँचा। खरगोश ने चारों ओर देखा और कहा, महाराज, ऐसा  लगता है कि आपको देखकर वह शेर अपने किले में घुस गया।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शेर ने पूछा, ‘कहां  है उसका किला?’ खरगोश ने कुएँ को दिखाकर कहा, ‘महाराज, यह है उस शेर का किला।’ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खरगोश स्वयं कुएँ की मुँडेर पर खड़ा हो गया। शेर भी मुँडेर पर चढ़ गया।  दोनों की परछाई कुएँ के पानी में दिखाई देने लगी। खरगोश ने शेर से कहा, ‘महाराज,  देखिए। वह रहा मेरा साथी खरगोश। उसके पास आपका शत्रु खड़ा है।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शेर ने दोनों  को देखा। उसने भीषण गर्जन किया। उसकी गूँज कुएँ से बाहर आई। बस, फिर क्या था! देखते  ही देखते शेर ने अपने शत्रु को पकड़ने के लिए कुएँ में छलाँग लगा दी और वहीं डूबकर  मर गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;font-size:130%;" &gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;कहानी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;९&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;:&lt;/span&gt; &lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;लोभ&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; का फल कड़वा&lt;/span&gt; (पंचतंत्र)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी नगर में हरिदत्त नाम का एक ब्राह्मण निवास करता था। उसकी खेती साधारण ही थी,  अतः अधिकांश समय वह खाली ही रहता था। एक बार ग्रीष्म ऋतु में वह इसी प्रकार अपने  खेत पर वृक्ष की शीतल छाया में लेटा हुआ था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोए-सोए उसने अपने समीप ही  सर्प का बिल देखा, उस पर सर्प फन फैलाए बैठा था। उसको देखकर वह ब्राह्मण विचार करने  लगा कि हो-न-हो, यही मेरे क्षेत्र का देवता है। मैंने कभी इसकी पूजा नहीं की। अतः  मैं आज अवश्य इसकी पूजा करूंगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह विचार मन में आते ही वह उठा और कहीं से  जाकर दूध मांग लाया। उसे उसने एक मिट्टी के बरतन में रखा और बिल के समीप जाकर बोला,  “हे क्षेत्रपाल! आज तक मुझे आपके विषय में मालूम नहीं था, इसलिए मैं किसी प्रकार की  पूजा-अर्चना नहीं कर पाया। आप मेरे इस अपराध को क्षमा कर मुझ पर कृपा कीजिए और मुझे  धन-धान्य से समृद्ध कीजिए।” इस प्रकार प्रार्थना करके उसने उस दूध को वहीं पर रख  दिया और फिर अपने घर को लौट गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरे दिन प्रातःकाल जब वह अपने खेत पर  आया तो सर्वप्रथम उसी स्थान पर गया। वहां उसने देखा कि जिस बरतन में उसने दूध रखा  था उसमें एक स्वर्णमुद्रा रखी हुई है। उसने उस मुद्रा को उठाकर रख लिया। उस दिन भी  उसने उसी प्रकार सर्प की पूजा की और उसके लिए दूध रखकर चला गया। अगले दिन प्रातःकाल  उसको फिर एक स्वर्णमुद्रा मिली।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार अब नित्य वह पूजा करता और अगले  दिन उसको एक स्वर्णमुद्रा मिल जाया करती थी। कुछ दिनों बाद उसको किसी कार्य से अन्य  ग्राम में जाना पड़ा। उसने अपने पुत्र को उस स्थान पर दूध रखने का निर्देश दिया।  तदानुसार उस दिन उसका पुत्र गया और वहां दूध रख आया। दूसरे दिन जब वह पुनः दूध रखने  के लिए गया तो देखा कि वहां स्वर्णमुद्रा रखी हुई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसने उस मुद्रा को  उठा लिया और वह मन ही मन सोचने लगा कि निश्चित ही इस बिल के अंदर स्वर्णमुद्राओं का  भण्डार है। मन में यह विचार आते ही उसने निश्चय किया कि बिल को खोदकर सारी मुद्राएं  ले ली जाएं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सर्प का भय था। किन्तु जब दूध पीने के लिए सर्प बाहर निकला तो  उसने उसके सिर पर लाठी का प्रहार किया। इससे सर्प तो मरा नहीं और इस प्रकार से  क्रुद्ध होकर उसने ब्राह्मण-पुत्र को अपने विषभरे दांतों से काटा कि उसकी तत्काल  मृत्यु हो गई। उसके सम्बधियों ने उस लड़के को वहीं उसी खेत पर जला दिया। कहा भी  जाता है लालच का फल कभी मीठा नहीं होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;font-size:130%;" &gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;कहानी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;१०&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;:&lt;/span&gt; &lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;चंचलता से बुद्धि का नाश&lt;/span&gt; (पंचतंत्र)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी तालाब में कम्बुग्रीव नामक एक कछुआ रहता था। तालाब के किनारे रहने वाले संकट  और विकट नामक हंस से उसकी गहरी दोस्ती थी। तालाब के किनारे तीनों हर रोज खूब बातें  करते और शाम होने पर अपने-अपने घरों को चल देते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक वर्ष उस प्रदेश में जरा  भी बारिश नहीं हुई। धीरे-धीरे वह तालाब भी सूखने लगा। अब हंसों को कछुए की चिंता  होने लगी।&lt;br /&gt;जब उन्होंने अपनी चिंता कछुए से कही तो कछुए ने उन्हें चिंता न करने  को कहा। उसने हंसों को एक युक्ति बताई। उसने उनसे कहा कि सबसे पहले किसी पानी से  लबालब तालाब की खोज करें फिर एक लकड़ी के टुकड़े से लटकाकर उसे उस तालाब में ले  चलें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसकी बात सुनकर हंसों ने कहा कि वह तो ठीक है पर उड़ान के दौरान उसे  अपना मुंह बंद रखना होगा। कछुए ने उन्हें भरोसा दिलाया कि वह किसी भी हालत में अपना  मुंह नहीं खोलेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कछुए ने लकड़ी के टुकड़े को अपने दांत से पकड़ा फिर दोनो हंस  उसे लेकर उड़ चले। रास्ते में नगर के लोगों ने जब देखा कि एक कछुआ आकाश में उड़ा जा  रहा है तो वे आश्चर्य से चिल्लाने लगे। लोगों को अपनी तरफ चिल्लाते हुए देखकर कछुए  से रहा नहीं गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह अपना वादा भूल गया। उसने जैसे ही कुछ कहने के लिए अपना  मुंह खोला कि आकाश से गिर पड़ा। ऊंचाई बहुत ज्यादा होने के कारण वह चोट झेल नहीं  पाया और अपना दम तोड़ दिया। इसीलिए कहते हैं कि बुद्धिमान भी अगर अपनी चंचलता पर  काबू नहीं रख पाता है तो परिणाम काफी बुरा होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;कहानी&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;११&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;:&lt;/span&gt; &lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;आवाज ने खोला भेद&lt;/span&gt; (पंचतंत्र&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;किसी नगर में एक धोबी रहता था। अच्छा चारा न मिलने के कारण उसका गधा बहुत कमजोर हो  गया था। एक दिन धोबी को जंगल में बाघ की एक खाल मिल गई। उसने सोचा कि रात में इस  खाल को ओढ़ाकर मैं गधे को खेतों में छोड़ दिया करुँगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गाँववाले इसे बाघ  समझेंगे और डर से इसके पास नहीं आएँगे। खेतों में चरकर यह खूब मोटा-ताजा हो जाएगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक रात गधा बाघ की खाल ओढ़े खेत में चर रहा था। तभी उसने दूर से किसी गधी  का रेंकना सुना। उसकी आवाज सुनकर गधा प्रसन्न हो उठा और मौज में आकर स्वयं भी  रेंकने लगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गधे की आवाज सुनते ही खेतों के रखवालों ने उसे घर लिया और  पीट-पीटकर जान से मार डाला। इसलिए कहते हैं अपनी पहचान नहीं खोनी चाहिए। कभी-कभी यह  खतरनाक भी साबित होता है।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;कहानी&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;१२&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;:&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;गलत मार्ग का अंजाम&lt;/span&gt; (पंचतंत्र)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी ग्राम में किसान दम्पती रहा करते थे। किसान तो वृद्ध था पर उसकी पत्नी युवती  थी। अपने पति से संतुष्ट न रहने के कारण किसान की पत्नी सदा पर-पुरुष की टोह में  रहती थी, इस कारण एक क्षण भी घर में नहीं ठहरती थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन किसी ठग ने उसको  घर से निकलते हुए देख लिया। उसने उसका पीछा किया और जब देखा कि वह एकान्त में पहुँच  गई तो उसके सम्मुख जाकर उसने कहा, “देखो, मेरी पत्नी का देहान्त हो चुका है। मैं  तुम पर अनुरक्त हूं। मेरे साथ चलो।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह बोली, “यदि ऐसी ही बात है तो मेरे  पति के पास बहुत-सा धन है, वृद्धावस्था के कारण वह हिलडुल नहीं सकता। मैं उसको लेकर  आती हूं, जिससे कि हमारा भविष्य सुखमय बीते।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“ठीक है जाओ। कल प्रातःकाल  इसी समय इसी स्थान पर मिल जाना।” इस प्रकार उस दिन वह किसान की स्त्री अपने घर लौट  गई। रात होने पर जब उसका पति सो गया, तो उसने अपने पति का धन समेटा और उसे लेकर  प्रातःकाल उस स्थान पर जा पहुंची। दोनों वहां से चल दिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोनों अपने ग्राम  से बहुत दूर निकल आए थे कि तभी मार्ग में एक गहरी नदी आ गई। उस समय उस ठग के मन में  विचार आया कि इस औरत को अपने साथ ले जाकर मैं क्या करूंगा। और फिर इसको खोजता हुआ  कोई इसके पीछे आ गया तो वैसे भी संकट ही है। अतः किसी प्रकार इससे सारा धन हथियाकर  अपना पिण्ड छुड़ाना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह विचार कर उसने कहा, “नदी बड़ी गहरी है। पहले  मैं गठरी को उस पार रख आता हूं, फिर तुमको अपनी पीठ पर लादकर उस पार ले चलूंगा।  दोनों को एक साथ ले चलना कठिन है।” “ठीक है, ऐसा ही करो।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसान की स्त्री  ने अपनी गठरी उसे पकड़ाई तो ठग बोला, “अपने पहने हुए गहने-कपड़े भी दे दो, जिससे  नदी में चलने में किसी प्रकार की कठिनाई नहीं होगी। और कपड़े भीगेंगे भी नहीं।”  उसने वैसा ही किया। उन्हें लेकर ठग नदी के उस पार गया तो फिर लौटकर आया ही  नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह औरत अपने कुकृत्यों के कारण कहीं की नहीं रही। इसलिए कहते हैं कि  अपने हित के लिए गलत कर्मों का मार्ग नहीं अपनाना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;font-size:130%;" &gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;कहानी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;१३&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;: &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;विवेकहीन स्वामी &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी वन में मदोत्कट नाम का सिंह निवास करता था। बाघ, कौआ और सियार, ये तीन उसके  नौकर थे। एक दिन उन्होंने एक ऐसे उंट को देखा जो अपने गिरोह से भटककर उनकी ओर आ गया  था। उसको देखकर सिंह कहने लगा, “अरे वाह! यह तो विचित्र जीव है। जाकर पता तो लगाओ  कि यह वन्य प्राणी है अथवा कि ग्राम्य प्राणी”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सुनकर कौआ बोला, “स्वामी!  यह ऊंट नाम का जीव ग्राम्य-प्राणी है और आपका भोजन है। आप इसको मारकर खा  जाइए।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिंह बोला, “ मैं अपने यहां आने वाले अतिथि को नहीं मारता। कहा गया  है कि विश्वस्त और निर्भय होकर अपने घर आए शत्रु को भी नहीं मारना चाहिए। अतः उसको  अभयदान देकर यहां मेरे पास ले आओ जिससे मैं उसके यहां आने का कारण पूछ  सकूं।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिंह की आज्ञा पाकर उसके अनुचर ऊंट के पास गए और उसको आदरपूर्वक सिंह  के पास ले लाए। ऊंट ने सिंह को प्रणाम किया और बैठ गया। सिंह ने जब उसके वन में  विचरने का कारण पूछा तो उसने अपना परिचय देते हुए बताया कि वह साथियों से बिछुड़कर  भटक गया है। सिंह के कहने पर उस दिन से वह कथनक नाम का ऊंट उनके साथ ही रहने लगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसके कुछ दिन बाद मदोत्कट सिंह का किसी जंगली हाथी के साथ घमासान युद्ध  हुआ। उस हाथी के मूसल के समान दांतों के प्रहार से सिंह अधमरा तो हो गया किन्तु  किसी प्रकार जीवित रहा, पर वह चलने-फिरने में अशक्त हो गया था। उसके अशक्त हो जाने  से कौवे आदि उसके नौकर भूखे रहने लगे। क्योंकि सिंह जब शिकार करता था तो उसके  नौकरों को उसमें से भोजन मिला करता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब सिंह शिकार करने में असमर्थ था।  उनकी दुर्दशा देखकर सिंह बोला, “किसी ऐसे जीव की खोज करो कि जिसको मैं इस अवस्था  में भी मारकर तुम लोगों के भोजन की व्यवस्था कर सकूं।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिंह की आज्ञा पाकर  वे चारों प्राणी हर तरफ शिकार की तलाश में घूमने निकले। जब कहीं कुछ नहीं मिला तो  कौए और सियार ने परस्पर मिलकर सलाह की। श्रृगाल बोला, “मित्र कौवे! इधर-उधर भटकने  से क्या लाभ? क्यों न इस कथनक को मारकर उसका ही भोजन किया जाए?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सियार सिंह  के पास गया और वहां पहुंचकर कहने लगा, “स्वामी! हम सबने मिलकर सारा वन छान मारा है,  किन्तु कहीं कोई ऐसा पशु नहीं मिला कि जिसको हम आपके समीप मारने के लिए ला पाते। अब  भूख इतनी सता रही है कि हमारे लिए एक भी पग चलना कठिन हो गया है। आप बीमार हैं। यदि  आपकी आज्ञा हो तो आज कथनक के मांस से ही आपके खाने का प्रबंध किया जाए।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर  सिंह ने यह कहते हुए मना कर दिया कि उसने ऊंट को अपने यहां पनाह दी है इसलिए वह उसे  मार नहीं सकता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर सियार ने सिंह को किसी तरह मना ही लिया। राजा की आज्ञा  पाते ही श्रृगाल ने तत्काल अपने साथियों को बुलाया लाया। उसके साथ ऊंट भी आया।  उन्हें देखकर सिंह ने पूछा, “तुम लोगों को कुछ मिला?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कौवा, सियार, बाघ सहित  दूसरे जानवरों ने बता दिया कि उन्हें कुछ नहीं मिला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर अपने राजा की भूख  मिटाने के लिए सभी बारी-बारी से सिंह के आगे आए और विनती की कि वह उन्हें मारकर खा  लें। पर सियार हर किसी में कुछ न कुछ खामी बता देता ताकि सिंह उन्हें न मार सके।  अंत में ऊंट की बारी आई। बेचारे सीधे-साधे कथनक ऊंट ने जब यह देखा कि सभी सेवक अपनी  जान देने की विनती कर रहे हैं तो वह भी पीछे नहीं रहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसने सिंह को प्रणाम  करके कहा, “स्वामी! ये सभी आपके लिए अभक्ष्य हैं। किसी का आकार छोटा है, किसी के  तेज नाखून हैं, किसी की देह पर घने बाल हैं। आज तो आप मेरे ही शरीर से अपनी जीविका  चलाइए जिससे कि मुझे दोनों लोकों की प्राप्ति हो सके।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कथनक का इतना कहना था  कि व्याघ्र और सियार उस पर झपट पड़े और देखते-ही-देखते उसके पेट को चीरकर रख दिया।  बस फिर क्या था, भूख से पीड़ित सिंह और व्याघ्र आदि ने तुरन्त ही उसको चट कर डाला।  कहा भी गया है विवेकहीन स्वामी से दूर ही रहना ही अपने हित में होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;कहानी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;१४&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;: &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255); font-weight: bold;"&gt;वंश की रक्षा&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी पर्वत प्रदेश में मन्दविष नाम का एक वृद्ध सर्प रहा करता था। एक दिन वह विचार  करने लगा कि ऐसा क्या उपाय हो सकता है, जिससे बिना परिश्रम किए ही उसकी आजीविका  चलती रहे। उसके मन में तब एक विचार आया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह समीप के मेढकों से भरे तालाब के  पास चला गया। वहां पहुँचकर वह बड़ी बेचैनी से इधर-उधर घूमने लगा। उसे इस प्रकार  घूमते देखकर तालाब के किनारे एक पत्थर पर बैठे मेढक को आश्चर्य हुआ तो उसने  पूछा,“मामा! आज क्या बात है? शाम हो गई है, किन्तु तुम भोजन-पानी की व्यवस्था नहीं  कर रहे हो?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सर्प बड़े दुःखी मन से कहने लगा, “बेटे! क्या करूं, मुझे तो अब  भोजन की अभिलाषा ही नहीं रह गई है। आज बड़े सवेरे ही मैं भोजन की खोज में निकल पड़ा  था। एक सरोवर के तट पर मैंने एक मेढक को देखा। मैं उसको पकड़ने की सोच ही रहा था कि  उसने मुझे देख लिया। समीप ही कुछ ब्राह्मण स्वाध्याय में लीन थे, वह उनके मध्य जाकर  कहीं छिप गया।” उसको तो मैंने फिर देखा नहीं। किन्तु उसके भ्रम में मैंने एक  ब्राह्मण के पुत्र के अंगूठे को काट लिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उससे उसकी तत्काल मृत्यु हो गई।  उसके पिता को इसका बड़ा दुःख हुआ और उस शोकाकुल पिता ने मुझे शाप देते हुए कहा,  “दुष्ट! तुमने मेरे पुत्र को बिना किसी अपराध के काटा है, अपने इस अपराध के कारण  तुमको मेढकों का वाहन बनना पड़ेगा।” “बस, तुम लोगों के वाहन बनने के उद्देश्य से ही  मैं यहां तुम लोगों के पास आया हूं।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेढक सर्प से यह बात सुनकर अपने  परिजनों के पास गया और उनको भी उसने सर्प की वह बात सुना दी। इस प्रकार एक से दूसरे  और दूसरे से तीसरे कानों में जाती हुई यह बात सब मेढकों तक पहुँच गई। उनके राजा  जलपाद को भी इसका समाचार मिला। उसको यह सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ। सबसे पहले वही सर्प  के पास जाकर उसके फन पर चढ़ गया। उसे चढ़ा हुआ देखकर अन्य सभी मेढक उसकी पीठ पर चढ़  गए। सर्प ने किसी को कुछ नहीं कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मन्दविष ने उन्हें भांति-भांति के करतब  दिखाए। सर्प की कोमल त्वचा के स्पर्श को पाकर जलपाद तो बहुत ही प्रसन्न हुआ। इस  प्रकार एक दिन निकल गया। दूसरे दिन जब वह उनको बैठाकर चला तो उससे चला नहीं गया।  उसको देखकर जलपाद ने पूछा, “क्या बात है, आज आप चल नहीं पा रहे हैं?” “हां, मैं आज  भूखा हूं इसलिए चलने में कठिनाई हो रही है।” जलपाद बोला, “ऐसी क्या बात है। आप  साधारण कोटि के छोटे-मोटे मेढकों को खा लिया कीजिए।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार वह सर्प  नित्यप्रति बिना किसी परिश्रम के अपना भोजन पा गया। किन्तु वह जलपाद यह भी नहीं समझ  पाया कि अपने क्षणिक सुख के लिए वह अपने वंश का नाश करने का भागी बन रहा है। सभी  मेढकों को खाने के बाद सर्प ने एक दिन जलपाद को भी खा लिया। इस तरह मेढकों का समूचा  वंश ही नष्ट हो गया। इसीलिए कहते हैं कि अपने हितैषियों की रक्षा करने से हमारी भी  रक्षा होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;font-size:130%;" &gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;कहानी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;१५&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;: &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;महामुनि और चुहिया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;एक महान तपस्वी एक दिन गंगा में नहाने के लिए गए। स्नान करके वह सूर्य की पूजा करने  लगे। तभी उन्होंने देखा कि एक बाज ने झपट्टा मारा और एक चुहिया को पंजे में जकड़  लिया। तपस्वी को चुहिया पर दया आ गई। उन्होंने बाज को पत्थर मारकर चुहिया को छुड़ा  लिया। चुहिया तपस्वी के चरणों में दुबककर बैठ गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तपस्वी ने सोचा कि चुहिया  को लेकर कहाँ घूमता फिरुँगा, इसको कन्या बनाकर साथ लेकर चलता हूँ। तपस्वी ने अपने  तप के प्रभाव से चुहिया को कन्या का रूप दे दिया। वह उसे साथ लेकर अपने आश्रम पर आ  गए।&lt;br /&gt;तपस्वी की पत्नी ने पूछा-‘उसे कहाँ से ले आए?’तपस्वी ने पूरी बात बता दी।  दोनों पुत्री की तरह कन्या का पालन-पोषण करने लगे। कुछ दिनों बाद कन्या युवती हो  गई। पति-पत्नी को उसके विवाह की चिंता सताने लगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तपस्वी ने पत्नी से  कहा-‘मैं इस कन्या का विवाह भगवान सूर्य से करना चाहता हूँ।’ पत्नी बोली-‘यह तो  बहुत अच्छा विचार है। इसका विवाह सूर्य से कर दीजिए।’ तपस्वी ने सूर्य भगवान का  आवाहन किया। भगवान सूर्य उपस्थित हो गए। तपस्वी ने अपनी पुत्री से कहा- ‘यह सारे  संसार को प्रकाशित करने वाले भगवान सूर्य हैं। क्या तुम इनसे विवाह  करोगी?’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लड़की ने कहा-‘उनका स्वभाव तो बहुत गरम है। जो इनसे उत्तम हो, उसे  बुलाइए।’ लड़की की बात सुनकर सूर्य ने सुझाव दिया-‘मुझसे श्रेष्ठ तो बादल है। वह तो  मुझे भी ढक लेता है।’ तपस्वी ने मंत्र द्वारा बादल को बुलाया और अपनी पुत्री से  पूछा-‘क्या तुम्हें बादल पसंद है?’लड़की ने कहा-‘यह तो काले रंग का है। कोई इससे भी  उत्तम वर हो तो बताइए।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तब तपस्वी ने बादल से ही पूछा-‘तुमसे जो उत्तम हो,  उसका नाम बताओ।’ बादल ने बताया-‘मुझसे उत्तम वायु देवता हैं। वह तो मुझे भी उड़ा ले  जाते हैं।’ तपस्वी ने वायु देवता का आवाहन किया। वायु को देखकर लड़की ने कहा-‘वायु  है तो शक्तिशाली, पर चंचल बहुत है। यदि कोई इससे अच्छा हो तो उसे  बुलाइए।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तपस्वी ने वायु से पूछा- ‘बताओ, तुमसे अच्छा कौन है?’ वायु ने  कहा-‘मुझसे श्रेष्ठ तो पर्वत ही होता है। वह मेरी गति को भी रोक देता है।’तपस्वी ने  पर्वत को बुलाया। पर्वत के आने पर लड़की ने कहा-‘पर्वत तो बहुत कठोर है। किसी दूसरे  वर की खोज कीजिए।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तपस्वी ने पर्वत से पूछा- ‘पर्वतराज, तुम अपने से श्रेष्ठ  किसे मानते हो?’ पर्वत ने कहा-‘चूहे मुझसे भी श्रेष्ट होते हैं। वे मेरे शरीर में  भी छेद कर देते हैं।’ तपस्वी ने चूहों के राजा को बुलाया और पुत्री से प्रश्न  किया-‘क्या तुम इसे पसंद करती हो?’ लड़की चूहे को देखकर बड़ी प्रसन्न हुई और उससे  विवाह करने को तैयार हो गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह बोली-‘पिताजी, आप मुझे फिर से चुहिया बना  दीजिए। मैं इनसे विवाह करके आनंदपूर्वक रह सकूँगी।’ तपस्वी ने उसे फिर से चुहिया  बना दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;कहानी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;१६&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;: &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255); font-weight: bold;"&gt;जैसे को तैसा &lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;(&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;पंचतंत्र&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;)&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;किसी नगर में एक व्यापारी का पुत्र रहता था। दुर्भाग्य से उसकी सारी संपत्ति समाप्त  हो गई। इसलिए उसने सोचा कि किसी दूसरे देश में जाकर व्यापार किया जाए। उसके पास एक  भारी और मूल्यवान तराजू था। उसका वजन बीस किलो था। उसने अपने तराजू को एक सेठ के  पास धरोहर रख दिया और व्यापार करने दूसरे देश चला गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई देशों में घूमकर  उसने व्यापार किया और खूब धन कमाकर वह घर वापस लौटा। एक दिन उसने सेठ से अपना तराजू  माँगा। सेठ बेईमानी पर उतर गया। वह बोला, ‘भाई तुम्हारे तराजू को तो चूहे खा गए।’  व्यापारी पुत्र ने मन-ही-मन कुछ सोचा और सेठ से बोला-‘सेठ जी, जब चूहे तराजू को खा  गए तो आप कर भी क्या कर सकते हैं! मैं नदी में स्नान करने जा रहा हूँ। यदि आप अपने  पुत्र को मेरे साथ नदी तक भेज दें तो बड़ी कृपा होगी।’ सेठ मन-ही-मन भयभीत था कि  व्यापारी का पुत्र उस पर चोरी का आरोप न लगा दे। उसने आसानी से बात बनते न देखी तो  अपने पुत्र को उसके साथ भेज दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्नान करने के बाद व्यापारी के पुत्र ने  लड़के को एक गुफ़ा में छिपा दिया। उसने गुफा का द्वार चट्टान से बंद कर दिया और  अकेला ही सेठ के पास लौट आया। सेठ ने पूछा, ‘मेरा बेटा कहाँ रह गया?’ इस पर  व्यापारी के पुत्र ने उत्तर दिया,‘जब हम नदी किनारे बैठे थे तो एक बड़ा सा बाज आया  और झपट्टा मारकर आपके पुत्र को उठाकर ले गया।’ सेठ क्रोध से भर गया। उसने शोर मचाते  हुए कहा-‘तुम झूठे और मक्कार हो। कोई बाज इतने बड़े लड़के को उठाकर कैसे ले जा सकता  है?तुम मेरे पुत्र को वापस ले आओ नहीं तो मैं राजा से तुम्हारी शिकायत करुँगा’ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;व्यापारी पुत्र ने कहा, ‘आप ठीक कहते हैं।’ दोनों न्याय पाने के लिए  राजदरबार में पहुँचे। सेठ ने व्यापारी के पुत्र पर अपने पुत्र के अपहरण का आरोप  लगाया। न्यायाधीश ने कहा, ‘तुम सेठ के बेटे को वापस कर दो।’ इस पर व्यापारी के  पुत्र ने कहा कि ‘मैं नदी के तट पर बैठा हुआ था कि एक बड़ा-सा बाज झपटा और सेठ के  लड़के को पंजों में दबाकर उड़ गया। मैं उसे कहाँ से वापस कर दूँ?’ न्यायाधीश ने  कहा, ‘तुम झूठ बोलते हो। एक बाज पक्षी इतने बड़े लड़के को कैसे उठाकर ले जा सकता  है?’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस पर व्यापारी के पुत्र ने कहा, ‘यदि बीस किलो भार की मेरी लोहे की  तराजू को साधारण चूहे खाकर पचा सकते हैं तो बाज पक्षी भी सेठ के लड़के को उठाकर ले  जा सकता है।’ न्यायाधीश ने सेठ से पूछा, ‘यह सब क्या मामला है?’ अंततः सेठ ने स्वयं  सारी बात राजदरबार में उगल दी। न्यायाधीश ने व्यापारी के पुत्र को उसका तराजू दिलवा  दिया और सेठ का पुत्र उसे वापस मिल गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;कहानी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;१७&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;: &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255); font-weight: bold;"&gt;बकरा और ब्राह्मण&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;किसी गांव में सम्भुदयाल नामक एक ब्राह्मण रहता था। एक बार वह अपने यजमान से एक  बकरा लेकर अपने घर जा रहा था। रास्ता लंबा और सुनसान था। आगे जाने पर रास्ते में  उसे तीन ठग मिले। ब्राह्मण के कंधे पर बकरे को देखकर तीनों ने उसे हथियाने की योजना  बनाई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक ने ब्राह्मण को रोककर कहा, “पंडित जी यह आप अपने कंधे पर क्या उठा  कर ले जा रहे हैं। यह क्या अनर्थ कर रहे हैं? ब्राह्मण होकर कुत्ते को कंधों पर  बैठा कर ले जा रहे हैं।”ब्राह्मण ने उसे झिड़कते हुए कहा, “अंधा हो गया है क्या?  दिखाई नहीं देता यह बकरा है।”&lt;br /&gt;पहले ठग ने फिर कहा, “खैर मेरा काम आपको बताना  था। अगर आपको कुत्ता ही अपने कंधों पर ले जाना है तो मुझे क्या? आप जानें और आपका  काम।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;थोड़ी दूर चलने के बाद ब्राह्मण को दूसरा ठग मिला। उसने ब्राह्मण को  रोका और कहा, “पंडित जी क्या आपको पता नहीं कि उच्चकुल के लोगों को अपने कंधों पर  कुत्ता नहीं लादना चाहिए।” पंडित उसे भी झिड़क कर आगे बढ़ गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आगे जाने पर  उसे तीसरा ठग मिला। उसने भी ब्राह्मण से उसके कंधे पर कुत्ता ले जाने का कारण पूछा।  इस बार ब्राह्मण को विश्वास हो गया कि उसने बकरा नहीं बल्कि कुत्ते को अपने कंधे पर  बैठा रखा है। थोड़ी दूर जाकर, उसने बकरे को कंधे से उतार दिया और आगे बढ़ गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इधर तीनों ठग ने उस बकरे को मार कर खूब दावत उड़ाई। इसीलिए कहते हैं कि किसी  झूठ को बार-बार बोलने से वह सच की तरह लगने लगता है। अतः अपने दिमाग से काम लें और  अपने आप पर विश्वास करें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;font-size:130%;" &gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;कहानी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;१८&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;: &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;विद्या बड़ी या बुद्धि?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;किसी ब्राह्मण के चार पुत्र थे। उनमें परस्पर गहरी मित्रता थी। चारों में से तीन  शास्त्रों में पारंगत थे, लेकिन उनमें बुद्धि का अभाव था। चौथे ने शास्त्रों का  अध्ययन तो नहीं किया था, लेकिन वह था बड़ा बुद्धिमान।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बार चारों भाइयों  ने परदेश जाकर अपनी-अपनी विद्या के प्रभाव से धन अर्जित करने का विचार किया। चारों  पूर्व के देश की ओर चल पड़े।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रास्ते में सबसे बड़े भाई ने कहा-‘हमारा चौथा  भाई तो निरा अनपढ़ है। राजा सदा विद्वान व्यक्ति का ही सत्कार करते हैं। केवल  बुद्धि से तो कुछ मिलता नहीं। विद्या के बल पर हम जो धन कमाएँगे, उसमें से इसे कुछ  नहीं देंगे। अच्छा तो यही है कि यह घर वापस चला जाए।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरे भाई का विचार  भी यही था। किंतु तीसरे भाई ने उनका विरोध किया। वह बोला-‘हम बचपन से एक साथ रहे  हैं, इसलिए इसको अकेले छोड़ना उचित नहीं है। हम अपनी कमाई का थोड़ा-थोड़ा हिस्सा  इसे भी दे दिया करेंगे।’ अतः चौथा भाई भी उनके साथ लगा रहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रास्ते में एक  घना जंगल पड़ा। वहाँ एक जगह हड्डियों का पंजर था। उसे देखकर उन्होंने अपनी-अपनी  विद्या की परीक्षा लेने का निश्चय किया। उनमें से एक ने हड्डियों को सही ढंग से एक  स्थान पर एकत्रित कर दिया। वास्तव में ये हड्डियाँ एक मरे हुए शेर की  थीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरे ने बड़े कौशल से हड्डियों के पंजर पर मांस एवं खाल का अवरण चढ़ा  दिया। उनमें उसमें रक्त का संचार भी कर दिया। तीसरा उसमें प्राण डालकर उसे जीवित  करने ही वाला था कि चौथे भाई ने उसको रोकते हुए कहा, ‘तुमने अपनी विद्या से यदि इसे  जीवित कर दिया तो यह हम सभी को जान से मार देगा।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तीसरे भाई ने कहा, ‘तू तो  मूर्ख है!’मैं अपनी विद्या का प्रयोग अवश्य करुँगा और उसका फल भी देखूँगा।’ चौथे  भाई ने कहा, ‘तो फिर थोड़ी देर रुको। मैं इस पेड़ पर चढ़ जाऊँ, तब तुम अपनी विद्या  का चमत्कार दिखाना।’ यह कहकर चौथा भाई पेड़ पर चढ़ गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तीसरे भाई ने अपनी  विद्या के बल पर जैसे ही शेर में प्राणों का संचार किया, शेर तड़पकर उठा और उन पर  टूट पड़ा। उसने पलक झपकते ही तीनों अभिमानी विद्वानों को मार डाला और गरजता हुआ चला  गया। उसके दूर चले जाने पर चौथा भाई पेड़ से उतरकर रोता हुआ घर लौट आया। इसीलिए कहा  गया है कि विद्या से बुद्धि श्रेष्ठ होती है।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;कहानी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;१९&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;: &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255); font-weight: bold;"&gt;राजकुमारी और सांपो की कहानी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;राजा देवशक्ति का एक ही पुत्र था। उसके पेट में एक सर्प रहता था। इस कारण राजपुत्र  एकदम दुर्बल हो गया था। अनेक वैद्यों ने उसकी चिकित्सा की, फिर भी वह स्वस्थ नहीं  हुआ। निराश होकर राजपुत्र एक दिन घर छोड़कर चुपके से निकल पड़ा। वह भटकता हुआ किसी  दूसरे राज्य में आ पहुँचा। वह भिक्षा माँगकर पेट भर लेता और एक मंदिर में सो  जाता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस राज्य के राजा का नाम बलि था। उसकी दो पुत्रियाँ थीं। दोनों युवती  थीं। वे प्रतिदिन सुबह-सुबह अपने पिता को प्रणाम करतीं। प्रणाम करने के बाद उनमें  से एक कहती, ‘महाराज की जय हो, जिससे हम सब सुखी रहें।’ दूसरी कहती, ‘महाराज, आपको  आपके कर्मों का फल अवश्य मिले।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजा बलि दूसरी बेटी के कड़वी बातों को  सुनकर क्रोध से भर जाता था। एक दिन उसने मंत्रियों को आदेश दिया, ‘कड़वे वचन  बोलनेवाली मेरी इस पुत्री का किसी परदेसी से ब्याह कर दो, जिससे यह अपने कर्म का फल  भुगते।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मंत्रियों ने मंदिर में रहने वाले उसी भिखारी राजकुमार के साथ उस  राजकुमारी का विवाह कर दिया। राजकुमारी अपने उस पति को प्राप्त करके तनिक भी दुखी  नहीं हुई। वह प्रसन्नता के साथ पति की सेवा करने लगी। कुछ दिन बाद वह पति को साथ  लेकर दूसरे राज्य में चली गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वहाँ उसने एक सरोवर के किनारे पर बसेरा बना  लिया। एक दिन राजकुमारी अपने पति को घर की रखवाली के लिए छोड़कर भोजन का सामान लाने  के लिए स्वयं नगर में चली गई। राजकुमार जमीन पर सिर टिकाकर सो गया। वह सो रहा था कि  उसके पेट में रहने वाला सर्प उसके मुख से बाहर निकलकर हवा खाने लगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी  बीच पास ही की बाँबी में रहनेवाला साँप भी बिल से बाहर निकल आया। उसने पेट में रहने  वाले साँप को फटकारते हुए कहा, ‘तू बहुत दुष्ट है, जो इस सुंदर राजकुमार को इतने  दिनों से पीड़ित कर रहा है।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पेट में रहने वाले साँप ने कहा, ‘और तू कौन-सा  बहुत भला है! अपनी तो देख, तूने अपनी बाँबी में सोने से भरे दो-दो कलश छिपा रखे  हैं।’ बाँबीवाले सर्प ने कहा, ‘क्या कोई इस उपाय को नहीं जानता कि राजकुमारी को  पुरानी राई की काँजी पिलाई जाए तो तू तुरंत मर जाएगा?’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पेट में रहनेवाले  साँप ने भी उसका भेद खोल दिया, ‘तुम्हारी बाँबी में खौलता तेल या पानी डालकर  तुम्हारा वध किया जा सकता है!’ राजकुमारी लौट आई थी। वह वहीं छिपकर दोनों साँपों की  बातें सुन रही थी। उसने बताए हुए दोनों उपायों से उन दोनों साँपों का नाश कर दिया।  पेटवाले साँप के मरते ही राजकुमार स्वस्थ हो गया। फिर बाँबी में गड़े धन को निकालकर  वह अपने राज्य में चली आई और अपने स्वस्थ-सुंदर पति के साथ सुख से रहने लगी। सच ही  कहा गया है कि एक-दूसरे की बातों को छिपाकर ही रखना चाहिए, नहीं तो दोनों का नाश हो  जाता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3486815723019470360-8147593020200481669?l=anuragshandilyahindi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anuragshandilyahindi.blogspot.com/feeds/8147593020200481669/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3486815723019470360&amp;postID=8147593020200481669&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3486815723019470360/posts/default/8147593020200481669'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3486815723019470360/posts/default/8147593020200481669'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anuragshandilyahindi.blogspot.com/2008/12/blog-post_17.html' title='शिक्षाप्रद कहानियाँ'/><author><name>ANURAG SHANDILYA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09780770213161059080</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3486815723019470360.post-7197680166708108539</id><published>2008-12-15T20:11:00.000+05:30</published><updated>2008-12-15T20:40:28.182+05:30</updated><title type='text'>३ जी, कब और कैसे</title><content type='html'>&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;३&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;जी&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;- &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;कब&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;और&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;कैसे&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;img src="http://hindi.economictimes.indiatimes.com/photo.cms?photoid=3823829" align="left" border="0" vspace="4" hspace="5" /&gt;&lt;div style="padding-top: 5px; padding-bottom: 5px;"&gt;&lt;span&gt;अब देश में मोबाइल यूजर्स की दुनिया बदल जाएगी। 11 दिसंबर को प्रधानमंत्री ने 3G मोबाईल सेवाएं लॉन्च कर दीं। उसके बाद देश की बडी मोबाईल सर्विस प्रोवाइडर भारती एयरटेल ने कहा है कि अगले 6 महीनों में एयरटेल के उपभोक्ताओं को भी 3G सेवाओं का लाभ मिल सकेगा। एयरटेल का कहना है कि स्पेक्ट्रम की नीलामी के कुछ ही हफ्तों बाद कंपनी को स्पेक्ट्रम एलोकेट कर दिया जाएगा। एयरटेल पर इस सेवा के आने से देशभर में 3G सेवा तेज़ी से फैलेगी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;imgname style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;अब लीजिए मोबाइल पर ब्रॉडबैंड&lt;/imgname&gt;   &lt;img src="http://hindi.economictimes.indiatimes.com/photo.cms?photoid=3306041" align="left" border="0" vspace="4" hspace="5" /&gt;&lt;div style="padding-top: 5px; padding-bottom: 5px;"&gt;3G की शुरुआत दिल्ली और मुंबई में MTNL कर रही है। इस सर्विस का नाम है 3G जादू।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span&gt;&lt;br /&gt;अब तक हम मोबाइल फोन का ज्यादातर इस्तेमाल बातचीत, मैसेजिंग, ईमेल और स्लो स्पीड ब्राउजिंग के लिए ही कर पा रहे हैं। पर जल्द ही जिंदगी की तेज रफ्तार में मोबाइल फोन आपके लिए जानकारी और मनोरंजन का अंबार लाएगा। यह सब हो पाएगा थर्ड जेनरेशन (3जी) की मोबाइल सर्विस की शुरुआत से। इसके बाद टेलिकॉम ऑपरेटर मोबाइल फोन पर कई वैल्यू ऐडेड सर्विसेज जैसे वीडियो फोन, ऑनलाइन वीडियो स्ट्रीमिंग और ऑनलाइन गेम्स शुरू कर पाएंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;imgname style="color: rgb(51, 51, 255); font-weight: bold;"&gt;3 जी आने के बाद बदलेगी आपके मोबाइल की दुनिया&lt;/imgname&gt;   &lt;img src="http://hindi.economictimes.indiatimes.com/photo.cms?photoid=3306016" align="left" border="0" vspace="4" hspace="5" /&gt;&lt;span style="text-decoration: underline;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अब हम अपने मोबाइल फोन से इंटरनेट बेस्ड सर्विसेज का इस्तेमाल उतनी ही तेजी से कर पाएंगे, जितनी तेजी से कंप्यूटर के जरिये। सीधे शब्दों में - इंटरनेट पर ब्रॉडबैंड की दुनिया। मोबाइल फोन से डेटा ट्रांसफर काफी फास्ट हो जाएगा और मल्टिमीडिया सर्विसेज का दायरा बढ़ेगा। मोबाइल से ग्राफिक, फिल्म क्लिप, विडियो क्लिप आदि आसानी से और जल्दी भेजे जा सकेंगे। इनकी पिक्चर क्वॉलिटी भी बेहतर होगी। वॉइस सर्विसेज की क्वॉलिटी भी इंप्रूव करेगी। मोबाइल टीवी यानी मोबाइल पर टेलिविजन देखना मुमकिन हो पाएगा। अब हम मोबाइल फोन के जरिये विडियो कॉल्स और विडियो कॉन्फ्रेंसिग कर पाएंगे। यानी मोबाइल फोन पर वैल्यू ऐडेड सर्विसेज का अंबार।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;imgname style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;अभी क्या हैं हालात&lt;/imgname&gt;   &lt;img src="http://hindi.economictimes.indiatimes.com/photo.cms?photoid=3305993" align="left" border="0" vspace="4" hspace="5" /&gt;&lt;br /&gt; &lt;span&gt;आज की तारीख में हम चाहकर भी मोबाइल पर इन वैल्यू ऐडेड सर्विसेज का इस्तेमाल नहीं कर सकते। इसकी वजह यह है कि मोबाइल कंपनियों के पास 3जी सर्विसेज शुरू करने का लाइसेंस नहीं है। एमटीएनएल और बीएसएनएल के बाद सरकार निजी कंपनियों के लिए स्पेक्ट्रम की नीलामी करने वाली है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;imgname style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;3जी सर्विस आने के बाद&lt;/imgname&gt;   &lt;img src="http://hindi.economictimes.indiatimes.com/photo.cms?photoid=3305978" align="left" border="0" vspace="4" hspace="5" /&gt;&lt;br /&gt; &lt;span&gt;इससे कंपनियों को अडिशनल स्पेक्ट्रम (रेडियो फ्रीक्वेंसी) अलॉट किए जाएंगे। इससे कंपनियों को आज के मुकाबले ज्यादा वैंडविड्थ हासिल हो पाएगी। हम यूं कह सकते हैं कि मोबाइल कंपनियों को एयर वेव्स के जरिये अपनी सर्विसेज मुहैया कराने के लिए अभी के मुकाबले काफी ज्यादा चौड़ी सड़क मिलेगी। यही वजह है कि टेलिकॉम कंपनियां नई वैल्यू ऐडेड सर्विसेज भी शुरू कर पाएंगी। उनकी सर्विसेज की स्पीड भी काफी बढ़ेगी और हाई स्पीड डेटा ट्रांसफर संभव हो पाएगा।'&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;imgname style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;मोबाइल कंपनियों की तैयारी&lt;/imgname&gt;   &lt;img src="http://hindi.economictimes.indiatimes.com/photo.cms?photoid=3305962" align="left" border="0" vspace="4" hspace="5" /&gt;&lt;div style="padding-top: 5px; padding-bottom: 5px;"&gt;&lt;img src="http://hindi.economictimes.indiatimes.com/images/spacer.gif" border="0" width="5" height="8" /&gt;&lt;/div&gt;  &lt;span&gt;टेलिकॉम सेक्टर के जानकारों के मुताबिक टेलिकॉम कंपनियां 3जी सर्विसेज के लिए जरूरी तैयारियों में जुटी हुई है. ताकि जैसे ही लाइसेंस मिले, वे 3जी की वैल्यू ऐडेड सर्विसेज की शुरुआत कर दें। इधर, मोबाइल हैंडसेट बनाने वाली कंपनियां भी लगातार ऐसे हैंडसेट्स पेश करने में जुटी हैं, जो 3जी कम्पैटिबल (जिन हैंडसेट्स पर 3जी सर्विसेज का इस्तेमाल किया जा सकता है) हों। उप्पल कहते हैं - 'देश में उपलब्ध हैंडसेट्स में करीब एक चौथाई 3जी कंपैटिबल हैं।'&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;imgname style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;आपकी तैयारी&lt;/imgname&gt;   &lt;img src="http://hindi.economictimes.indiatimes.com/photo.cms?photoid=3305933" align="left" border="0" vspace="4" hspace="5" /&gt;&lt;div style="padding-top: 5px; padding-bottom: 5px;"&gt;&lt;img src="http://hindi.economictimes.indiatimes.com/images/spacer.gif" border="0" width="5" height="8" /&gt;&lt;/div&gt;  &lt;span&gt;यदि हमारा हैंडसेट 3जी कंपैटिबल नहीं है, तो हम 3जी सर्विसेज का इस्तेमाल नहीं कर सकते। लिहाजा यदि हम कोई नया हैंडसेट खरीदने जा रहे हैं, तो यह जरूर देख लें कि वह 3जी कंपैटिबल है या नहीं। आजकल 7-8 हजार के रेंज में 3जी कंपैटिबल हैंडसेट्स मिलने शुरू हो जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-size:130%;" &gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;३&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;जी&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;पर&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;अधिक&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;जानकारी&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;के&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;लिए&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;मेरे&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;अंग्रेजी&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;ब्लॉग&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;का&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;सितम्बर&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;२००८&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;भाग&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;देखें&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;इसका&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;लिंक&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;:&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;http://anuragshandilya.blogspot.com/2008/09/3g-what-how-and-when-in-india.html&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3486815723019470360-7197680166708108539?l=anuragshandilyahindi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anuragshandilyahindi.blogspot.com/feeds/7197680166708108539/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3486815723019470360&amp;postID=7197680166708108539&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3486815723019470360/posts/default/7197680166708108539'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3486815723019470360/posts/default/7197680166708108539'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anuragshandilyahindi.blogspot.com/2008/12/blog-post_15.html' title='३ जी, कब और कैसे'/><author><name>ANURAG SHANDILYA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09780770213161059080</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3486815723019470360.post-7716918259447333725</id><published>2008-12-04T20:12:00.000+05:30</published><updated>2008-12-04T22:58:04.361+05:30</updated><title type='text'>खतरे की घंटी हैं सैटेलाइट फोन्स</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;imgname&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; खतरे की घंटी बजा रहे हैं सैटेलाइट फोन्स&lt;/span&gt; &lt;/span&gt; &lt;/imgname&gt;&lt;/span&gt;   &lt;img src="http://hindi.economictimes.indiatimes.com/photo.cms?photoid=3781222" align="left" border="0" vspace="4" hspace="5" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="padding-left: 5px;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt; &lt;/div&gt;&lt;p style="text-align: justify;" class="normtxt"&gt;&lt;span&gt;&lt;b&gt;  &lt;span&gt;आतंकवादी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमलों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अंजाम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तौर&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;तरीकों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साबित&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आतंकी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमलों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तकनीक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जमकर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फायदा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उठा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमलों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शामिल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आतंकवादी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सैटेलाइट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फोन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जरिये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आकाओं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साथ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बेरोक&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;टोक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साजिश&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थे।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर नए आतंकवादी हमले में आतंकवादियों के ज्यादा से ज्यादा टेक फ्रेंडली होने के सुबूत मिल रहे हैं। आतंकवादियों के पास हथियार और गोला-बारूद के अलावा गूगल मैप, जीपीएस लोकेटर और सैटेलाइट फोन भी हैं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सैटेलाइट फोन को आम मोबाइल फोन की तरह न तो जाम किया जा सकता है और न ही इसकी टैपिंग आसानी से मुमकिन है। यह आसानी से इंटरसेप्ट  नहीं किया जा सकता है।&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="text-align: justify;" class="normtxt"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="text-align: justify;" class="normtxt"&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);font-size:130%;" &gt;&lt;imgname&gt;क्या बला है सैटेलाइट फोन?  &lt;/imgname&gt;&lt;/span&gt;   &lt;img src="http://hindi.economictimes.indiatimes.com/photo.cms?photoid=3781220" align="left" border="0" vspace="4" hspace="5" /&gt;&lt;/p&gt;&lt;div style="padding-top: 5px; padding-bottom: 5px; text-align: justify;"&gt;&lt;img src="http://hindi.economictimes.indiatimes.com/images/spacer.gif" border="0" width="5" height="8" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div style="padding-left: 5px;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt; &lt;/div&gt;&lt;p style="text-align: justify;" class="normtxt"&gt;&lt;span&gt;&lt;b&gt;सैटेलाइट फोन का कनेक्शन सीधा सैटेलाइट से होता है, न कि सेल्युलर नेटवर्क से। आसान शब्दों में कहें तो यह फोन सेल्युलर या लैंडलाइन टावर्स के बजाय सीधे सैटेलाइट के जरिये कॉल रिसीव करता और भेजता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सैटेलाइट फोन की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसके जरिये दुनिया के किसी भी कोने से कॉल की या रिसीव की जा सकती है, बशर्ते सैटेलाइ ऑपरेटर वह नेटवर्क मुहैया कराते हों। हालांकि, प्रमुख सैटेलाइट फोन नेटवर्क ऑपरेटर समुद्र और रेगिस्तान समेत पूरी धरती पर नेववर्क सर्विस मुहैया कराते हैं।&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="text-align: justify;" class="normtxt"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="text-align: justify;" class="normtxt"&gt;&lt;imgname&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);font-size:130%;" &gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;कौन हैं सैटेलाइट फोन प्रवाइडर्स&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/imgname&gt;&lt;img src="http://hindi.economictimes.indiatimes.com/photo.cms?photoid=3781211" align="left" border="0" vspace="4" hspace="5" /&gt;&lt;/p&gt;&lt;div style="padding-top: 5px; padding-bottom: 5px; text-align: justify;"&gt;&lt;img src="http://hindi.economictimes.indiatimes.com/images/spacer.gif" border="0" width="5" height="8" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div style="padding-left: 5px;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt; &lt;/div&gt;&lt;p style="text-align: justify;" class="normtxt"&gt;&lt;span&gt;&lt;b&gt;सैटेलाइट नेटवर्क ऑपरेटर कंपनियों में इरिडियम, ग्लोबलस्टार, इनमरसैट और मिड्लइस्ट की कंपनी थुरैया शामिल हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इरिडियम का नेटवर्क समुद्री इलाकों समेत पूरी दुनिया में काम करता है, जबकि ग्लोबलस्टार 100 से ज्यादा देशों में सर्विस मुहैया कराती है। इसके अलावा समुद्री इलाकों में भी ग्लोबलस्टार की सर्विस उपलब्ध है। ग्लोबलस्टार का नेटवर्क उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव समेत धरती के 80 परसेंट हिस्से पर उपलब्ध है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;थुरैया सस्ती सैटेलाइट बेस्ड टेलिफोन सर्विस मुहैया कराती है और इसका नेवटर्क ग्लोब के एक तिहाई हिस्से को कवर करता है। इन इलाकों में भारत समेत एशिया, अफ्रीका, पूरा मिड्ल ईस्ट औऱ यूरोप शामिल है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इनमरसैट मोबाइल फोन और डेटा कम्यूनिकेशंस की सुविधा दुनिया के हर हिस्से में पहुंचाती है। इसके सैटलाइट लंदन स्थित कंपनी के हेडक्वॉर्टर से नियंत्रित होते हैं। साथ ही सैटेलाइट फोन के जरिये इंटरनेट की सुविधा मुहैया कराने के लिए कुछ सैटेलाइट नेटवर्क्स ने सेल्युलर जीएसएम नेटवर्क्स से समझौता किया है।&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="text-align: justify;" class="normtxt"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="text-align: justify;" class="normtxt"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;imgname style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;भारत क्यों नहीं निगरानी रख पाता है सैटेलाइट फोनों पर?&lt;/span&gt; &lt;/imgname&gt;&lt;/span&gt;   &lt;img src="http://hindi.economictimes.indiatimes.com/photo.cms?photoid=3781207" align="left" border="0" vspace="4" hspace="5" /&gt;&lt;/p&gt;&lt;div style="padding-top: 5px; padding-bottom: 5px; text-align: justify;"&gt;&lt;img src="http://hindi.economictimes.indiatimes.com/images/spacer.gif" border="0" width="5" height="8" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div style="padding-left: 5px;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt; &lt;/div&gt;&lt;p style="text-align: justify;" class="normtxt"&gt;&lt;span&gt;&lt;b&gt;मोबाइल फोन की तरह सैटेलाइट फोन के डेटा को भारत में ट्रैक करना मुमकिन नहीं है। इसकी प्रमुख वजह यह है कि भारत में किसी भी सैटेलाइट फोन नेटवर्क ऑपरेटर का सेंटर नहीं है। चूंकि ये फोन सैटेलाइट से संचालित होते हैं और ऑपरेटर को कनवेक्विटी के लिए भारत के किसी घरेलू नेटवर्क की जरूरत नहीं होती, इसके जरिये होने वाली बातचीत के बारे में पता नहीं किया जा सकता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह समस्या इसलिए है कि भारत सैटेलाइट फोन के लिए कर्मशियल लाइसेंस नहीं मुहैया कराता है। हालांकि इनमरसैट के सैटेलाइट फोन टाटा कम्यूनिकेशंस के जरिये उपलब्ध हैं, लेकिन यह सिर्फ सिक्योरिटी और सरकारी एजेंसियों को बेचा जाता है।&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="text-align: justify;" class="normtxt"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="text-align: justify;" class="normtxt"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);font-size:130%;" &gt;&lt;imgname style="font-weight: bold;"&gt;कैसे निपटा जा सकता है इस समस्या से? &lt;/imgname&gt;&lt;/span&gt;   &lt;img src="http://hindi.economictimes.indiatimes.com/photo.cms?photoid=3781196" align="left" border="0" vspace="4" hspace="5" /&gt;&lt;/p&gt;&lt;div style="padding-top: 5px; padding-bottom: 5px; text-align: justify;"&gt;&lt;img src="http://hindi.economictimes.indiatimes.com/images/spacer.gif" border="0" width="5" height="8" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div style="padding-left: 5px;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span&gt;&lt;b&gt;सैटेलाइट फोन के जरिये होने वाली बातचीत पर निगरानी रखने के लिए सरकार कुछ मेकेनिज्म बना सकती है। मुंबई हमले की गुत्थी सुलझाने में सैटेलाइट फोन के सुबूत को काफी अहम माना जा रहा है। इसे देखते हुए कहा जा सकता है कि सैटेलाइट फोन के जरिए होने वाली बातचीत पर निगरानी रखने के लिए सरकार को कदम उठाने की जरूरत है।&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;b&gt;सैटेलाइन फोन का गलत इस्तेमाल रोकने के लिए इस फोन के लिए लाइसेंस देने वाले देश या संबंधित फोन ऑपरेटर की सहायता ली जा सकती है। इसके अलावा देश का निगरानी तंत्र सैटेलाइट कम्यूनिकेशंस पर नजर रखने के लिए दूसरे देशों द्वारा अपनाए गए तौर-तरीकों के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकता है।&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;p class="normtxt"&gt;&lt;span&gt; &lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;/div&gt; &lt;/div&gt; &lt;/div&gt; &lt;/div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3486815723019470360-7716918259447333725?l=anuragshandilyahindi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anuragshandilyahindi.blogspot.com/feeds/7716918259447333725/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3486815723019470360&amp;postID=7716918259447333725&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3486815723019470360/posts/default/7716918259447333725'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3486815723019470360/posts/default/7716918259447333725'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anuragshandilyahindi.blogspot.com/2008/12/blog-post.html' title='खतरे की घंटी हैं सैटेलाइट फोन्स'/><author><name>ANURAG SHANDILYA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09780770213161059080</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3486815723019470360.post-1223894951245247211</id><published>2008-11-24T15:42:00.000+05:30</published><updated>2008-11-24T15:43:31.236+05:30</updated><title type='text'>नवरत्न एवं मिनीरत्न सीपीएसई की सूची</title><content type='html'>&lt;p style="text-align: center; font-weight: bold;" align="center"&gt;&lt;span lang="HI"&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;font-size:180%;" &gt;नवरत्न एवं मिनीरत्न सीपीएसई की सूची&lt;/span&gt; &lt;span style="color: rgb(0, 255, 128);"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="text-align: center; font-weight: bold;" align="center"&gt;&lt;span style="color: rgb(96, 191, 0); text-decoration: underline;" lang="HI"&gt;(5.5.2008 को  उपलब्ध सूचना के अनुसार)&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt; &lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="color: rgb(64, 64, 255);" lang="HI"&gt;नवरत्न  सीपीएसई&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt; &lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;1.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;        &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;भारत  इलैक्ट्रोनिक्स लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;2.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;      &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;भारत हैवी  इलैक्ट्रीकल्स लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;3.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;      &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;भारत पेट्रोलियम  कॉरपोरेशन लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;4.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;      &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;गेल (इंडिया)  लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;5.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;      &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;हिंदुस्तान  एयरोनॉटिक्स लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;6.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;      &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;हिंदुस्तान  पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;7.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;      &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;हिंदुस्तान ऑयल  कॉरपोरेशन लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;8.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;      &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);" lang="HI"&gt;महानगर टेलिफोन  निगम लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;9.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;      &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;नेशनल  एल्युमिनियम कंपनी लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;10.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;   &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;एनएमडीसी  लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;11.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;     &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;एनटीपीसी  लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;12.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;   &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;ऑयल एंड नेचुरल  गैस कॉरपोरेशन लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;13.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;   &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;पॉवर फाइनेंस  कॉरपोरेशन लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;14.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;   &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;पॉवर ग्रिड  कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;15.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;   &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;रूरल  इलैक्ट्रीफिकेशन कॉरपोरेशन लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;16.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;   &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;स्टील ऑथरिटी ऑफ  इंडिया लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt; &lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="color: rgb(64, 64, 255);" lang="HI"&gt;मिनीरत्न  श्रेणी- &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; color: rgb(64, 64, 255);"&gt;I&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;&lt;span style="color: rgb(64, 64, 255);"&gt;  सीपीएसई&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt; &lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;1.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;        &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;बामर लारी एंड  कंपनी लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;2.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;      &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;भारत डायनामिक्स  लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;3.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;      &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;बीईएमएल  लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;4.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;    &lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255);" lang="HI"&gt;भारत संचार निगम  लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;5.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;      &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;बोंगईगांव  रिफाइनरीज एंड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;6.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;      &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;सेन्ट्रल  वेयरहाउसिंग कॉरपोरेशन&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;7.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;      &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;सेन्ट्रल  कोलफील्ड्स लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;8.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;      &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;चेन्नई  पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;9.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;      &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;कोल इंडिया  लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;10.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;   &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 128, 255);" lang="HI"&gt;कंटेनर  कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;11.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;     &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;ड्रेजिंग  कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;12.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;   &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 191, 96);" lang="HI"&gt;इंजीनियर्स  इंडिया लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;13.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;   &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;गार्डनरीच  शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;14.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;   &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;गोवा शिपयार्ड  लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;15.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;   &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;हिंदुस्तान  लेटेक्स लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;16.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;   &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;हिंदुस्तान  न्यूजप्रिंट लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;17.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;   &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;हाउसिंग एंड  अर्बन डवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;18.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;   &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;इंडिया टूरिज्म  डवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;19.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt; &lt;span style="color: rgb(64, 64, 255);"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(64, 64, 255);" lang="HI"&gt;इंडियन रेलवे  केटरिंग एंड टूरिज्म कॉरपोरेशन लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;20.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal; color: rgb(255, 64, 64);"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 64, 64);" lang="HI"&gt;इरकॉन इंटरनेशनल  लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;21.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;   &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;कुद्रेमुख आयरन  ओर कंपनी लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;22.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;मझगांव डॉक्स  लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;23.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;महानदी  कोलफील्‍ड्स लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;24.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;मैंगलोर  रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;25.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;एमएमटीसी  लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;26.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;एमएसटीसी  लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;27.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;नेशनल  फर्टिलाइजर्स लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;28.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;नेवेली लिग्नाइट  कॉरपोरेशन&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;29.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;एनएचपीसी  लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;30.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;नार्दर्न  कोलफील्ड्स लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;31.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;   &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;नुमालीगढ़  रिफाइनरी लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;32.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;ऑयल इंडिया  लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;33.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;राष्ट्रीय  केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;34.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;राष्ट्रीय  इस्पात निगम लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;35.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 64, 64);" lang="HI"&gt;राइट्स  लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;36.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;सतलुज जलविद्युत  निगम लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;37.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;शिपिंग  कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;38.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;साउथ ईस्टर्न  कॉरपोरेशन लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;39.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;स्टेट ट्रेडिंग  कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;40.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;टेलीकम्यूनिकेशन  कंसलटेण्ट्स (इंडिया) लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;41.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;   &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;वेस्टर्न  कोलफील्ड्स लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt; &lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="color: rgb(64, 64, 255);" lang="HI"&gt;मिनीरत्न  श्रेणी- &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; color: rgb(64, 64, 255);"&gt;II&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;&lt;span style="color: rgb(64, 64, 255);"&gt;  सीपीएसई&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt; &lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;42.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;&lt;span&gt; &lt;/span&gt;एजुकेशनल कंसलटेण्ट्स (आई) लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;43.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;इंजीनियरिंग  प्रोजेक्ट्स (आई) लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;44.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;फेरो स्क्रेप  निगम लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;45.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;एचएमटी  (इंटरनेशनल) लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;46.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;एचएससीसी(इंडिया) लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;47.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;इंडिया ट्रेड  प्रमोशन आर्गेनाइजेशन&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;48.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;इंडियन  मेडिसिन्स फार्मास्युटिकल्स कॉरपोरेशन लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;49.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;मैंगनीज ओर  इंडिया लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;50.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;मेकॉन  लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;51.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;   &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;नेशनल फिल्‍म  डवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;52.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;पीईसी  लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="margin-left: 0.25in; text-indent: -0.25in; font-weight: bold;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;53.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;राजस्थान  इलैक्ट्रोनिक्स एंड इन्स्टूमेंट्स लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;span style="font-weight: bold;" lang="HI"&gt;&lt;span&gt;54.&lt;span style="font-family: 'Times New Roman'; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; font-size: 7pt; line-height: normal; font-size-adjust: none; font-stretch: normal;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;वाटर एंड पावर  कंसलटेंसी (इंडिया) लिमिटेड&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3486815723019470360-1223894951245247211?l=anuragshandilyahindi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anuragshandilyahindi.blogspot.com/feeds/1223894951245247211/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3486815723019470360&amp;postID=1223894951245247211&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3486815723019470360/posts/default/1223894951245247211'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3486815723019470360/posts/default/1223894951245247211'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anuragshandilyahindi.blogspot.com/2008/11/blog-post_24.html' title='नवरत्न एवं मिनीरत्न सीपीएसई की सूची'/><author><name>ANURAG SHANDILYA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09780770213161059080</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3486815723019470360.post-8468988022369648353</id><published>2008-11-21T23:16:00.000+05:30</published><updated>2008-11-21T23:42:17.206+05:30</updated><title type='text'>कंप्यूटर में हिन्दी फोन्ट ठीक से नहीं आ रहे हैं तो इन चरणों को अपनाएं:</title><content type='html'>&lt;a rel="nofollow" name="xp_vista"&gt;&lt;u&gt;&lt;span style="font-weight: bold;font-size:130%;" &gt;कंप्यूटर में हिन्दी फोन्ट ठीक से नहीं आ रहे हैं तो इन चरणों को अपनाएं:  &lt;/span&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विन्डोज़ xp  व विन्डोज़ विस्टा प्रयोग करनेवाले : &lt;/b&gt;&lt;/u&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Control Panel में जाएँ -&gt; Regional and Language Options  को चुनें -&gt; Languages tab को क्लिक करें -&gt; 'Install files for  complex scripts and right-to-left languages (Including Thai)'  को चुनें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;img alt="" src="http://thatshindi.oneindia.in/images/unicode-images/winXPa.gif" border="0" width="404" height="485" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"ओके" करें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;img alt="" src="http://thatshindi.oneindia.in/images/unicode-images/winXPb.gif" border="0" width="623" height="133" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह आपको xp cd अन्दर करने के लिए कहेगा, ऐसा करें ताकि आवश्यक files कॉपी हो सकें. अब सिस्टम को पुनः चालू करें. अब आप इन्टरनेट एक्स्प्लोरर, मोजिला, ऑपेरा आदि पर हिन्दी फोन्ट आसानी से देख/ पढ़ सकेंगे.&lt;br /&gt;&lt;hr color="black" size="1" width="250" noshade="noshade"&gt; &lt;span&gt;&lt;u&gt;&lt;a rel="nofollow" name="98_2000"&gt;&lt;b&gt;विण्डो 98, 2000  प्रयोगकर्ता IE6 रखने वाले: &lt;/b&gt;&lt;/a&gt;&lt;/u&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चरण 1 का पालन करें:&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span&gt;चरण 1  &lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;b&gt;:&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1) &lt;a rel="nofollow" target="_blank" href="http://thatshindi.oneindia.in/common/unicode/Akshar.ttf"&gt;Akshar&lt;/a&gt; फोन्ट डाऊनलोड करें व फोंट्स में पेस्ट कर दें.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फोंट्स इंस्टाल करें व सिस्टम को पुनः चालू करें.&lt;br /&gt;यदि आप अब भी न पद पा रहे हों तो चरण 2 अपनाएं:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a rel="nofollow" name="2000_firefox"&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;a rel="nofollow" name="2000_firefox"&gt;&lt;span&gt;चरण 2  &lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span&gt;&lt;a rel="nofollow" name="2000_firefox"&gt;&lt;b&gt;(IE6+ मोजिला प्रयोगकर्ता):&lt;/b&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Start &gt; Settings &gt; Control Panel &gt; Regional Options &gt; General  [Tab] में जाएँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"Language settings for this system" फ्रेम में , "Indic" से अगला बॉक्स चेक करें .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;img alt="" src="http://thatshindi.oneindia.in/images/unicode-images/win2000a.gif" border="0" width="404" height="478" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;"&lt;span&gt;ओके&lt;/span&gt;" &lt;span&gt;करें&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;br /&gt;&lt;img alt="" src="http://thatshindi.oneindia.in/images/unicode-images/winXPb.gif" border="0" width="623" height="133" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहे अनुसार सिस्टम को cd से files कॉपी करने दें.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि कहा जाए तो इंस्टाल करने के उपरांत सिस्टम को पुनः चालू करें.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3486815723019470360-8468988022369648353?l=anuragshandilyahindi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anuragshandilyahindi.blogspot.com/feeds/8468988022369648353/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3486815723019470360&amp;postID=8468988022369648353&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3486815723019470360/posts/default/8468988022369648353'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3486815723019470360/posts/default/8468988022369648353'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anuragshandilyahindi.blogspot.com/2008/11/blog-post_21.html' title='कंप्यूटर में हिन्दी फोन्ट ठीक से नहीं आ रहे हैं तो इन चरणों को अपनाएं:'/><author><name>ANURAG SHANDILYA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09780770213161059080</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3486815723019470360.post-1930562653393947442</id><published>2008-11-18T23:01:00.000+05:30</published><updated>2008-11-18T23:14:52.626+05:30</updated><title type='text'>बिस्तर तक पहुंची मंदी</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;बिस्तर तक &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;पहुंची&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; मंदी &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;img src="http://hindi.economictimes.indiatimes.com/photo.cms?photoid=3728922" vspace="4" align="left" border="0" hspace="5" /&gt;  &lt;p&gt;&lt;span&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;दुनिया भर में चल रही आर्थिक मंदी ने लोगों की जिंदगी के हर पहलू को प्रभावित किया है। इसके मद्देनजर मनोवैज्ञानिक अब इस बात का पता लगाने में जुटे हैं कि आर्थिक मंदी किस तरह से लोगों की सेक्सुअल लाइफ पर असर डाल रही है। इस बाबत शुरुआती नतीजे कुछ दिलचस्प नतीजे पेश कर रहे हैं।&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;imgname style="font-weight: bold;"&gt;सेंसेक्स का असर सेक्स पर भी&lt;br /&gt;&lt;/imgname&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;imgname style="font-weight: bold;"&gt;&lt;/imgname&gt;&lt;/span&gt;   &lt;img src="http://hindi.economictimes.indiatimes.com/photo.cms?photoid=3728920" vspace="4" align="left" border="0" hspace="5" /&gt;&lt;/p&gt;&lt;div style="padding-top: 5px; padding-bottom: 5px;"&gt;&lt;img src="http://hindi.economictimes.indiatimes.com/images/spacer.gif" width="5" border="0" height="8" /&gt; &lt;b&gt;शुरुआती पड़ताल बताते हैं कि आर्थिक मंदी का भारत में बेडरूमों पर काफी असर देखने को मिला है। इस संबंध में किए गए आकलन में पता चला है कि जिस तरीके से सेंसेक्स ऊपर-नीचे होता है, उसी तरह से लोगों की सेक्सुअल लाइफ भी प्रभावित होती है। मंदी से कई भारतीयों के सेक्सुअल लाइफ के ठंडा पड़ने की आशंका है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;imgname style="font-weight: bold;"&gt;अंतरराष्ट्रीय स्टडी&lt;/imgname&gt;&lt;/span&gt;   &lt;img src="http://hindi.economictimes.indiatimes.com/photo.cms?photoid=3728918" vspace="4" align="left" border="0" hspace="5" /&gt; &lt;div style="padding-left: 5px;"&gt; &lt;p class="normtxt"&gt;&lt;span&gt;&lt;b&gt;बेडरूम में फाइनेंशियल क्राइसिस के असर की स्टडी के लिए भारत, अमेरिका और यूरोप में जॉइंट रिसर्च की जा रही है। इस स्टडी में वर्ल्ड असोसिएशन ऑफ सेक्सोलॉजिस्टस की भी मदद ली जाएगी। स्टडी में फाइनेंशियल क्राइसिस की वजह से पूरी दुनिया में सेक्सुअल लाइफ के असर के बारे में जानकारी जुटाई जाएगी।&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="normtxt"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="normtxt"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="normtxt"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="normtxt"&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;imgname style="font-weight: bold;"&gt;सेपरेशन का मुकाम &lt;/imgname&gt;&lt;/span&gt;   &lt;img src="http://hindi.economictimes.indiatimes.com/photo.cms?photoid=3728914" vspace="4" align="left" border="0" hspace="5" /&gt;&lt;/p&gt; &lt;div style="padding-left: 5px;"&gt; &lt;p class="normtxt"&gt;&lt;span&gt;&lt;b&gt;इस रिसर्च में अहमदाबाद के सेक्सोलॉजिस्ट डॉ. पारस शाह भारतीय रिसर्च की अगुवाई कर रहे हैं। उनके साथ न्यू यॉर्क के एक्सपर्ट जूडी कुरियनस्की भी साथ होंगे। ये रिसर्चर ग्लोबल मंदी के सेक्सुअल लाइफ पर पड़ने वाले असर की पूरी तस्वीर को स्वीडन में 2009 होने वाले वर्ल्ड असोसिएशन ऑफ सेक्सोलॉजिस्ट्स के कॉन्फ्रेंस में पेश करेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डॉ. पारस शाह कहते हैं कि फाइनेंशियल क्राइसिस के मद्देनजर यह स्टडी काफी अहम है, क्योंकि सेक्स रिश्तों को बनाए रखने में अहम रोल निभाता है और पैसे गंवाने की वजह से कई कपल्स सेपरेशन के कगार पर पहुंच चुके हैं।&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="normtxt"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="normtxt"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;font-size:180%;" &gt;&lt;imgname&gt;ज्यादार युवा हैं इसके शिकार &lt;/imgname&gt;&lt;/span&gt;   &lt;img src="http://hindi.economictimes.indiatimes.com/photo.cms?photoid=3728904" vspace="4" align="left" border="0" hspace="5" /&gt;&lt;/p&gt;&lt;div style="padding-top: 5px; padding-bottom: 5px;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;डॉ. शाह ने अब तक 97 केसों को स्टडी के लिए शामिल किया है। इनमें &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;शेयर&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; बाजार में पैसा गंवाने की वजह से 15-20 कपल्स के बीच तलाक लेने की नौबत तक आ पहुंची है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt; &lt;div style="padding-left: 5px;"&gt;&lt;p class="normtxt"&gt;&lt;span&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;पैसा गंवाने की वजह से इन कपल्स के बीच शारीरिक दूरियां भी बढ़ गई हैं। खास बात यह है कि इनमें ज्यादातर की उम्र 35 साल से नीचे है।&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="normtxt"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="normtxt"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="normtxt"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="normtxt"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="normtxt"&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;imgname&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;सेक्स तनाव दूर करने का जरिया नहीं&lt;/span&gt; &lt;/imgname&gt;&lt;/span&gt;   &lt;img src="http://hindi.economictimes.indiatimes.com/photo.cms?photoid=3728900" vspace="4" align="left" border="0" hspace="5" /&gt;&lt;/p&gt;&lt;div style="padding-top: 5px; padding-bottom: 5px;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;डॉक्टरों का कहना है कि सर्वेक्षण बताते हैं कि फाइनेंशियल क्राइसिस पुरुषों में टेस्टोटेरेन लेवल को कम कर रहा है, जिसकी वजह से वे अपनी सेक्सुअल क्षमता गवां रहे हैं। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt; &lt;div style="padding-left: 5px;"&gt;&lt;p class="normtxt"&gt;&lt;span&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;डॉ. शाह कहते हैं कि 2002 में गुजरात दंगों के बाद भी इसी तरह के रिसर्च किए गए थे। इससे पता चलता है कि भारतीय सेक्स को तनाव दूर करने का जरिया नहीं बना पाते हैं।&lt;/b&gt; &lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;/div&gt;  &lt;/div&gt; &lt;/div&gt; &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt; &lt;div style="padding-left: 5px;"&gt;&lt;p class="normtxt"&gt;&lt;span&gt; &lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3486815723019470360-1930562653393947442?l=anuragshandilyahindi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anuragshandilyahindi.blogspot.com/feeds/1930562653393947442/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3486815723019470360&amp;postID=1930562653393947442&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3486815723019470360/posts/default/1930562653393947442'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3486815723019470360/posts/default/1930562653393947442'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anuragshandilyahindi.blogspot.com/2008/11/blog-post_18.html' title='बिस्तर तक पहुंची मंदी'/><author><name>ANURAG SHANDILYA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09780770213161059080</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3486815723019470360.post-3665040947698740358</id><published>2008-11-17T23:54:00.001+05:30</published><updated>2008-11-17T23:54:55.346+05:30</updated><title type='text'>हॉटेस्ट टचस्क्रीन फोन</title><content type='html'>&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-size:180%;" &gt;हॉटेस्ट टचस्क्रीन फोन&lt;/span&gt;   &lt;img src="http://hindi.economictimes.indiatimes.com/photo.cms?photoid=3724111" align="left" border="0" vspace="4" hspace="5" /&gt;&lt;div style="padding-left: 5px;"&gt;&lt;p&gt;&lt;span&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;आईफोन के दीवाने भले ही इसकी स्टाइल, फीचर्स और नेविगेशन के लिए पैसे खर्च करने को तैयार हों, लेकिन इसका खास फीचर टचस्क्रीन ही इसे सच्चा ट्रेंडसेटर बनाता है। एपल के मुखिया स्टीव जॉब्स के यह ऐलान करते ही कि उनकी कंपनी का पहले मोबाइल डिवाइस में टचस्क्रीन होगा, पूरी मोबाइल इंडस्ट्री में इसका क्रेज शुरू हो गया। भारतीय बाजारों में भी टचस्क्रीन फोन का आगाज हो चुका है। एचटीसी से लेकर सैमसंग तक सभी कंपनियों ने भारतीय कस्टमरों के लिए टचस्क्रीन फोन पेश किया है। यह फोन उन लोगों के लिए भी बढ़िया विकल्प साबित हो रहा है, जिनके लिए 3जी आईफोन महंगा साबित हो रहा है।&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt; &lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;/div&gt;&lt;span style="font-weight: bold;font-size:130%;" &gt;सैमसंग ओमनिया i900&lt;/span&gt;   &lt;img src="http://hindi.economictimes.indiatimes.com/photo.cms?photoid=3724098" align="left" border="0" vspace="4" hspace="5" /&gt;&lt;div style="padding-top: 5px; padding-bottom: 5px;"&gt;&lt;img src="http://hindi.economictimes.indiatimes.com/images/spacer.gif" border="0" width="5" height="8" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;भारत में आईफोन इफेक्ट से मुकाबले के लिए कोरियाई कंपनी सैमसंग ने आईफोन के जैसा दिखने वाला टचस्क्रीन फोन सैमसंग ओमनिया i900 लॉन्च किया है। यह टचस्क्रीन स्मार्टफोन 5 मेगापिक्सल कैमरा, वाई-फाई और इन बिल्ट जीपीएस आदि तकनीकों से लैस है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt; &lt;div style="padding-left: 5px;"&gt;&lt;p&gt;&lt;span&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;इस फोन का डिस्प्ले 3.2 इंच का है, जिसका रिजॉल्यूशन 240X400 पिक्सल है। आईफोन की तरह ओमनिया का मकसद इंटरनेट ब्राउजिंग को आसान बनाना है। साथ विडियो देखने के लिए इसमें वाइड स्क्रीन है।&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;एचटीसी टच डायमंड &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;   &lt;img src="http://hindi.economictimes.indiatimes.com/photo.cms?photoid=3724091" align="left" border="0" vspace="4" hspace="5" /&gt;&lt;/p&gt; &lt;div style="padding-left: 5px;"&gt; &lt;p&gt;&lt;span&gt;&lt;b&gt;ताइवान की कंपनी एचटीसी भारत मे टचस्क्रीन फोन लॉन्च करने वाली पहली कंपनी थी। टच के साथ एचटीसी ने आधिकारिक रूप से भारत में टचस्क्रीन फोन सेगमेंट में प्रवेश किया। टच डायमंड कंपनी का भारत में लॉन्च किया जाने वाला चौथा टचस्क्रीन (जीएसएम) है। इससे पहले कंपनी एचटीसी, एचटीसी ड्यूल और एचटीसी क्रूज पेश कर चुकी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके फीचर्स में 2.8 इंच का वीजीए टचस्क्रीन डिस्प्ले. 3.2 मेगापिक्सल कैमरा, विडियो कॉलिंग क्षमता आदि शामिल हैं। इसके अलावा इसमें 4जीबी का इंटरनल स्टोरेज, 256एमबी का प्लैश और 192एमबी का रैम है। अन्य फीचर्स में ब्लूटूथ, इंटिग्रेटेड जीपीएस और वाई-फाई शामिल हैं।&lt;/b&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;/div&gt; &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;font-size:130%;" &gt;Asus P320 &lt;/span&gt;   &lt;img src="http://hindi.economictimes.indiatimes.com/photo.cms?photoid=3724085" align="left" border="0" vspace="4" hspace="5" /&gt;&lt;div style="padding-top: 5px; padding-bottom: 5px;"&gt;&lt;a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;  &lt;p&gt;&lt;span&gt;&lt;b&gt;जो लोग स्टाइल पर खास ध्यान रखते हैं, उनके लिए ताइवानी कंपनी Asus ने भारतीय बाजार में टचस्क्रीन पीडीए लॉन्च किया है। यह टचस्क्रीन फोन में पिंक और मोती कलर के शेड है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;P320 में जीपीएस नेविगेशन, इंटरनेट एक्सेस के लिए वाई-फाई और ब्लूटूथ और यूएसबी कनेक्टिविटी भी है। अन्य प्रमुख फीचर्स में 2.6 इंच का टीएफटी टचस्क्रीन, 240x320 पिक्सल रिजॉल्यूशन, 2 मेगापिक्स्ल कैमरा आदि शामिल हैं। इस फोन की कीमत तकरीबन 12,900 रुपये है।&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;सैमसंग TouchWIZ F480  सैमसंग TouchWIZ F480&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;   &lt;img src="http://hindi.economictimes.indiatimes.com/photo.cms?photoid=3724077" align="left" border="0" vspace="4" hspace="5" /&gt;&lt;/p&gt;&lt;div style="padding-top: 5px; padding-bottom: 5px;"&gt;&lt;img src="http://hindi.economictimes.indiatimes.com/images/spacer.gif" border="0" width="5" height="8" /&gt;&lt;/div&gt;  &lt;p&gt;&lt;span&gt;&lt;b&gt;टचस्क्रीन फोन की कैटिगरी में सैमसंग का एक और मॉडल TouchWIZ F480 भी काफी सुर्खियों में है। इस फोन को हाल में ही भारत में लॉन्च किया गया है। इसका स्क्रीन 2.8 इंच का है, जिसका रिजॉल्यूशन 240x320 है। साथ इस फोन में एफएम रेडियो, मल्टी फॉर्मेट विडियो प्लेबैक भी मौजूद हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस फोन में 5 मेगापिक्सल का फ्लैश कैमरा है। साथ ही इसमें 240 एमबी का इंटरनल मेमरी भी है, जिसे बढ़ाकर 8जीबी तक किया जा सकता है। इसकी कीमत तकरीबन 20,990 रुपये है।&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-weight: bold;font-size:130%;" &gt;एलजी 1000 &lt;/span&gt;   &lt;img src="http://hindi.economictimes.indiatimes.com/photo.cms?photoid=3724071" align="left" border="0" vspace="4" hspace="5" /&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span&gt;&lt;b&gt;यह टचस्क्रीन फोन सीडीएमए फोन इस्तेमाल करने वालों के लिए है। एलजी 1000 सीडीएमए रिलायंस के नेटवर्क पर उपलब्ध है। यह दिखने में नोकिया के कम्यूनिकेटर जैसा है। इसका एलसीडी 2.8 इंच का है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस फोन के प्रमुख फीर्चस में मीडिया प्लेयर, 2 मेगापिक्सल कैमरा (साथ में विडियो रिकॉर्डर), 8 जीबी तक की एक्सपैंडेल मेमरी आदि है। इसकी कीमत 22,000 से 25,000 के बीच है।&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-weight: bold;font-size:130%;" &gt;एचटीसी P3000  &lt;/span&gt;   &lt;img src="http://hindi.economictimes.indiatimes.com/photo.cms?photoid=3724062" align="left" border="0" vspace="4" hspace="5" /&gt;&lt;/p&gt;&lt;div style="padding-top: 5px; padding-bottom: 5px;"&gt;&lt;img src="http://hindi.economictimes.indiatimes.com/images/spacer.gif" border="0" width="5" height="8" /&gt;&lt;/div&gt;  &lt;p&gt;&lt;span&gt;&lt;b&gt;सीडीएमए फोन का इस्तेमाल करने वालों के लिए टचस्क्रीन का एक और विकल्प एचटीसी पी3000 के रूप में उपलब्ध है। रिलायंस नेटवर्क पर उपलब्ध यह टचस्क्रीन फोन स्लीक और स्टाइलिश है। इसका वजह महज 130 ग्राम है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह टचसक्रीन फोन रिलायंस की सीडीएमए 1X टेक्नॉलजी से लैस है, जो 144 केबीपीएस तक की मोबाइल इंटरनेट स्पीड मुहैया कराता है। इसमें 2 मेगापिक्सल कैमरा के अलावा 64 एमबी का रैम, ब्लूटूथ आदि भी मौजूद है।&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3486815723019470360-3665040947698740358?l=anuragshandilyahindi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anuragshandilyahindi.blogspot.com/feeds/3665040947698740358/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3486815723019470360&amp;postID=3665040947698740358&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3486815723019470360/posts/default/3665040947698740358'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3486815723019470360/posts/default/3665040947698740358'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anuragshandilyahindi.blogspot.com/2008/11/blog-post_675.html' title='हॉटेस्ट टचस्क्रीन फोन'/><author><name>ANURAG SHANDILYA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09780770213161059080</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3486815723019470360.post-5609459721383104542</id><published>2008-11-17T23:14:00.001+05:30</published><updated>2008-11-17T23:14:51.444+05:30</updated><title type='text'>एक गिलहरी: अपने नन्हें मुन्ने बच्चों के साथ</title><content type='html'>&lt;h3 class="post-title entry-title"&gt; &lt;a href="http://anuragshandilya.blogspot.com/2008/09/blog-post.html"&gt;एक गिलहरी: अपने नन्हें मुन्ने बच्चों के साथ.&lt;/a&gt; &lt;/h3&gt;   &lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_jVNGfgppEiU/SL1xy3igsRI/AAAAAAAAAAU/bEr7T5Ng9uU/s1600-h/DSC00067.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5241470660045222162" style="margin: 0px 10px 10px 0px; float: left;" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_jVNGfgppEiU/SL1xy3igsRI/AAAAAAAAAAU/bEr7T5Ng9uU/s320/DSC00067.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_jVNGfgppEiU/SL1xzOEDIcI/AAAAAAAAAAc/kpC19krsbXw/s1600-h/DSC00068.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5241470666091471298" style="margin: 0px 10px 10px 0px; float: left; width: 320px; height: 239px;" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_jVNGfgppEiU/SL1xzOEDIcI/AAAAAAAAAAc/kpC19krsbXw/s320/DSC00068.JPG" border="0" width="320" height="261" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 102, 255);"&gt;&lt;span class=""&gt;यह&lt;/span&gt; मात्र संयोग ही है कि आप ये तस्वीरें देख पा रहे हैं इनमें एक गिलहरी अपने नन्हे मुन्ने बच्चों के साथ दिख रही है. यकीन करें ये तस्वीरें कहीं और किसी साईट से नहीं ली गईं (दिन: 01.09.2008, समय: 8 बजे) गिलहरी ने ये घोंसला एक खिड़की के शीशे के पीछे ग्रिल के साथ बना लिया है जो कि घर के लोगों को इसलिए मालूम नहीं चला क्योंकि खिड़की पर कई दिनों से पर्दा पड़ा था.&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3486815723019470360-5609459721383104542?l=anuragshandilyahindi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anuragshandilyahindi.blogspot.com/feeds/5609459721383104542/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3486815723019470360&amp;postID=5609459721383104542&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3486815723019470360/posts/default/5609459721383104542'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3486815723019470360/posts/default/5609459721383104542'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anuragshandilyahindi.blogspot.com/2008/11/blog-post_7804.html' title='एक गिलहरी: अपने नन्हें मुन्ने बच्चों के साथ'/><author><name>ANURAG SHANDILYA</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09780770213161059080</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_jVNGfgppEiU/SL1xy3igsRI/AAAAAAAAAAU/bEr7T5Ng9uU/s72-c/DSC00067.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3486815723019470360.post-8128950372433813884</id><published>2008-11-17T23:13:00.000+05:30</published><updated>2008-11-17T23:14:05.080+05:30</updated><title type='text'>हिन्दी में सोचना और लिखना स्वाभाविक है, प्रयास तो कीजिये</title><content type='html'>&lt;h3 class="post-title entry-title"&gt; &lt;a href="http://anuragshandilya.blogspot.com/2008/09/blog-post_05.html"&gt;हिन्दी में सोचना और लिखना स्वाभाविक है, प्रयास तो कीजिये&lt;/a&gt; &lt;/h3&gt;   &lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_jVNGfgppEiU/SMDdA-mR6-I/AAAAAAAAABw/6Z0sScOwEGw/s1600-h/1.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5242432975132552162" style="margin: 0px 10px 10px 0px; float: left;" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_jVNGfgppEiU/SMDdA-mR6-I/AAAAAAAAABw/6Z0sScOwEGw/s320/1.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_jVNGfgppEiU/SMDdBLvwfSI/AAAAAAAAAB4/g_wcYZmTTxY/s1600-h/2.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5242432978661965090" style="margin: 0px 10px 10px 0px; float: left;" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_jVNGfgppEiU/SMDdBLvwfSI/AAAAAAAAAB4/g_wcYZmTTxY/s320/2.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_jVNGfgppEiU/SMDdBfF8eRI/AAAAAAAAACA/5NkUfmHIsG4/s1600-h/3.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5242432983855298834" style="margin: 0px 10px 10px 0px; float: left;" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_jVNGfgppEiU/SMDdBfF8eRI/AAAAAAAAACA/5NkUfmHIsG4/s320/3.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_jVNGfgppEiU/SMDdBmDbSzI/AAAAAAAAACI/DnZucK8cKQY/s1600-h/4.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5242432985723783986" style="margin: 0px 10px 10px 0px; float: left;" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_jVNGfgppEiU/SMDdBmDbSzI/AAAAAAAAACI/DnZucK8cKQY/s320/4.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size: 130%; color: rgb(255, 102, 102);"&gt;यहाँ कुछ टिप्पणियाँ व निर्देशों का हिन्दी रूपांतर दिया जा रहा है. आप इन्हें अपनी दिन- प्रतिदिन के कार्यालयी कार्यों में प्रयोग कर सकते हैं. फ़िर ध्यान दें कि हिन्दी में सोचना और लिखना स्वाभाविक है, प्रयास तो कीजिये.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;span style="font-size: 85%; color: rgb(51, 102, 255);"&gt;इन टिप्पणियाँ व निर्देशों को स्वयं संकलित किया गया है व फोटो के रूप में यहाँ दिया गया है. यदि किसी को किंचित कारणों से इन पर आपत्ति हो तो इन्हें ग़लत व मिटा हुआ मानें. ऐसा होना मात्र एक संयोग ही है व ब्लोगर का इससे कोई लेना- देना नहीं है. ब्लोगर इसके लिए क्षमा प्रार्थी है.&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-foo
